Will Russia go closer to China?- यूरोपीय संघ लगा रहा रूस के स्विफ्ट का इस्तेमाल करने पर पाबन्दी

Will Russia go closer to China
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Will Russia go closer to China?-अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और उसके कई सहयोगी देशों ने रूस के कई बैंकों को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के अहम सिस्टम ‘स्विफ़्ट’ से बाहर करने का फ़ैसला किया है. दुनिया भर में हज़ारों वित्तीय संस्थान ‘स्विफ़्ट सिस्टम’ का इस्तेमाल करते हैं. रूस तेल और गैस के निर्यात के लिए बहुत हद तक इस सिस्टम पर निर्भर रहा है. यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से इसे सबसे कठोर पाबंदी माना जा रहा है. रूस के पहले सिर्फ़ ईरान को ही स्विफ़्ट सिस्टम से बाहर किया गया था. BBC के मुताबिक….

Will Russia go closer to China?

पश्चिमी देशों की पाबंदियों को लेकर रूस लगातार कड़ी प्रतिक्रिया दे रहा है. रूस का कहना है कि उसके साथ ‘ग़ैर दोस्ताना’ बर्ताव किया जा रहा है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रविवार को सेना से ‘न्यूक्लियर फ़ोर्स’ को ‘स्पेशल अलर्ट’ पर रखने को कहा, तब उन्होंने रूस पर लगाई गई पाबंदियों को ‘ग़ैर वाजिब’ बताया.
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों में से कई मानते है कि ‘स्विफ़्ट सिस्टम से बाहर किए जाने के बाद रूस चीन के और करीब जा सकता है.’ चीन के पास पेमेंट के लिए अपना अलग सिस्टम है.वहीं, जर्मनी समेत यूरोप के कई देश आर्थिक और संसाधनों से जुड़े हितों को देखते हुए रूस को स्विफ्ट से बाहर किए जाने को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन से अलग राय रख रहे हैं.

स्विफ्ट पर किसका नियंत्रण

russia putin
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स्विफ्ट यानी ‘सोसायटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्यूनिकेशन’ (Society for Worldwide Interbank Financial Telecommunication‘) एक सुरक्षित मैसेजिंग सिस्टम है जिसके ज़रिए सीमा के परे तेज़ी के साथ पेमेंट (भुगतान) संभव हो पाता है. अंतरराष्ट्रीय कारोबार में इससे काफी मदद मिलती है. स्विफ़्ट का गठन अमेरिका और यूरोप के बैंकों ने किया. ये बैक नही चाहते थे कि कोई एक संस्थान अपना सिस्टम बनाए और फिर एकाधिकार रखे.दो हज़ार से ज़्यादा बैंकों और वित्तीय संस्थानों का इस नेटवर्क पर संयुक्त स्वामित्व है. यूएस फ़ेडरल रिज़र्व और बैंक ऑफ़ इंग्लैंड समेत पूरी दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंकों की साझेदारी में नेशनल बैंक ऑफ़ बेल्जियम इसकी निगरानी करता है.

रूस पर कितना असर

बीबीसी के बिज़नेस एडिटर सिमॉन जैक के मुताबिक अब तक ये माना जाता था कि रूसी बैंकों को स्विफ़्ट से बाहर करने का फ़ैसला आखिरी कदम के तौर पर आजमाया जाएगा.अभी तक ये साफ़ नहीं है कि स्विफ्ट से रूस के किन बैंकों को हटाया गया है. ये बात आने वाले दिनों में ही ये साफ़ हो सकेगी.
अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूरोपीय संघ ने इस प्रतिबंध का समर्थन किया है.

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यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा कि रूस के सेंट्रल बैंक की संपत्तियों को शक्तिहीन बनाने वाले ये प्रतिबंध उसे युद्ध के दौरान अपने ख़जाने के इस्तेमाल से रोक देंगे.यूरोपीय आयोग ने कहा है कि उसके सहयोगी देश बैंक के लेनदेन को रोकने और उसकी संपत्तियों के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने पर राज़ी हुए हैं.

अमेरिका, ईयू और ब्रिटेन की ओर से एक साझा बयान जारी किया गया है. इसमें कहा गया है कि इस कदम से ये तय होगा कि ‘इन बैंकों का अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली से संपर्क कट जाएगा और इससे वैश्विक तौर पर काम करने की इनकी क्षमता पर बुरा असर होगा.’यूक्रेन के प्रधानमंत्री ने कहा है कि इस मुश्किल वक्त में ये प्रतिबंध यूक्रेन की एक वास्तविक मदद हैं.

चीन की भूमिका क्या होगी?


रूस के पूर्व वित्त मंत्री एलेक्सी कुद्रिन का अनुमान है कि स्विफ़्ट से अलग होने पर रूस की अर्थव्यवस्था पांच फ़ीसदी तक सिकुड़ सकती है.हालांकि, कई जानकार ये भी कह रह है कि रूस की अर्थव्यवस्था पर इसका स्थायी असर शायद ही हो. रूस के बैंक भुगतान के लिए चीन जैसे देशों का रूख कर सकते हैं. चीन ने रूस पर पाबंदी नहीं लगाई है और उनका अपना पेमेंट सिस्टम भी है. चीन के पास जो सिस्टम है, उसे सीआईपीएस (क्रॉस बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम) कहा जाता है. जानकार दावा कर रहे हैं कि स्विफ़्ट से बाहर करने का असर ये हो सकता है कि रूस अब चीन के करीब जाए.

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चीन क्या कहता है

जानकारों का ये भी कहना है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का प्रशासन अमेरिकी डॉलर के दबदबे वाले वैश्विक आर्थिक ढांचे का असर कम करना चाहता है. ये स्थिति उनके लिए भी फ़ायेदमंद हो सकती है. हालांकि, बैंकिंग व्यवस्था पर नज़र रखने वाले एक विशेषज्ञ ने बीबीसी के सिमॉन जैक से कहा कि ये भी हो सकता है कि चीन फिलहाल रूस की मदद करने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाए. उसकी एक वजह ये दुनिया के देशों से उनका आयात-निर्यात का रिश्ता रूस के मुक़ाबले कहीं व्यापक है.