महात्मा गाँधी को डॉ. अंबेडकर और अंग्रेज अधिकारियों ने क्यों बताया था दलितों का दुश्मन

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महात्मा गाँधी को डॉ. अंबेडकर और अंग्रेज अधिकारियों ने क्यों बताया था दलितों का दुश्मन….? Indiamoods की खास पड़ताल

तारीख 13 सितम्बर 1932… यह वहीं दिन था जिसने आज़ाद भारत में दलितों का भाग्य और भविष्य तय कर दिया था…. आखिर क्या हुआ था उस दिन….और डॉ. आंबेडकर और अंग्रेज अधिकारीयों ने महात्मा गाँधी को दलितों का दुश्मन क्यों बताया था..

भारत की आज़ादी के आंदोलन के साथ सामाजिक न्याय को लेकर महात्मा गाँधी और डॉ.आंबेडकर कई बार आमने सामने हुए और यह इतिहास का अटूट हिस्सा भी है। गाँधी का अपना तरीका था,जो कभी कभी बेहद अड़ियल नजर आता था वही डॉ.आंबेडकर दलितों के अधिकारों को लेकर बेहद सजग रहते थे और अपनी बात किसी भी मंच पर रखने से कभी कोई गुरेज नहीं करते थे.

दलितों को नये विधान में पृथक निर्वाचन का अधिकार का विरोध


13 सितम्बर 1932 को भारत के कई अख़बारों में यह सनसनीखेज खबर छपी की यरवदा जेल में बंद महात्मा गाँधी ने दलितों को नये विधान में पृथक निर्वाचन का अधिकार दिए जाने के विरोध में 20 सितम्बर से आमरण अनशन करने का फैसला कर लिया है। यह घटना 17 अगस्त 1932 को प्रकाशित अंग्रेजी सरकार की वह घोषणा का जवाब थी जिसके अनुसार दलित जातियों को आम हिन्दू निर्वाचन क्षेत्र में मतदान का अधिकार देने के साथ ही साथ अपने पृथक निर्वाचन क्षेत्र में भी मत देने का अधिकार दिया गया था।

महात्मा गाँधी को यरवदा जेल में करना पड़ा अनशन

दलितों के पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरोध में गाँधी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन का रास्ता चुना तो तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मेक्डोनाल्ड ने गाँधी के इस रवैये पर सख्त एतराज जताया और उनकी कड़ी आलोचना की।

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हिन्दू समाज उस बहुमंजिली मीनार की तरह है….

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वे यही नहीं रुके,उन्होंने गाँधी के उपवास को अनुचित और अन्यायपूर्ण बताते हुए उन्हें दलित जातियों के प्रति शत्रुता का भाव रखने वाला व्यक्ति बताया।
अपनी पूरी जिंदगी जातीय तिरस्कार झेलने को मजबूर डॉ. आंबेडकर को दलित कल्याण के लिए किसी पर भरोसा नहीं था यहाँ तक की गाँधी पर भी नहीं।
डॉ.आंबेडकर ने गाँधी के प्रति वैचारिक संग्राम छेड़ते हुए “मूकनायक “नाम की पत्रिका में लिखा की “हिन्दू समाज उस बहुमंजिली मीनार की तरह है जिसमें प्रवेश करने के लिए न कोई सीढ़ी है,न दरवाजा। जो व्यक्ति जिस मंजिल में पैदा होता है,उसे उसी मंजिल में मरना होता है। हिन्दूवाद अस्पृश्यों के लिए यातनाग्रह है।“

महात्मा गाँधी को नहीं डिगा पाये

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वहीं गाँधी अपने निर्णय से नहीं डिगे। उन्होंने कम्युनल अवार्ड से दलितों को जोड़ने की किसी कोशिश की यह कहते हुए आलोचना की कि यह हिन्दू जाति का अंग भंग करने का प्रयास तो है ही,यह दलित जातियों के लिए भी घातक साबित होगा.

अंग्रेज सरकार से इस मुद्दे पर भिड़े

गाँधी ने अंग्रेज सरकार से साफ किया कि जब तक वे दलितों को पृथक निर्वाचन का अधिकार देने का अपना फैसला रद्द नहीं कर देते तब तक वे अनशन करते रहेंगे। मैकडोनाल्ड ने गाँधी के इस रुख को अप्रत्याशित मानते हुए कहा कि ” आप हिन्दुओं की एकता के लिए अनशन नहीं कर रहे है बल्कि कमजोर दलित जातियों की आवाज बुलंद नहीं हो सके इसलिए अनशन कर रहे है। लेकिन गाँधी न तो ब्रिटिश प्रधानमंत्री की आघात पहुँचाने वाली बात से विचलित हुए न ही डॉ.आंबेडकर की आशंकाओं से।

महात्मा गाँधी को अस्पृश्यता निवारण, असहयोग आंदोलन के लिये सहयोग मिला

महात्मा गांधी खुद को दलितों का सबसे बड़ा प्रतिनिधि कहते थे। असहयोग आन्दोलन के रचनात्मक कार्यक्रमों में उन्होंने अस्पृश्यता निवारण को भी रखा था। 1928 -29 में उन्होनें जो देशव्यापी दौरे किये,उनमें अछूत उद्धार….उनके भाषणों का मुख्य विषय रहा करता था।
7 नवम्बर 1929 को उन्होंने हरिजन उत्थान के लिए पूरे भारत का दौरा कार्यक्रम प्रारंभ किया था,इस दौरान उन्होंने 9 महीने में करीब साढ़े बारह हजार मील की लम्बी यात्रा कर सामाजिक समरसता का संदेश दिया था…जिसमें बापू ने हिन्दू धर्म की जातीय बुराई को त्यागने और सवर्णों से सारे पूर्वाग्रह छोड़ने का अनुरोध किया था।