इसलिए पुलिस अधिकारी तसद्दुक हुसैन को चंद्रशेखर आज़ाद ने नहीं मारी गोली …

डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

चंद्रशेखर आज़ाद (CHANDERSHEKHAR AZAD) एक दिन वे अपने क्रन्तिकारी साथियों के साथ जंगल से गुजर रहे थे। साथियों की निशानेबाजी से मनोरंजन की बात पर वे बोले-“वो देखो,दूर जो पेड़ दिखाई पड़ रहा है, उसका एक छोटा पत्ता नीचे की और लटक रहा है। तुम ध्यान से देखो,मैं उस पत्ते पर अपना निशाना साधता हूँ।” और आज़ाद ने एक के बाद एक पांच गोलियां दाग दी। लेकिन ये क्या पत्ता अभी भी लटक रहा था। उनके साथी ख़ामोश और आज़ाद आश्चर्य से भर गये। वे बोले “मेरा निशाना खाली कैसे गया”, लेकिन सभी जब उस पेड़ के पास गये और पत्ते को देखा तो पता चला की पत्ते में पांच छिद्र थे। ये था आज़ाद का आत्मविश्वास।

काकोरी ट्रेन ( KAKORI TRAIN) लूट के बाद उनके कुछ साथी पकड़ लिए गये और पुलिस आज़ाद को भी पकड़ लेना चाहती थी। एक पुलिस अधिकारी तसद्दुक हुसैन रात दिन चंद्रशेखर आज़ाद की खोज में जुटा रहता। पहले तो आज़ाद ने उसे उड़ा देने की सोची लेकिन पुलिस अधिकारी के हिन्दुस्तानी होने से उन्होनें अपना निर्णय बदल लिया।एक दिन आज़ाद स्वयं तसद्दुक हुसैन के सामने आये और उसकी कनपटी पर पिस्तौल लगाते हुए बोले –”बता इंस्पेक्टर क्या चाहता है तू, यदि तूने आज के बाद मेरा पीछा करने की कोशिश की तो जान से मार दूंगा।” पुलिस अधिकारी चुपचाप वहां से चला गया और फिर कभी उसने आज़ाद का पीछा नहीं किया।


देश भक्ति और ईमानदारी आज़ाद में इतनी भरी थी की अपने पिता के इलाज के लिए उनके पास पैसे नहीं थे और जो पैसा उनके पास आता था उससे वे कारतूस खरीदते थे।एक बार उनका एक साथी नाश्ते में जब डबल रोटी ले आया तो उन्होनें नाराजगी दिखाते हुए कहा की “हमारा स्वागत गोलियों से होता है,हम एक एक पैसा जोड़कर कारतूस खरीदते है,इसलिये हमारा स्वागत आज के बाद खाने पीने की वस्तुओं से नहीं होना चाहिए।”

साइमन कमीशन ( SIMON COMMISSION) का विरोध करते लाला लाजपत रॉय ( LALA LAJPAT RAI) की अंग्रेज़ों ने जब लाठी डंडों से पीटकर हत्या कर दी तो क्रांतिकारियों का खून खौल उठा। चंद्रशेखर आज़ाद,भगतसिंह और साथियों ने इसके ज़िम्मेदार सांडर्स को सबक सिखाने की ठान ली। राजगुरु ने सांडर्स को निशाना बना कर उसके पुलिस कार्यालय के सामने ही ढेर कर दिया।भगतसिंह और राजगुरु को पकड़ने के लिए भागती पुलिस को अकेले आज़ाद ने रोक लिया और अपने अचूक निशाने से एक पुलिस को गोली मार दी।इस प्रकार आज़ाद ने अपनी जान पर खेलकर अपने क्रांतिकारी साथियों की रक्षा की।

भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ( BHAGAT SINGH, RAJGURU, SUKHDEV) की फांसी की सजा ने आज़ाद को बहुत दुखी कर दिया था। आज़ाद रात दिन अपने साथियों को जेल से छुड़ाने की योजना बनाते रहते और इसी बैचेनी में वे योजना सफल करने के लिए पैसे की व्यवस्था करने लगे। तमाम विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए भी आज़ाद ने हार नहीं मानी और अंततः भगतसिंह , राजगुरु और सुखदेव को जेल से भगा लेने की योजना बना ही ली। लेकिन ईश्वर को शायद कुछ और ही मंजूर था। भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव भागने के बजाय फांसी पर चढ़कर देश के युवाओं को क्रांति और देशभक्ति का सन्देश देना चाहते थे, उन्होंने आज़ाद की योजना पर ख़ामोशी ओढ़ ली। देश के लिए सब कुछ न्यौछावर करने वाले साथियों की मौत करीब आ रही थी और इसी दुःख में एक विश्वासघाती पर आज़ाद ने भरोसा कर लिया।

27 फ़रवरी 1931 को अमृतसर (AMRITSAR) के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों ने इस विश्वासघाती का सहारा लेकर अंततः आज़ाद को घेर लिया। एक वृक्ष की ओट से सैकडों पुलिस वालों को पछाड़ने वाले भारत मां के इस सच्चे सपूत ने आखिरी गोली खुद के लिए चुनी। चंद्रशेखर आज़ाद ने बहुत पहले ही ये कह दिया था कि “वे आज़ाद हैं और आज़ाद ही रहेगें,अंग्रेजों में इतना सामर्थ्य नहीं कि वे मुझे मार सके।”

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