देश को किस ओर ले जा रही हैं नफ़रत भरी ये वारदातें…

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                                           डॉ॰ ब्रह्मदीप अलूने

देश को किस ओर ले जा रही है मॉब लिंचिंग समेत नफरत की ये वारदातें? इस्लामी उम्मत दुनिया के सारे मुसलमानों को एक बताते हैं लेकिन भारत के मुसलमानों पर यह बात बिल्कुल लागू नहीं होती। मलयालम बोलने वाला मुसलमान उत्तर भारत में उतना ही अजनबी हो सकता है जितना उस इलाके का कोई और आम भारतीय। भारतीय मुसलमान ने हिन्दुस्तानी तहजीब की विभिन्नता कुछ ऐसी आत्मसात किया कि वह शिवाजी की नौसेना को भी सम्हालता था तो राणा प्रताप के साथ युद्द में भी उसने पूरी शिद्दत से अपना खून बहाया। जिन्ना जब इस्लाम के नाम पर अलग मुल्क की बात कह रहे थे तब देवबंदी हिंदुस्तान के साथ खड़े थे। यही कारण है कि धर्म के नाम पर अलग मुल्क बन जाने के बाद भी आज देश की कुल आबादी में मुसलमान 13.4 फ़ीसदी है जो तकरीबन 20 करोड़ की आबादी से ज्यादा है।

ये हिन्दुस्तान का मुसलमान है…

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इस्लाम की भारतीय विचारधारा इन मुसलमानों के खान-पान, रहन, सहन और जीने के तरीकों में देखी जा सकती है। राजस्थान का मुसलमान पगड़ी और मूंछों को अपनी सभ्यता और संस्कृति समझता है तो केरल का मुसलमान धोती में ही नजर आता है। मराठी मुसलमान आमचा महाराष्ट्र में गौरव महसूस करता है तो गुजराती मुसलमान व्यापार को ही अपना धर्म मानता है। यह पहचान उसकी दक्षिण अफ्रीका और अन्य देशों में भी देखी जा सकती है। तेलगु और तमिल बोलने वाले मुसलमान अपनी क्षेत्रीय पहचान और मान्यताओं को लेकर उतने ही मुखर है जितना अन्य कोई नागरिक।

भीड़ में वो कौन है…

लगभग 1500 साल से भारत की जमीन पर रहकर इसकी सेवा करने वाले मुसलमानों के विरोध को लेकर इस समय जिस तरह का रुख सामने आ रहा है वह स्तब्ध करने वाला है। गरीबी और पिछड़ेपन से जूझने वाले झारखंड के लोग रोजगार की तलाश में अक्सर दूसरे राज्यों में चले जाते हैं। झारखंड के धतकिडीज गांव के 22 साल के तबरेज अंसारी महाराष्ट्र में काम करते थे, ईद मनाने अपने गाँव आए थे, चार दिन बाद पुणे अपनी नव विवाहित बीवी के साथ लौटने वाले थे लेकिन अब वे दुनिया में नहीं है। एक वहशी भीड़ का वे शिकार बन गए और आरोप चोरी से लेकर मुस्लिम होने का भी।

देश को किस ओर ले ज रही मॉब लिंचिंग

Indian Muslims
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दरअसल पुणे से ईद मनाने आए तबरेज को भीड़ ने पीटा, कई घंटों तक उसे बंधक बना कर रखा इसके बाद उसे पुलिस को सौंप दिया गया जहां पुलिस ने मानवाधिकार से ज्यादा वैधानिक कार्रवाई की परवाह कर भीड़ के आरोप की परवाह की। पुलिस की इस वहशियाना अनदेखी का नतीजा भयावह ही होना था और नतीजतन मासूम शाइस्ता परवीन बेवा हो गयी। शाइस्ता की शादी बीते 24 अप्रैल को हुई थी और वह कुछ ही दिनों बाद अपने शौहर के साथ पुणे जाने वाली थी। तबरेज अंसारी के घर मातम पसरा हुआ है वहीं इस गाँव से कुछ ही दूरी पर एक सम्मान समारोह में केंद्रीय आदिवासी कल्याण मंत्री और इलाक़े के सांसद अर्जुन मुंडा बतौर मुख्य अतिथि शामिल भी हुए लेकिन तबरेज़ के परिजनों का हाल लेने नहीं पहुंचे।

इसके पीछे की सियासत समझें…

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90 के दशक से विकास के ऊँचे पायदान की दौड़ की बीच साम्प्रदायिकता ने भी  भारत में गति पकड़ी। इसमें हिन्दू और मुस्लिम कट्टरपंथियों का खूब योगदान रहा। यह फसल फली फूली भी और इससे सत्ता के रास्ते भी तय हुए लेकिन इसका इतना घिनौना रूप सामने आएगा,इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। सत्ता पाने की बदहवास चाहते जिस प्रकार ध्रुवीकरण को अंजाम दे रही है उसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भोगना पड़ सकता है। कल्पना कीजिये बंगाल के किसी मुस्लिम बाहुल्य इलाके में फेरी लगाने वाले किसी व्यापारी को उसका हिन्दू पता लगते ही लूट लिया जाए या मार दिया जाये। यह हालात देश के हिन्दू इलाकों में भी होने लगे तो अविश्वास ली खाईं गहरी होकर अलगाव की और मुड़ जायेगी और यह आतंकवाद नहीं गृह युद्द में तब्दील हो सकता है।

मानसिकता बदलने की ज़रूरत

सवाल किसी तबरेज अंसारी या कश्मीरी पंडितों का नहीं है,सवाल उस मानसिकता का है जो जात और धर्म के नाम पर किसी को भी मार देने को आमादा है। यह कबीलाई संस्कृति अकबर या शिवाजी के समय कभी नहीं दिखाई दी। इसलिए मुगलों ने न तो भारत को इस्लामिक बनाने की कोशिश की न ही अंग्रेजों के समय यह देश ईसाई बन पाया। भारत में दलित,आदिवासी और मुसलमान इस समय एक खास विचारधारा के निशाने पर है। इन समुदायों की आबादी भारत की कुल आबादी के आधे के करीब है।


देश को किस ओर धकेल रही उन्मादी भीड़

जाहिर है इन समुदायों की महिलाओं के साथ बलात्कार,उन्मादी भीड़ के द्वारा मार देने की घटनाएँ,सिर मुंडा कर उन्हें घुमाने की कोशिशें और इसके बाद पुलिस की अपराधियों के पक्ष में लामबंदी के दीर्घकालीन परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते है। अभी तक वंचित वर्ग का समाज गरीबी और बेकारी के कुचक्र से जूझ रहा है और उसने प्रतिकार करना सीखा नहीं है लेकिन अन्याय से उपजे हिंसक प्रतिकार का प्रतिफल देश को भोगना पड़ सकता है। अत: भारत के समाज को देश हित में इस पर चिंतन और मनन करने की जरूरत है।