जहां दुल्हा नहीं, दुल्हन को ब्याहकर लाता है ‘छुरा’

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डॉ. महेन्द्र बदरेल

क्या आपने सुना है ऐसी जगह के बारे में जहां दुल्हा नहीं, दुल्हन को लेने छुरा ( KNIFE)  यानी एक छोटी सी तलवार जाती है। देव परंपरा पहाड़ी क्षेत्रों मे मजबूत नींव के साथ आज भी बखूबी खड़ी है। जहां पाश्चात्य संस्कृति दिन-प्रतिदिन हावी होती जा रही है। वहीं ऐसे क्षेत्र भी है, जो अपनी पारंपरिक संस्कृति को जीवंत रूप से अपनाए हुए हैं। ऐसी पारंपरिक संस्कृति जिसे अपनाना तो दूर इसे निभाना आम आदमी के बस की बात नहीं है, लेकिन जिला शिमला से 130 किमी दूर रामपुर के नरैंण पंचायत के कुछ गांव इस संस्कृति को पिछले कई वर्षाे से बखूबी निभा रहे हैं। उक्त पंचायत के कई गांव मे दुल्हन को लाने दूल्हा नहीं बल्कि छुरा जाता है। ये बात भले ही अजीब लगे लेकिन रामपुर के नरैंण पंचायत के कुछ गांव मे 21वीं शताब्दी में कदम रखने के बाद भी ग्रामीण देव आस्था को बखूबी निभा रहे हैं।

 पंचायत ने बरकरार रखी है परपंरा

इस पंचायत के खशधार, कुरनू, शरन, जराशी में आज भी इस पुरातत्व आस्था को कोई लांग नही पाया है। आज भी यहां न तो कोई दुल्हा दुल्हन को लेने आया है और न ही गया है। दुल्हे के बदले यहां पर दुल्हे का भाई छुरा लेकर आता है। दुल्हन के घर मे जो भी शादी की परंपरा पूरी की जाती है वह छुरे के साथ ही पूरी की जाती है। शादी पूरे विधि विधान से पूरी होती है। दुल्हन को लाने के लिए पूरी तैयारी के साथ दुल्हे के रिश्तेदार व दोस्त जाते है। केवल बारात मे एक कमी होती है जिस गाड़ी मे दुल्हन को लाना होता है उस गाड़ी मे दुल्हे के बदले छुरा थामे भाई बैठा होता है। बारात को दुल्हा अपनी आंखो के सामने अपनी अर्धागिनी को लेने के लिए रूखस्त करता है और उनके आने की प्रतिक्षा करता है।

ग्रामीणों का कहना है कि काफी वर्षो पहले यहां पर जब दुल्हा आया और गया तो शादी के कुछ दिनों बाद ही उसकी आकस्मिक मौत हो गयी। जिसके बाद ये अंधी आस्था आज तक यहां कायम है। इस आस्था की लक्ष्मण रेखा को कोई भी परिवार पार नही करना चाहता। इन गांव के लोगों ने शादी तो करनी है लेकिन दुल्हा बन कर कोई अपनी जान को जोखिम में नहीं डालना चाहता। गौरतलब है कि नरैंण पंचायत मे और भी कई गांव है लेकिन ये आस्था केवल इन चार गांवों मे ही बंधी हुई है। अब ये अजीबोगरीब आस्था इन गांव मे कब तक रहेगी ये कहना मुश्किल है। फिलहाल इन गांवों मे बिना दूल्हे की बारात का क्रम जारी है।

सात जन्मों का बंधन केवल आस्था में

किसी भी शादी मे सात फेरे काफी अहम होते है। ये ही वे क्षण होते है जब दुल्हा दुल्हन सात जन्मों के लिए एक हो जाते है लेकिन इन गांवो मे शादी के फेरे नही होते। फेरों का क्रम वधु पक्ष के घर में होता है लेकिन जब दुल्हा नहीं जाता तो सात फेरों की प्रक्रिया भी नहीं होती। इन गांवों मे देवता का आर्शीवाद ही सर्वोपरि है। आस्था ये है कि अगर देवता का आर्शीवाद मिल जाता है तो वैवाहिक जीवन सुख से कट जाता है और परिवार मे हमेशा खुशियां रहती है।

प्रेम पर भी देवता की मुहर लगना जरूरी

इस क्षेत्र मे कोई युवक यदि किसी युवती से प्रेम करता है और युवा विवाह बंधन मे बंधना चाहता है तो देवता से पूछना जरूरी है कि वह उस लडक़ी से शादी करे या नही, अगर देवता ने अपनी हामी भर दी तो विवाह पारंपरिक तरीके से ही पूरा होता है, लेकिन देवता ने अगर अपनी सहमति व्यक्त नही की तो युवक-युवती का प्रेम का सफर वहीं समाप्त हो जाता है, अगर किसी युवक या युवती ने देवता की मनाही के बाद भी शादी कर दी तो उनपर मुसीबत आना तय है। ये आस्था यहां पर मजबूती के साथ बरकरार है।

क्या कहते है क्षेत्र के लोग

ऊपरी शिमला देव परंपरा का गढ़ माना जाता है यहां पर कोई भी कार्य बिना देवी देवता की अनुमति के बिना नही होता। नरैंण पंचायत के प्रधान नरेश चौहान का कहना है कि शादी मे दुल्हे के बदले छुरे का जाना व आना वर्षाे से चला आ रहा है जिससे वैवाहिक जोड़ों के प्रति शुभ माना जाता है। इस क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति देवता से बाहर नही जाता फिर चाहे उस पर शहरी आधुनिकता कितनी ही चढ़ी हो। देवता सर्वोपरि हैं।