जब जिन्ना को गांधी ने प्रधानमंत्री बनाना चाहा..

डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

मोहम्मद अली जिन्ना, गांधी को पाकिस्तान के निर्माण की राह में सबसे बड़ा रोड़ा समझते थे। जिन्ना की पाकिस्तान की अंग्रेजों से मांग पर गांधी ने पूरे विश्वास से कहा था -“अंग्रेजों के भारत से चले जाने के बाद स्वतंत्रता के वातावरण में दोनों सम्प्रदाय मिलजुल कर रहना सीख लेंगे और बंटवारे की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।”जिन्ना को गांधी के इस विश्वास से इतना डर लगता था की वह आज़ादी के पहले ही बंटवारे की बात पर अड़ गए। गांधी का साफ मत था की स्वतंत्रता के वातावरण में ही विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों के परस्पर विरोधी दावों को सही ढंग से निपटाया जा सकता है।

कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार चुनाव हुए तो कांग्रेस ने अपने समर्थकों के साथ 212 सीटों पर परचम लहराया वहीं मुस्लिम लीग सिर्फ 73 सीटों पर सिमट गयी। लन्दन से शिक्षा प्राप्त कर आधुनिक जीवनशैली जीने वाले जिन्ना कभी धर्मनिरपेक्षता का नकली चोला ओढ़कर देश का बड़ा नेता बनने का ख्वाब देखते थे।वास्तव में वे सौदेबाजी की राजनीति के माहिर खिलाडी थे जो जमीदारों और सामन्तों के हितों के रक्षक थे। यही कारण था की सामान्य मुस्लिम का भरोसा महात्मा गाँधी और कांग्रेस पर था और और मुस्लिमों ने बड़ी संख्या में कांग्रेस पर भरोसा जता कर जिन्ना के प्रधानमंत्री बनने के सपनें को चकनाचूर कर दिया था। हिन्दू,मुसलमान और अंग्रेजों पर गांधी के प्रभाव से जिन्ना को जब लगने लगा की पाकिस्तान बनना मुश्किल है तो उन्होंने साम्प्रदायिक दंगों का खतरनाक दांव खेला।इस बार जिन्ना की यह चाल कामयाब रही और पूरा देश झुलस गया। मार्च 1947 में मुंबई में जिन्ना ने मुसलमान पत्रकारों से कहा ‘‘हमें अपनी दोनों टांगों पर खड़ा होना होगा, हमारी विचारधारा, हमारा मकसद और हमारे बुनियादी उसूल न केवल हिंदू संगठनों से अलग है बल्कि उनके टकराव में खड़े हैं। हमारी जनता का गौरव कायम रखने और उसके लाभ के लिए इसके अलावा और कोई समाधान नहीं है,इंशाल्लाह हमें पाकिस्तान मिलकर रहेगा।”
संविधान सभा में सभी समुदाय मिलकर देश की एकता और अखंडता को मजबूत कर रहे थे,वहीं जिन्ना नाटकीय रूप से माउन्टबेटन सौदेबाजी में मशगूल थे। वे कांग्रेस के बहुमत को बहुसंख्यक हिन्दुओं का शासन बताकर मुस्लिम भावनाएं भड़का रहे थे।जिन्ना के कुत्सित इरादों को गाँधी बखूबी जानते थे,लेकिन वे किसी भी कीमत पर देश का विभाजन रोकना चाहते थे।गांधी ने माउन्टबेटन से करीब दस घंटे बात की और मुस्लिम लीग के अल्पमत में होने के बावजूद जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने का भी प्रस्ताव रखा।उन्होंने माउन्ट बेटन से कहा कि मिस्टर जिन्ना को सरकार गठित करने का पहला मौका दिया जाना चाहिए।अगर मिस्टर जिन्ना यह प्रस्ताव स्वीकार कर लें तो कांग्रेस ईमानदारी से और खुल कर सहयोग की ग्यारंटी करे। शर्त यह है कि मिस्टर जिन्ना की मंत्री परिषद् जो भी कदम उठाए वे कुल मिलाकर भारतीय जनता के हित में हो। वास्तव में देश को विभाजन से बचाने का ये अनूठा तरीका गांधी ने अपनाया था।गांधी जिन्ना की ऊँची राजनीतिक हसरतों से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्हें लगता था कि जिन्ना को सत्ता सौंपकर भारत का विभाजन रोका जा सकता है।हालाँकि गांधी के इन विचारों से कभी जिन्ना को अवगत कराया ही नहीं गया।

गांधी संकल्पित होकर लगातार प्रयास कर रहे थे कि चालाक जिन्ना को मना लिया जाए लेकिन वक्त को शायद यह मंजूर नहीं था। जिन्ना ने कहा कि मिस्टर गांधी के विचारों का आजाद भारत हमारी धारणा से बुनियादी रूप से अलग है।जिन्ना लगातार मुस्लिमों को भड़काने की राजनीति में मशगूल रहे।अप्रैल 1943 में नई दिल्ली में मुस्लिम लीग का सालाना अधिवेशन हुआ जिसमें मुस्लिम बहुल इलाकों को मिलाकर एक मानचित्र लगा था और उसके ऊपर लहराते हुए झंडे पर लिखा था कि ‘‘भारत की आजादी पाकिस्तान में निहित है।‘‘ जिन्ना ने जब इस अधिवेशन को संबोधित किया तो कायदे आजम जिंदाबाद और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगने लगे और यह भारत के खंडित होने की तरफ बड़ा इशारा था।

भारत की सांप्रदायिक समस्या कितनी विकट थी कि इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके कारण ब्रिटिश अधिकारी मोर्ले,मान्टेस्ग्यू के हाथ सिर्फ निराशा लगी थी। तमाम कोशिशों के बावजूद रामसे मेकडॉनल्ड कुछ भी हासिल नहीं कर पाए थे, इरवीन इसकी जटिलता से भौंचक्के रह गए थे, मोतीलाल नेहरू की जिंदगी इसमें पूरी खप गई थी वहीं गांधी गरीबी, दरिद्रता और सांप्रदायिकता से संघर्ष करते रहे फिर भी सांप्रदायिक राजनीति के पुरोधा पाकिस्तान बनाने में कामयाब हो गये।

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