वेलेंटाइन स्पेशल: प्रेमी के विवाह पर इन महामंडलेश्वर के छलक पड़े थे आंसू..

   डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

#alovestoryof mahamandleshwar गुलाबी धोलपुरी पत्थरों से सजे जयपुर में भगवान कृष्ण का प्रसिद्ध बिना शिखर का मंदिर है। इसे जयपुर के मशहूर राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने अपने परिवार के देवता के रूप में यहां स्थापित किया था। इसी मंदिर के अहाते में प्रवि और प्रीत का प्रेम परवान चढ़ा। यह मंदिर उन्हें एहसास कराता था कि प्रेम का कोई शिखर नहीं होता क्योंकि इसकी कोई सीमाएं नहीं होती।

इस प्रेम कहानी की शुरुआत 1989 में हुई जब वे दोनों जयपुर (jaipur)  के एक स्कूल में 10 वीं कक्षा में पढ़ते थे। प्रवि और प्रीत साथ साथ खेलते, दूसरों की खुशियों में शामिल रहते और एक दूसरे के बिना एक पल भी उनका रहना मुश्किल होता।

वे गर्मी की छुट्टियों में साथ घूमने भी जाते । उन्हें उंचाइयों पर जाने और जीने का इतना शौक था कि वे हिमालय की उच्च शिखर को छूते हुए अमरनाथ हर साल जाने लगे। उन्होंने माउन्ट आबू में भी सुकून के बहुत सारे पल बिताये। शिमला की हसीन वादियों में बिताये यादगार और अंतरंग पलों की यादें उन्हें रोमांचित करती रही।

अनगिनत सपनों और अभिलाषाओं के साथ उनका यह सफर साथ साथ चलता रहा और तकरीबन एक दशक बीत गया । बीसवीं सदी अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रही थी और ऐसे समय में प्रवि ने प्राची को बताया कि उसके माता-पिता उसके लिए लड़की देख रहे है और जल्दी ही उसकी शादी होने वाली है। प्रीत के लिए यह बेहद अप्रत्याशित और सदमे जैसा था।

प्रीत को यह एहसास था कि वह किन्नर ( है लेकिन प्रवि पर एतबार भी खूब था । भला साथ रहने और जीने के लिए स्त्री-पुरुष का होना आवश्यक है । वह बार बार अपने से पूछती और इन्हीं विचारों से जूझती रहती । आखिर वह दिन भी आ ही गया जब प्रवि ने अपने नये हमसफर को चुना और उसके साथ विवाह बंधन में बंध गया । अपनी हसरतों को उजड़ते देखना प्रीत ने स्वीकार कर लिया था और इसीलिए उसने एक होटल में प्रवि के गोल्डन नाइट की व्यवस्था करवाई। अब वह वक्त भी सामने आ गया जब  प्रवि होटल में कमरें में प्रवेश करने वाला ही था कि प्रीत उसे पकड़ कर रोने लगी। यकीनन उसका संयम टूट चुका था और वह प्रवि को अंदर नहीं जाने देना चाहती थी । अचानक उसके एक दोस्त ने आकर उसे समझाया कि प्रीत यह क्या कर रही हो । यदि दुल्हन को यह पता लग गया तो अनर्थ हो जाएगा।

प्रीत के आंसू थम नहीं रहे थे और अब प्रवि उसे छोड़कर अंदर चला गया था।दर्द और सदमे के साथ प्रीत हमेशा के लिए वहां से चली गई।वह समझ चुकी थी कि नियति ने उसके भाग्य में बलिदान लिखा है।

पिछले साल जयपुर के एक मंदिर में प्रवि और प्रीत का आमना सामना हो गया। लगभग 18 साल के बाद प्रवि और प्रीत के सामने साथ बिताया दौर मानों सामने आ गया । प्रीत का बेहद बदला हुआ रूप, मस्तक पर बड़ा सा टीका और विशाल व्यक्तित्व । वह बोला-मुझसे दूर होने के बाद तुमने वैराग्य ले लिया । “प्रीत मुस्कुराने लगी लेकिन उसने अपनी ख़ामोशी को बनाये रखा।

दरअसल यह मुस्कुराहट प्रीत की नहीं किन्नर अखाड़े की राजस्थान की महामंडलेश्वर पुष्पा माई  की थी । पुष्पा को प्रीत नाम तो प्रवि ने ही दिया था । समय काल के धुन्धलके  में खो गया लेकिन यादें अब भी बनी हुई है ।पुष्पा माई के घर में रखे बहुत सारे टेडी बीयर बीतें दिनों के वेलेंटाइन डे की यादों को ताजा करते है ।

प्रवि पंजाबी था इसलिए पुष्पा माई का पहला फेसबुक आईडी प्रीतो कौर के नाम से बनाया गया । उनका पर्सनल ईमेल आईडी अब भी प्रीत कौर  के नाम से ही है ।

पुष्पा माई अब इस देश का बड़ा नाम है और उनका  लक्ष्य किन्नर समाज की बेहतरी है । प्रवि अब कहीं और अपनी जिंदगी गुजर बसर कर रहा है और वह खुश भी है । वहीं पुष्पा माई को शायद इसका कोई मलाल भी नहीं है क्योंकि वे यह जानती है कि प्रेम का कोई शिखर नहीं होता क्योंकि इसकी कोई सीमाएं नहीं होती।

 

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