पॉजिटिव सोचें, कमियां गिनाएंगे तो हो जाएगा यह रोग…

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पॉजिटिव सोचें: जीवन में कमियां ही नहीं खुशियां भी हैं,वह भी ढेर सारी। ऐसी सोच बाकायदा एक बीमारी मानी जाती है । साइकोलोजिस्ट इसे  ‘मिसिंग टाइल सिंड्रोम’ कहते हैं । जिसमें इंसान का ध्यान  सिर्फ  कमी  की ओर रहता है । मन हर हाल में अभाव को ही देख पाता है । कभी-कभी तो सारा फोकस जिंदगी की एक कमी तक ही सिमटकर रह जाता  है । यह बात जिंदगी की खुशहाली छीनने वाली है । दुःख और असंतुष्टि अहम वजह है । जो कुछ जिंदगी में आपके हिस्से है, उसे जीने में बाधा बनती है । ऐसे व्यवहार  में बदलाव जरूरी है । http://www.indiamoods.com/is-happiness-a-serious-problem-do-you-have-missing-tile-syndrome/

हैप्पीनेस इज़ अ सीरियस प्रॉब्लम – अ ह्यूमन नेचर रिपेयर मैनुअल के लेखक  डेनिस प्रेगर के मुताबिक ‘उन चीजों पर ध्यान देना जो हमारे जीवन में नहीं है, आगे चल कर हमारी ख़ुशी को चुराने का सबसे बड़ा कारण बन जाती हैं। इसीलिए बेहतरी देखने की सोच ही खुशियां बढ़ा सकती है ।

पॉजिटिव सोचें- खो ना  जाएं खुशियां

The autumn flower of sun flare.
The autumn flower of sun flare.

जिंदगी में अगर कमियां ही कमियां  दिखती हैं तो आप अपनी खुशियों से खुद दूरी बना रहे हैं । यह  समझना  बेहद जरूरी है कि किसी की जिंदगी परफेक्ट नहीं होती । जो मिसिंग है उसकी बजाय जो कुछ मौजूद है, आपके हिस्से है, उसे देखने-जीने का नज़रिया आपके सुख को मल्टीप्लाई कर सकता है । खुशियों को कई गुना बढ़ाकर आपकी झोली में  डाल सकता है । क्योंकि सुख जीवन के कई अनदेखे-अनजाने पहलुओं से भी जुड़ा होता है । इसीलिए जिंदगी को कमियों के साथ नहीं  बल्कि कंप्लीटनेस के साथ देखिये ।

इतनी भर कोशिश कीजिये और  उस सुख को भी अपनी खुशियों में जोड़ लीजिये जो सिर्फ सुविधाओं की भीड़ से नहीं मिलता ।  ऐसी कई खुशियां जिंदगी में जो मिला है, उसे लेकर संतुष्ट होने  की सोच से मिलती हैं  ।

पॉजिटिव सोचें- संवेदनशील  मन की सौगात

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जो है, जितना है  उसे  लेकर मन में संतुष्टि हो तो सोच और व्यवहार दोनों ही मोर्चों पर आप संवेदनशील बनते हैं ।  किसी से कोई ईर्ष्या नहीं । कोई प्रतिस्पर्धा नहीं । अपनी सोच और समझ आगे बढ़ते रहने के चलते आप बेहतरी की ओर ही बढ़ते हैं ।  दूसरों के प्रति सेंसिटिव होना खुद अपने आपको को भी दिली खुशी देता है । यूं भी किसी के अमन को ठेस पहुंचाकर खुद खुश नहीं जा सकता । देखने में आता है कि जो लोग  खुद अपनी जिंदगी में हरदम  खामियां ही देखते हैं उनके बिहेवियर में दूसरों के प्रति भी कटुता आ जाती है ।

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अपनी चाहतों, जरूरतों और ज़िंदगी की हकीकत की मिली-जुली तस्वीर में जो खुशियों के रंग नहीं भरते वे संवेदनशील होने के सुख को नहीं जी पाते ।  जबकि  संवेदनशीलता का भाव सराहना, सहजता और सहानुभूति का पूरा पैकेज है ।

पॉजिटिव सोचें-शुक्रगुज़ार होने ज़रूरी

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आपकी खुशियों में सुख के और रंग भी जुड़  जायेंगें जब आप जो है उसके लिए आभारी होने का भाव रखने लगेंगे । इसीलिए जीवन  में मिली अच्छी चीजों और स्नेहभरे रिश्तों के लिए शुक्रगुजार होना सीखिये । यहां तक कि  अपने आलोचकों और नाकामयाबियों को भी शुक्रिया कहिए । क्योंकि जीवन से जुड़ी हर खट्टी-मीठी बात इस सफर को  खास बनाती है ।

सेल्फ इमप्रूवमेंट में मददगार बनती हैं । हां, इन चीजों से जुड़ी बातों में सिर्फ कमियां देखना सही नहीं है । हर उतार-चढ़ाव को धन्यवाद देना सीखें जो आगे बढ़ते हुये आपको मिले  हैं । यह सोच तकलीफ़ों में भी  खुशियां  ढूंढना  सीखा देगी  । जिंदगी में मिली नेमतों के प्रति शुक्रगुजार होने का सुख खुशियों को कई गुना बढ़ा देता है ।

सुकून और ठहराव का सुख

positiv thoughts
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जिंदगी को  जब कमियों के साथ नहीं  बल्कि कंप्लीटनेस के साथ देखा जाता है तो दिलो-दिमाग को सुकून मिलता है । आज के दौर की  भागमभाग में जब सुकून कहीं खो सा गया है ।  ऐसे में यह मन का चैन खुद के हिस्से करना बड़ी बात है ।  पर सच यह भी है  कि इस सुकून को संतुष्टि के बिना नहीं पाया जा सकता । जिंदगी को  कमतरी  के मोर्चे पर देखते हुये मन कभी सहज नहीं रह सकता ।  इसीलिए अपनी जिंदगी में खामियां निकालने से पहले सोचिए कि हो सकता है किसी और के पास इतना सब  भी  ना  हो ।

किसी और के जीवन का  सफर आपसे कहीं ज्यादा मुश्किल रहा हो । खुश रहने और खुशियों को मल्टीप्लाई करने का यह फ़ोर्मूला हमेशा मन को शांत और सहज रखता है ।   जिंदगी  एक  सफ़र  के समान  ही है । इसके खूबसूरत पड़ावों को जीने के लिए जरा रुकना भी होता है । ठहरकर सोचना और समझना भी होता है कि कितना खूबसूरत सफ़र रहा है आपका । सब कुछ पा लेने के इरादे से  जिंदगी की रफ्तार तो बनी रहती है पर कई सुंदर पड़ाव मिस हो जाते हैं ।

ऐसे में यह समझना जरूरी है कि मन को चैन-सुकून ही ना हो, जिंदगी में ठहराव ही ना तो इस भागमभाग के क्या मायने हैं ?  यह  ठहराव तभी संभव है जब खुद की जिंदगी को लेकर संतुष्टि का भाव मन  में हो ।  ऐसे सुखद ठहराव को जीने के लिए अपनी झोली में आई खुशियों को देखें ना कि कमियों को ।

अपनों के साथ की ख़ुशी

जिंदगी के हर पहलू को लेकर नाखुशी रखना रिश्तों से जुड़ी खुशियों को जीने में भी बाधा बनता है । अपनों के साथ को जीना है तो जो आपको मिला है, उसे लेकर मन में तसल्ली होना जरूरी है । यह समझना जरूरी है कि सिर्फ कमियों के बारे  में सोचकर अपनों स्नेह ना तो पाया जा सकता है और ना ही उनके साथ प्यार से  जिया जा सकता है ।

अपनों के साथ से मिलने वाले संबल  को जी भरकर जीना है तो जिंदगी को पूर्णता के साथ देखिये ।  जिसमें कुछ छूटा है तो बहुत कुछ आपके साथ भी है । यही सोच खुशी की वो राह है जिसपर चलते हुये अपनों से जुड़ी खुशियां कई गुना बढ़ जाती हैं । उस सुख को जिया जा सकता है जो कमियों के बारे में सोचते हुये कभी नहीं मिल सकता ।