सदियों बाद भी कायम है महाभारत कालीन बिशु मेले की परंपरा

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बिशु मेले की परंपरा: पहाड़ी राज्य हिमाचल के ऊपरी इलाकों में आज भी बिशु मेला मनाये जाने की परंपरा कायम है। बिशु मेला देवताओं के सम्मान में आयोजति होता है। देव परंपरा से जुड़े होने के कारण देवभूमि के दूर दराज इलाकों में इनका आयोजन करवाना जरूरी माना जाता है। बिशु मेले में तीर कमान से होने वाला महाभारत का सांकेतिक युद्ध अथवा ठोडा नृत्य मुख्य आकर्षण रहता है।

क्या है ठोडा

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यह एक प्रकार को पारंपरिक खेल( TRADITIONAL GAME) है। जब हमारी तकनीक से पहुंच बहुत दूर थी, मनोरंजन के सीमित साधन थे, तब बिशु से बड़ा आयोजन पहाड़ी इलाकों में कोई नहीं माना जाता था। इनमें मनोरंजन का ज़रिया था ठोडा खेल।

इस खेल में दो दल ( TWO TEAMS) होते हैं। दोनों दल विशेष परिधान पहन कर क्षत्रिय वीरगाथा गाते व ललकारते हुए एक दूसरे पर तीरों से प्रहार करते हैं। यह प्रहार टांगों पर घुटने के नीचे किये जाते हैं, जो दल सबसे अधिक सफल प्रहार करता है उसे विजेता घोषित किया जाता है ।

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दोनों टीमें तीरकमान, डांगरे (फरसे) व लाठियों से सुसज्जित होती हैं। फरसे लहराते हुए जब ये दल पांरपरिक नृत्य करते हैं तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। पांरपरिक वाद्य यंत्रों के साथ बजने वाले गीत और एक दूसरे को ललकारने वाले बोल सबका मन मोह लेते हैं।

ये झलक रविवार को चौपाल क्षेत्र के थुंदल-शरान में आयोजित बिशु मेले की है…./ video

बिशु मेले का इतिहास

हिमाचल के अलग -अलग हिस्सों में बिशु मेले लगते हैं। सिरमौर के अलावा शिमला के चौपाल तथा उत्तराखंड के जौनसार इलाके के कई गांव में भी महाभारत कालीन बिशु मेले को मनाए जाने की परंपरा कायम है। पांच दशक पूर्व तक हालांकि इन मेलों में कई बार शाठी व पाशी खेमों के बीच में होने वाले धणू-शोरी यानी तीर कमान से इस खेल के दौरान गैंगवार भी होती थी, मगर अब केवल एक खेल अथवा मनोरंजन के लिए ग्रामीण एक-दूसरे पर तीर चलाते हैं।

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नियमानुसार केवल विशेष पौशाक अथवा सुथण पहनने वाले धनुर्धर की टांगों पर ही सूर्यास्त से पहले तक दूसरा योद्धा वार कर सकता है।

खुद को कौरव का वंशज मानने वाले शाठी व पांडव वंश के कहे जाने वाले पाशी खेमों अथवा खुंदो द्वारा परंपरा के अनुसार इन मेलों में एक-दूसरे को युद्ध के लिए मैदान में ललकारा जाता है। कुल देवता की अनुमति के बाद जंग बाजा कहलाने वाले पारंपरिक वाद्य यंत्रों की ताल पर बिशु दल के सैकड़ों लोग धनुष-बाण व लाठी फरसे के साथ दूसरे खेमे को चुनौती देते हुए मैदान में पहुंचते हैं।

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बीते कुछ सालों में इन मेलों में काफी बदलाव आया है तथा सांस्कृतिक संध्याएं व खेलकूद प्रतियोगिताएं बिशु का मुख्य आकर्षण बन चुकी है। मेला बाजार में खरीददारी, मिठाई व फास्ट फूड तथा झूला झूलना भी बदलते परिवेश मेले का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।

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Bishu Mela

The tradition of the Mahabharata carnival Bishu Mela is maintained even after centuries क्षत्रिय खेलते हैं ठोडा

यह भी काबिले गौर है कि बिशु मेले में केवल क्षत्रिय ही तीर कमान और फरसे लेकर मैदान में ठोडा खेलने उतरते हैं। इसे मूल रूप से क्षत्रियों का ही खेल माना जाता है। देव परंपरा से जुड़े हैं और सदियों से उनका आयोजन होता आ रहा है। इन मेलों में प्राचीन काल से इस परंपरा से जुड़े परिवार ही भाग लेते हैं।

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पुरानी परंपरा के मुताबिक हर देवठी यानी देवी के फॉलोअर्स का अपना एक खूंद होता है। ये खूंद क्षत्रिय परिवारों के ही होते हैं और युवा ठोडा खेल अपने पूर्वजों से सीखते आ रहे हैं। हर खूंद देवी दुर्गा और कुछ कुल देवताओं के उपासक माने जाते हैं।