‘बाबा का ढाबा’ में वापस लौटे मालिक, फूड ब्लॉगर गौरव वासन से मांगी माफी, पहले बताया था चोर

baba ka dhaba

‘बाबा का ढाबा’ —कहते हैं कि शोहरत कमाना आसान है लेकिन उसे संभालना उतना ही मुश्किल…..ये बात बाबा का ढाबा (Baba Ka Dhaba) के मालिक बुजुर्ग कांता प्रसाद (Kanta Prasad) पर सटीक बैठती है। कांता प्रसाद एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इन दिनों  सोशल मीडिया (Social Media) पर  उनका एक वीडियो वायरल हो रहा है। जिसमें वो ब्‍लॉगर गौरव वासन (Blogger Gaurav Wasan) से माफी मांगते हुए दिखाई दे रहे हैं।

हमसे गलती हुई शर्मिंदा हैंः बाबा कांता प्रसाद

बाबा कांता प्रसाद वीडियो में हाथ जोड़ते हुए कह रहै हैं कि उन्‍होंने ब्‍लॉगर गौरव वासन को कभी चोर नहीं कहा। उन्‍होंने माना कि उनसे कुछ गलतियां हुई हैं और उसके लिए वह शर्मिंदा हैं और माफी मांगते हैं। गौरव वासन वही सख्स हैं जिन्होने बाबा की कहानी दुनिया के सामने लायी थी।

गौरव वासन को ‘बाबा का ढाबा’ मालिक ने बताया था चोर

बाबा ने गौरव वासन पर पैसे हड़पने का आरोप लगाया था। बाबा ने गौरव को चोर तक कह डाला था और चंदे में हेराफेरी का मामला दर्ज कराया था। जिसके बाद ब्लॉगर गौरव वासन को अपने बैंक स्टेटमेंट दिखाकर सफाई देनी पड़ी थी। वासन ने कहा था कि अगर कोई किसी की मदद करता है और उस पर इस तरह के आरोप लगते हैं तो वो आगे किसी की भी मदद करने से पहले कई बार सोचेगा। इस विवाद के बाद कांता प्रसाद के रेस्‍तरां में लोगों ने आना कम कर दिया हालात इतने बिगड़ गए कि कांता प्रसाद को वापस ढाबे की दुकान लगानी पड़ रही है।

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किसी फिल्म से कम नहीं कांता प्रसाद की कहानी

पिछले लॉकडाउन में दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर के ‘बाबा का ढाबा’ की कहानी देशभर में चर्चित रही थी। सड़क किनारे छोटा सा ढाबा चलाने वाले कांता प्रसाद रातों रात मशहूर हो गए थे क्योंकि एक फूड ब्लॉगर ने उनका एक वीडियो बनाया, जिसमें 80 साल के बाबा का ढाबा के मालिक कांता प्रसाद रो रहे थे और कह रहे थे कि लोग उनके यहां खाने नहीं आ रहे हैं और उनकी दुकान नहीं चल रही है।

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सोशल मीडिया पर ये वीडियो वायरल हुआ तो उनके लिए मदद का हाथ आगे बढ़ने लगा। देखते ही देखते कांता प्रसाद के दिन बदल गए और उन्‍होंने ढाबे से सीधे रेस्‍तरां खोल लिया।

‘बाबा का ढाबा’ की कहानी

लौट के बाबा ढाबा आए

अब जब कोरोना की दूसरी लहर में एक बार फिर लॉकडाउन लगा तो कांता प्रसाद के सामने पैसों का संकट खड़ा हो गया। उन्‍होंने वापस अपनी पुरानी दुकान में ही आना समझदारी समझी. कांत प्रसाद का कहना है कि रेस्टोरेंट का किराया, स्टाफ़ की तनख्वाह, बिजली, पानी और अन्य खर्च मिला कर करीब 1 लाख महीने की लागत थी, जबकि आमदनी 30-45 हज़ार थी इसलिए हमने रेस्टोरेंट बंद कर दिया और वापस ढाबे पर आ गए हैं।