The cause of the crisis -कैसे राजनीतिक और आर्थिक कुप्रबंधन ने Srilanka में उथल-पुथल पैदा कर दी

The cause of the crisis
The cause of the crisis

The cause of the crisis-श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने औपचारिक रूप से 15 जुलाई, 2022 को इस्तीफा दे दिया जो दक्षिणी एशियाई राष्ट्र में व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बीच देश छोड़कर भाग गए थे। प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने उनकी जगह ली और अब वह अंतरिम राष्ट्रपति भी हैं। उन्हें भी राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल के बीच विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। परिस्थितियां कुछ ही दिनों में बहुत आगे बढ़ गईं और राष्ट्रपति के महल तथा प्रधानमंत्री के निवास दोनों पर प्रदर्शनकारियों ने कब्जा कर लिया। वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर नील डेवोटा का तर्क है कि ऐसा संकट उत्पन्न होने में वर्षों लगते हैं। द कन्वरसेशन यू एस ने इस बारे में डेवोटा से बातचीत की जो श्रीलंका में पले-बढ़े हैं और दक्षिण एशिया के राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हैं। उनसे पूछा गया कि श्रीलंका में संकट कैसे पैदा हुआ और दो करोड़ 20 लाख की आबादी वाले देश की दिशा यहां से किधर जाती है। क्या आप नवीनतम घटनाओं के बारे में हमसे बात कर सकते हैं?
श्रीलंका में जो हुआ वह वास्तव में काफी क्रांतिकारी है। देश के इतिहास में पहली बार, राष्ट्रपति ने इस्तीफा दिया – और बहुत ही अपमानजनक स्थिति में। गोटबाया राजपक्षे ने पहले पद छोड़ने के अपने इरादे की घोषणा की थी, लेकिन तुरंत ऐसा नहीं किया, क्योंकि यदि वह ऐसा करते तो राष्ट्रपति के रूप में अभियोजन से मिली उनकी छूट खत्म हो जाती। इसके बजाय वह देश छोड़कर भाग गए, पहले मालदीव और फिर सिंगापुर चले गए। कुछ लोगों का दावा है कि वह अब सऊदी अरब जाना चाहते हैं – यह सब आश्चर्यजनक है क्योंकि दुबई, मालदीव और सऊदी अरब मुस्लिम देश हैं, तथा राष्ट्रपति के रूप में राजपक्षे पर सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के लिए इस्लामोफोबिया को प्रोत्साहित करने का आरोप लगा था। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास को छोड़ दिया है, लेकिन आंदोलन केवल आंशिक रूप से ही सफल हुआ है। वे राजपक्षे और उनके भाई को हटाना चाहते थे, लेकिन अनेक लोग प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को भी हटाना चाहते थे। इसके बजाय, विक्रमसिंघे ने अब अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली है, जो संसद के लिए नहीं चुने गए थे और केवल एक राष्ट्रीय सूची के माध्यम से एक सीट प्राप्त करने में सफल रहे।

संकट कैसे उत्पन्न हुआ?

अप्रैल 2021 में वास्तव में तब चिंगारी भड़की जब राजपक्षे ने उर्वरकों, शाकनाशकों और कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। क्रमिक श्रीलंकाई सरकारें लंबे समय से अपने संसाधनों से ज्यादा खर्च करती रहीं और देश को बचाए रखने के लिए एक ऋण नीति को नियोजित करती रही हैं – संक्षेप में, देश अपने ऋण का भुगतान करने के लिए पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय प्रेषण से राजस्व के साथ-साथ नए ऋणों पर निर्भर था। लेकिन फिर कोविड-19 आया, जिसने पर्यटन को बुरी तरह प्रभावित किया और इसमें योगदान दिया जिसे अर्थशास्त्री “भुगतान संतुलन संकट” कहते हैं। दूसरे शब्दों में, देश आवश्यक आयात या अपने ऋण की सेवा के लिए भुगतान करने में असमर्थ था। इसने सरकार को अचानक शाकनाशकों और उर्वरकों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा करने के लिए प्रेरित किया – कुछ ऐसा जिससे उम्मीद थी कि देश को सालाना आयात पर 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर की बचत होगी। राष्ट्रपति ने पहले संकेत दिया था कि जैविक कृषि की ओर कदम बढ़ाने में 10 साल लगेंगे। इसके बजाय, कृषि पैदावार पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में चेतावनियों के बावजूद इसे अचानक लागू कर दिया गया। इसके चलते किसानों ने विरोध किया

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वे जल्द ही सहानुभूति जताने वाले संगठनों में शामिल हो गए। भुगतान संतुलन संकट खेती से बहुत आगे निकल गया। यह उस बिंदु पर पहुंच गया जब सरकार लगभग ऐसी किसी भी चीज के लिए भुगतान नहीं कर सकती थी जिसे वह आयात करने की उम्मीद कर रही थी। इससे दवाओं और दूध पाउडर की कमी हो गई। दूसरे क्षेत्रों के लोगों ने भी इसका विरोध किया। वहीं, सरकार माल के भुगतान के लिए पैसे छाप रही थी। यह अनिवार्य रूप से मुद्रास्फीति का कारण बना – जो कि 50 प्रतिशत से ऊपर है। महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब लोगों ने पाया कि वे अब रसोई गैस और ईंधन के लिए भुगतान नहीं कर सकते। कुछ हफ्ते पहले, सरकार ने घोषणा की कि वह केवल आवश्यक सेवाओं के लिए ईंधन प्रदान करेगी, स्कूलों को बंद कर देगी और श्रमिकों को घर पर रहने का आदेश देगी। तो यह विशुद्ध रूप से आर्थिक संकट था?

पूरी तरह नहीं। असल चिंगारी भड़काने वाला कारक भुगतान संतुलन संकट था। मेरा मानना है कि गड़बड़ी की गहरी जड़ों ने भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और अल्पकालिकवाद को अनुमति दी है तथा प्रोत्साहित किया है। कम से कम 1950 के दशक से, श्रीलंका सिंहली बौद्ध राष्ट्रवाद की चपेट में रहा है। सिंहली लोग आबादी का लगभग 75 प्रतिशत हैं, जबकि तमिल लगभग 15 और मुसलमानों की आबादी 10 प्रतिशत है। जब विश्वविद्यालयों और सरकारी पदों तक पहुंच की बात आती है तो सिंहलियों को लंबे समय से तरजीह दी जाती रही है। इससे देश के अल्पसंख्यकों को नुकसान हुआ है। इससे राज्य के कामकाज के तरीके में गिरावट आई है श्रीलंका एक ऐसी प्रणाली का शिकार हो गया है जो योग्यता की अवहेलना करती है और इसके बजाय जातीयता के आधार पर एक प्रमुख समूह को तरजीह दी जाती है। इससे भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार फैलने में मदद मिली है। तथ्य यह है कि राजपक्षे बंधुओं ने तीन दशक के तमिल विद्रोह को बेरहमी से कुचलने और पराजित करने में मदद की, सिंहली बौद्ध राष्ट्रवादियों के बीच उनकी साख मजबूत हुई और सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत हुई। वर्ष 2009 में समाप्त हुए उस गृहयुद्ध ने भी वर्तमान संकट में योगदान दिया। संघर्ष के जरिए श्रीलंका सरकार ने राजकोषीय घाटे के बावजूद विद्रोह विरोधी चीजों को वित्तपोषित किया।

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युद्ध के बाद, राजपक्षे बंधु बुनियादी ढांचे का निर्माण करके देश का विकास करना चाहते थे। इसके बजाय देश को जो मिला वह था, “ब्लिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर” – वैनिटी प्रोजेक्ट्स, जिन्हें अक्सर चीन द्वारा वित्तपोषित किया जाता था, जो भ्रष्टाचार से लबरेज थे। ऐसी ही एक परियोजना है एक ऐसा हवाई अड्डा जहां बहुत कम विमान उतरते या उड़ान भरते हैं। मैंने 2015 में मटला राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का दौरा किया, और वहाँ केवल अन्य लोगों में एक स्कूल के छात्र थे जो फील्ड ट्रिप पर थे। तब से कुछ भी नहीं बदला है। इस तरह की अन्य बेकार परियोजनाओं में एक सम्मेलन केंद्र और क्रिकेट मैदान शामिल है – जिसे महिंदा राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम कहा जाता है – जो मटला हवाई अड्डे से दूर नहीं है। इस तरह की परियोजनाओं में भ्रष्टाचार रहा है। इस तरह की परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर चीनी निर्माण कंपनियां शामिल थीं, जिन्होंने अक्सर चीनी मजदूरों तथा चीनी कैदियों को काम में लगाया, खासकर हंबनटोटा बंदरगाह के मामले में। यह बंदरगाह चीन को 99 साल के लिए पट्टे पर दे दिया गया क्योंकि श्रीलंका अपने कर्ज का भुगतान नहीं कर सका। राजपक्षे बंधुओं की आर्थिक नीतियां सही साबित नहीं हुईं और देश अंधकार के गर्त की ओर चला गया।


आगे क्या होगा?

सबसे महत्वपूर्ण चीज जिसकी श्रीलंका को आगे बढ़ने की जरूरत है वह है राजनीतिक स्थिरता। उसके बिना, आपको अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आवश्यक सहायता नहीं मिलेगी।
श्रीलंका अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियाई विकास बैंक तथा विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की मदद के बिना अपनी आर्थिक परेशानियों से बाहर नहीं निकलने वाला है। इसे भारत, जापान, चीन और अमेरिका जैसे भागीदारों से भी मदद की ज़रूरत है।

इनपुट एजेंसियां-पीटीआई-(नील डेवोटा, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर, वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी) रैलीग (अमेरिका), (द कन्वरसेशन)