वो 125 किलोमीटर का हाईवे जहां लड़कियां बिकती हैं …

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  डॉ.ब्रह्मदीप अलूने 
 

वो 125 किलोमीटर लंबे हाईवे किनारे बसा इलाका, जहां रोटी कमाने की मजबूरी है, समाज की खराब परम्पराओं का अभिशाप है, गरीबी का दंश है और इन सबके बीच अपराध का बड़ा कारोबार भी है।

  • समाज को आईना दिखाने वाला यह सच मध्यप्रदेश के नीमच और मालवा के आसपास के इलाकों का है।
  • यहां परिवार की मर्ज़ी से होता है लड़की का सौदा
  • लड़की के पैदा होने पर मनाया जाता है जश्न, कहानी नहीं हकीकत है बेटी को बेचने वाला सच

महू जयपुर हाईवे पर रफ्तार से बातें करती हुई एक फर्राटेदार कार अचानक एक ढाबे पर रूकती है। कार से उतरने वाला एक शख्स ढाबे में बैठे तीन चार युवकों के पास जाकर पूछता है कि गर्मागर्म खाना मिलेगा। ढाबे वाले मुस्कुराते हैं और कहते हैं यहां खाना नहीं और कुछ चाहिए तो गर्मागर्म मिल सकता है। ढाबे से सटे हुए एक घर में तीन चार लड़कियां सजी संवरी बैठी हैं और वह भी उस शख्स की और देख कर मुस्कुराती हैं।

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दरअसल मध्य प्रदेश का रतलाम, मंदसौर और नीमच को जोड़ने वाला तकरीबन 125 किलोमीटर का इलाका अफीम, मानव तस्करी और सौदेबाज़ी का हाईवे माना जाता है। हाईवे से गुजरते हुए वाहनों की रफ्तार अमूमन बहुत तेज होती है लेकिन इस इलाके में यह रफ्तार थम जाती है। सड़क किनारे कई स्थानों पर ट्रकों की लंबी लंबी लाईनों के बीच लड़कियों के झुंड दिखते हैं।

समाज को आईना दिखाने वाला सच

आधुनिक भारत और विकास की इबारतों से दूर यह काला और बदतरीन सच इस रास्ते से गुजरने वाले हर शख्स को दिखता है। हाईवे किनारे खड़ी झोपड़ियों के बाहर संज संवर कर बैठने वाली लड़कियों की पूरी जिंदगी अपनी सौदेबाज़ी में ही खप जाती है। यहां रोटी कमाने की मजबूरी है, समाज की खराब परम्पराओं का अभिशाप है, गरीबी का दंश है और इन सबके बीच अपराध का बड़ा कारोबार भी है।

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वो 125 किलोमीटर लंबे हाईवे किनारे बसे समुदाय की बेटियां जो बिक जाती हैं

मालवा की जमीन बहुत उपजाऊ मानी जाती है और यह इलाका अफीम के लिए भी कुख्यात है। इन इलाकों में बहुत सारे प्रतिष्ठित किसान रहते है लेकिन वे भी इस गोरख़ धंधे को लेकर बेबस और लाचार है। रोड़ किनारे बैठकर ग्राहकों को बुलाने वाली ये कमसिन लड़कियां अमूमन बाछड़ा  समुदाय की मानी जाती है और यह उनका खानदानी पेशा माना जाता है। इसमें लड़की के परिवार की हामी होती है और इस प्रकार खुलेआम लड़कियों की सौदेबाज़ी यहां देखी जा सकती है।

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25 से 30 हजार की जनसंख्या में यह लोग रतलाम, नीमच और मंदसौर के 70 से 80 गांवों में बसे हुए है। इनके घर आमतौर पर सड़क किनारे बने होते हैं जिससे इन्हें ग्राहक मिलते रहे। इनके डेरों के आसपास होटल भी होते हैं और कई होटलों को तो बाकायदा गेस्ट हाउस नाम दे दिया गया है जिससे ड्राइवर सहूलियत से वहां रुक कर एकांत में समय बिता सके।बांछड़ा समुदाय में लड़कियों का जन्म होने पर उत्सव मनाया जाता है। माँ बाप और परिजन स्वयं अपनी बेटी की अस्मत का सौदा करते हैं और उसे अपनी रोजी रोटी कमाने का साधन बना लेते हैं।

बाछड़ा समुदाय में लड़कों से ज्यादा लड़कियों की संख्या होती है लेकिन इसके पीछे का यह खौफनाक सच भी सामने आया है कि मानव तस्कर छोटी बच्चियों की चोरी कर उन्हें डेरे वालों को बेच देते है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद हैं।