स्मिता पाटिल की ‘चक्र’ फिल्म नारी अस्मिता को देती है नयी ज़ुबान

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स्मिता पाटिल की ‘चक्र’ फिल्म समेत कई पुरानी फिल्मों की यह समीक्षा एक ऐसी कलम से निकली हुई है, जिसने न केवल असल ज़िंदगी में बल्कि कल्पनाओं में भी कई शख्सियतों को बखूबी तराशा। इन्हें देखकर किसी के लिये भी अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल था कि इस दिल में इतनी कोमलता, इतनी गहरी भावनाएं और संवेदनाएं, मुहब्बत और नेकदिली छिपी हो सकती है। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनकी हर रचना कहती हैं कि एक बेहतरीन लेखक या कवि की कल्पनाओं का कोई आकाश नहीं होता। जब कलम चलती है तो सारी भावनाएं कोरे कागज़ पर खुद ब खुद उतरती चली जाती हैं। अगर आपने भी 1960 के दशक की कुछ ब्लैक एंड व्हाइट या रंगीन फिल्में अब तक नहीं देखी तो पहले पढ़ें यह रिव्यू और तुरंत देख डालें । इनके गीत ही सुन लेंगे तो मेलॉडी आपके दिलों में उतरती चली जाएगी।

चक्र समानांतर सिनेमा की ऐसी फिल्म है जो स्मिता पाटिल के नाम से जानी जाती है। अस्सी का दशक के शुरू होते ही स्मिता पाटिल, शबाना आजमी और दीप्ति नवल सरीखी हीरोइनें यथार्थ-सिनेमा को नया मुंह माथा देने के लिए आगे आईं। उन्होंने प्रेम-मुहब्बत की व्यथाओं में उलझीं चिकनी-चुपड़ी हीरोइनों के इतर नारी अस्मिता को नयी जुबान दी। कहानी सिर्फ अट्टालिकाओं में रहते खूबसूरत चेहरों के ही नहीं होती, बल्कि झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की भी प्रेम पगी कहानियां होती है। यही आर्ट फिल्मों की देन कही जा सकती है। ऐसी फिल्मों में थियेटर से जुड़े लोगों, जिनमें नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा, ओमपुरी शामिल थे, के साथ कई हीरोइनों ने भी लाजवाब रोल अदा किए। उन फिल्मों की फेहरिस्त में चक्र भी आती है।

जीने मरने का चक्कर

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स्मिता पाटिल की ‘चक्र’ कई मायनों में खास है। जब कमर्शियल सिनेमा की तोहफा, बेताब फिल्में सिनेमाघरों में भीड़ खींच रही थी, तब अर्थ, चक्र, अर्धसत्य, बाजार और मंडी जैसी यथार्थपरक फिल्मों ने अपने लिए दर्शकों का एक बड़ा दर्शक वर्ग खड़ा किया और ये फिल्में चलीं भी। अपने मझे अभिनय से इन हीरो-हीरोइनों ने साबित किया कि यथार्थपरक सिनेमा को किसी चांद सरीखे चेहरे की जरूरत नहीं। उनके सौंदर्य का शास्त्र यथार्थ की पुख्ता जमीन पर ही लिखा जा सकता है। धारावी में खुलेआम नहाती चक्र की हीरोइन अम्मा (स्मिता पाटिल) की दैहिकता का व्याकरण किसी फाइव स्टार में ठहरी कमर्शियल सिनेमा की हीरोइन से जरा भी कमतर नहीं। वह अपने औरत होने के मायने बाखूबी जानती है इसलिए जवान बेटा होने के बावजूद इश्क करने से गुरेज नहीं करती। लेकिन गरीबी और लाचारी का चक्र ह कि उसमें कभी वह तो कभी उसका बेटा फंसते ही चले जाते हैं। http://बांग्ला फिल्म का रीमेक थी मीना कुमारी की यादगार मूवी ‘बंदिश’

काले-काले गहरे साये

स्मिता पाटिल की ‘चक्र’ में बेहतर अभिनय के लिए स्मिता को दो बार पुरस्कृत किया गया। एक ही किरदार के लिए 1980 उसे सर्वश्रेष्ठ एक्ट्रेस का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला तथा 1982 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर अवार्ड मिला। इसी फिल्म के सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए बंसी चंद्रगुप्त को इसी साल फिल्मफेयर पुस्कार मिला। 1981 में नसीरुद्दीन शाह को इसी फिल्म में बढ़िया अभिनय के लिए फिल्मफेयर की ओर से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया। जबकि रवींद्र धर्मराज को लोकार्नो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए पुरस्कृत किया गया। उन्होंने निर्देशक के रूप में इसी फिल्म से डेब्यू किया था लेकिन फिल्म रिलीज होने से पहले ही युवा उम्र में ही चल बसे। लेकिन यथार्थ फिल्मों में उनकी ‘चक्र’ फिल्म मील का पत्थर बन गयी।

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आंखों में टूटी हुई नींद

गांव में झोपड़ी बनाने की खातिर टिन चुराने के आरोप में (अम्मा) स्मिता के पति की हत्या कर दी जाती है। इससे पहले उसने अम्मा की आबरू पर हाथ डालने वाले लाला का कत्ल कर दिया था। बात बढ़ती देख स्मिता अपने बेटे बेनवा (रणजीत चौधरी) के साथ मुंबई की झोपड़पट्टी धारावी में आ जाती है जहां उसका अन्ना (कुलभूषण खरबंदा) से इश्क चलता है क्योंकि वह उसका और उसके बच्चे का ध्यान रखता है। साथ ही अम्मा का लूका (नसीरुद्दीन) के साथ भी चक्र चलता है। जो दादा टाइप दलाल है और पेरोल से छूटकर आया है लेकिन बेनवा का रोलमॉडल है। बेनवा की शादी अमली (अलका) से हो जाती है और इसी बीच अम्मा गर्भवती हो जाती है। दो-दो जगह इश्क चलने के बावजूद वह अन्ना को बताती है कि वही उसके होने वाले बच्चे का पिता है क्योंकि उसके मुताबिक वही बच्चे की सही देखभाल कर सकता है।

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रात अंधेरी धूप मची है

इसी बीच लूका जेल से बाहर आता है तो वह पूरी तरह बदला हुआ इंसान होता है। वह नशाखोरी, अपराध से तौबा कर लेता है और बेनवा को भी इस रास्ते से चलने से मना करता है। क्लाइमेक्स में लूका केमिस्ट से दवाई लेने जाता है। केमिस्ट उधार देने से मना करता है। गुस्साया लूका दवाइयां लेकर भाग जाता है और अम्मा की झोपड़ी में आकर छुप जाता है। पुलिस उसे और बेनवा दोनों को गिरफ्तार कर लेती है और पीटती है। इसी हफरा-तफरी में अम्मा का गर्भपात हो जाता है। फिल्म के अंत में दिखाया गया है कि बुलडोजर आकर झोपड़पट्टी को तहस-नहस कर देता है और तभी बेनवा अमली के साथ नयी झोपड़ी की तलाश में चल पड़ते हैं। पुरानी झोपड़ी से नयी झोपड़ी के जीवन की आपाधापी के नये चक्र की ओर।

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निर्माण टीम: प्रोड्यूसर : प्रदीप अपूर, मनमोहन शेट्टी, निर्देशक : रवीन्द्र धर्मराज, मूलकथा : जयंती दल्वी, पटकथा : रवीन्द्र धर्मराज, संगीत : हृदयनाथ मंगेशकर, सिनेमेटोग्राफी  : बरुण मुखर्जी

सितारे : स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा, रोहिणी हटंगड़ी, रणजीत चौधरी आदि