सियासत और भाषा का गिरता स्तर

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रितेश कुमार झा

सियासत में साल दर साल भाषा का गिरता स्तर चिंता बढ़ाता है। 17वीं लोकसभा के लिए वोट डालने का काम पूरा हो चुका है। अब सभी को 23 मई का इंतज़ार है। हर कोई ये जानना चाह रहा है कि इस बार किसका राजतिलक होगा। लेकिन इस चुनाव में भाषाई मर्यादा बिल्कुल निचले स्तर पर पहुंच गई। वैसे तो पिछले कुछ सालों में सियासत में भाषा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। चुनावी जोश में नेता होश खो देते हैं और ऐसा बयान दे देते हैं जो शर्मसार करने वाला होता है। लेकिन इस बार तो नेताओं ने सारी मर्यादा और शालीनता को ताक पर रख दिया।

चोर, नमक हराम जैसे शब्दों का हो रहा इस्तेमाल

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चोर, नमक हराम, निकम्मा, नीच आदमी, अनपढ़, गंवार, कुत्ता, चू**या, गधा, बंदर, सांप-बिच्छू, जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि केवल चुनावी जोश में होश खोने की वजह से ये बयान दिए जा रहे हैं। इस तरह की गालियों का इस्तेमाल हमारे नेता जान-बूझकर कर रहे हैं। वे विरोधियों से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करने की जगह उन पर कीचड़ उछालने के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

राहुल ने प्रधानमंत्री को चोर कहा

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अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी पीछे नहीं है। ज्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं है। चुनाव से पहले राहुल अपनी हर सभा में ‘चौकीदार चोर है’ कहते रहे…लोगों से भी नारे लगवाते रहे। एक तरफ वे चौकीदार चोर है कहते रहे तो दूसरी ओर नफरत को प्यार से जीतने की बात भी कर रहे थे। चुनावी जोश में होश खोकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर पीएम को चोर कहा। हालांकि इस बार उनका दांव उल्टा पड़ गया और उन्हें सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी। राहुल ये भी भूल गए कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री को उन्होंने गले लगाया था।

देवभूमि हिमाचल में भी उगले गए चोर

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अपनी नफासत भरी सियासत के लिए मशहूर देवभूमि हिमाचल की भाषा भी इस बार बिगड़ गई। हिमाचल भाजपा के अध्यक्ष सतपाल सत्ती ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को मां की गाली दी। इस कारण आयोग ने उन पर 48 घंटे तक प्रचार करने पर रोक लगा दी। लेकिन रोक हटने के अगले ही दिन सत्ता ने फिर विरोधियों का बाजू काटने की धमकी दी।

ममता, माया, योगी सबने की विवादित टिप्पणी

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मायावती ने देवबंद में मुसलमानों से धर्म के आधार पर वोट करने की अपील की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने माया के बयान के अगले ही दिन अली बनाम बजरंग बली वाला विवादित बयान दे दिया। जबकि केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने मुसलमानों को देख लेने की धमकी दे डाली।

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ये बयान रहे विवादों में

‘जिसको हम उंगली पकड़कर रामपुर लाए, आपने 10 साल जिनसे अपना प्रतिनिधित्व करवाया उसकी असलियत समझने में आपको 17 साल लगे। मैं 17 दिन में पहचान गया कि इनका अंडरवियर खाकी रंग का है। ’ – आजम खान

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मुसलमानों अपना वोट बंदने न दें। सभी वोट महागठबंधन को जने चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के लोग महिलाओं का सम्मान नहीं करते, यहां तक कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए पीएम मोदी ने अपनी पत्नी को भी छोड़ दिया। – मायावती

अगर हमें 40 से ज्यादा सीटें मिलती हैं तो क्या मोदी दिल्ली के विजय चौक पर फांसी लगा लेंगे।  – मल्लिकार्जुन खड़गे

‘’मैंने हेमंत करकरे को श्राप दिया था, जिससे उसकी मौत हुई। नाथूराम गोड्से पक्के देशभक्त थे।‘’    साध्वी प्रज्ञा

हुआ तो हुआ। – सैम पित्रोदा

मोदी वोट मांगने बंगाल आ रहे हैं, लेकिन लोग उन्हें कंकड़ भरे और मिट्टी से भरे लड्डू देंगे जिसे चखने के बाद उनके दांत टूट जाएंगे।  ममता बनर्जी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के जीवन का अंत भ्रष्टाचारी नंबर एक के रूप में हुआ।  – नरेंद्र मोदी

राहुल गांधी कहता है कि चौकीदार चोर है, अगर वह चोर है तो तू मा…द है। – सतपाल सत्ती

“ विपक्ष को अगर अली पंसद हैं तो भाजपा को भी बजरंग बली पसंद हैं। “  – योगी आदित्यनाथ

आयोग की सख्ती भी नहीं आई काम

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ये सब तब हुआ जब आयोग ने इस बार सख्त कदम उठाते हुए विवादित बयानों के बाद कई नेताओं के प्रचार पर 48 से 72 घंटे तक के लिए रोक लगा दी। लेकिन बयानवीरों के जहर उगलने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। ये सब तो चंद उदाहरण हैं…सवाल यही उठता है कि क्या इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल लोकतंत्र के लिए सही है? क्या राजनेताओं को अपने भाषण में संयम और शालीनता का परिचय नहीं देना चाहिए?क्या लोकतंत्र में शब्दों की मर्यादा अनिवार्य नहीं होना चाहिए? आखिर इनसे हमारी जनता क्या प्रेरणा ले सकती है? क्या जनता को ऐसे नेताओं को वोट देना चाहिए? क्या ऐसे नेताओं का सामाजिक बहिष्कार नहीं कर देना चाहिए?

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