विवेकानन्द के मुस्लिम प्रेम पर किसे हुई आपत्ति…

          डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

स्वामी विवेकानन्द अक्सर कहा करते थे कि मैं किसी दल या विशिष्ट सम्प्रदाय का नहीं हूँ।सभी दल और सम्प्रदाय मेरे लिए महान और महिमामय है।मैं उन सबसे प्रेम करता हूँ,और अपने  जीवन भर मैं यहीं ढूंढने का प्रयत्न करता हूँ कि उनमें कौन कौन सी बातें अच्छी और सच्ची है।”प्रसिद्ध न्यायवेत्ता मोहम्मद करीम छागला ने स्वामी विवेकानन्द के बारे में कहा था कि उन्होंने सार्वभौमिक धर्म का प्रचार किया और मनुष्य के मूल्य तथा महत्व पर सर्वाधिक बल दिया।विवेकानन्द के सर्वधर्म समभाव पर आधरित एक निबन्ध को पढ़कर लियो टालस्टाय इतने प्रभावित हुए कि वे इसे अपने पास ही रखते थे,बाद में उन्होंने विवेकानन्द के विचारों को  अद्भुत और अपूर्व बताया।

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.जाकिर हुसैन ने स्वामी जी के बारे में कहा था कि मैंने अपने छात्र जीवन में उनके साहित्य को पढ़कर एक ऐसे आध्यात्मिक पुरुष के दर्शन किये,जिन्होंने धर्म को तंग दायरे में नहीं रखा और मानव समाज को ऐसे धर्मान्ध खेमों में विभक्त होने से बचाया,जो सत्य पर एकाधिकार का सतही दावा किया करते थे।

स्वामी विवेकानंद के जीवन मूल्यों के आदर्श इतने महान रहे की वे सच्चे अर्थो में धर्म निरपेक्ष भारतीय ही रहे।शिकागों धर्म सभा में उन्होंने कहा की मुझे गर्व है की मैं ऐसे राष्ट्र का सदस्य हूँ जिसने संसार के सभी धर्मो और सभी देशों के उत्पीड़ित शरणार्थियों को शरणस्थान दिया है।मुझे ऐसे धर्म का होने का गौरव है जिसने सहिष्णुता एवम् सभी धर्मो का सम्मान करने की शिक्षा दी है,हम सभी धर्मो के प्रति केवल सहिष्णुता ही नहीं दिखाते अपितू सभी धर्मो की सीखों को साम्य मन कर धारण भी करते है।”

ये धर्म निरपेक्षता उनके चरित्र में भी रही।अलवर रियासत में स्वामी जी का जाना हुआ तो उन्होंने मुस्लिम परिवार में भोजन किया।वे स्वयं अजमेर जब भी जाते एक मुस्लिम वकील के घर विश्राम करते। एक मुंशी जगन मोहन को ये बात नागवार गुजरी।वे स्वामी जी से बोले मेरे मन में एक बहुत बड़ी शंका समाई हुई है की आप हिन्दू जाति के होते हुए भी मुसलमान के घर क्यों ठहरे हुए है। स्वामी बड़ी गंभीरता से बोले “मुंशीजी क्या मुसलमान इन्सान नहीं है, क्या इनका निर्माण उस परमेश्वर के द्वारा नहीं हुआ।

दरअसल स्वामी विवेकानन्द के सपनों के भारत में मानवतावादी अपेक्षाएं रहीं और उसकी स्थापना के लिए वे सदैव प्रयत्नशील रहें।संयुक्तराष्ट्र के तीसरे महासचिव यू थांट ने स्वामी विवेकानन्द को मानवता का अग्रदूत बताते हुए कहा था कि उस उच्चतम महापुरुष के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए हम संकल्प ले कि हम ईसाईयों को बेहतर ईसाई,हिन्दुओं को बेहतर हिन्दू,मुसलमानों को बेहतर मुसलमान,बौद्धों को बेहतर बौद्ध और यहूदियों को बेहतर यहूदी बनाएंगे।

 

 

 

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