Nuclear Agriculture A New Concept- किसानों और बागवानों के लिए नए दौर की ये तकनीक है बड़ी फायदेमंद

Nuclear Agriculture A New Concept
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SANGHAIK KAVITA RAJ ( After Returning From The DAE, Kalpakkam in Tamilnadu)

Nuclear Agriculture A New Concept-पारंपरिक कृषि से ऊपर हम तकनीक पर आधारित खेती किसानी की बहुत बात कर चुके हैं। नये दौर में नयी तकनीक है न्यूक्लियर एग्रीकल्चर (Nuclear Agriculture)। बहुत से कृषि प्रधान राज्य अभी इस तकनीक से अछूते हैं। लेकिन कुछ राज्य ऐसे भी हैं जो न्यूक्लियर एग्रीकल्चर का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। इस क्षेत्र में काम कर रहा है भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर। कृषि क्षेत्र में परमाणु तकनीक के इस्तेमाल का बेहतरीन उदाहरण पेश करते हुए भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र यानी बार्क ने अलग-अलग राज्यों के कई कृषि विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर 49 बीज किस्मों को व्यावसायिक इस्तेमाल के लिये अब तक जारी किया हैं। इनमें मूंगफली से लेकर उड़द दाल, मूंग दाल और सरसों समेत सोयाबीन और चावल भी शामिल है। खास बात यह भी है कि परमाणु तकनीक से व्यावसायिक खेती को केंद्रीय कृषि मंत्रालय भी अपनाने पर ज़ोर दे रहा है। बार्क की परमाणु कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी शाखा से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. राजेश वत्स कहते हैं कि खेती के लिये जमीन कम है, बढ़ती जनसंख्या और अनाज की बढ़ती मांग के कारण न्यूक्लियर एग्रीकल्चर की यह तकनीक काफी अहम हो जाती है। अभी तक अगर हम परमाणु ऊर्जा या परमाणु विकिरण को केवल बिजली या परमाणु बम के निर्माण में प्रयोग होने वाला मानते हैं तो यह लेख पढ़ना बेहद जरूरी है क्योंकि इससे technology techniques को और अधिक समझ पाएंगे ।

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न्यूक्लियर एग्रीकल्चर में रेडियेशन

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वैज्ञानिक धीरज जैन के मुताबिक न्यूक्लियर एग्रीकल्चर में रेडियेशन ( radiation) के ज़रिये पौधों की आनुवांशिक क्षमता (genetic potential) को बढ़ाया जा सकता है। म्यूटेशन द्वारा बहुत अधिक पैदावार तैयार करने वाली नस्ल की फसलों का विकास भी किया जा रहा है। इस तकनीक से उत्पादन बढ़ाने, पौधों में रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने, समय से पहले फसल तैयार होने और कम पानी के इस्तेमाल से पूरा उत्पादन लेने और फसल को लंबे समय तक टिकाऊ बनाये रखने (increasing production, developing disease resistant capacity in plants, early harvest ) जैसे गुण रखने वाली दालें और अनाज की नई किस्में भी विकसित हो रही हैं।

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परमाणु अनुसंधान के क्षेत्र में देश की सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) और इसी के साथ केंद्रीय परमाणु ऊर्जा विभाग की एक यूनिट BRIT इस क्षेत्र में मिलकर काम कर रहे हैं। ब्रिट की scientific officer डॉ. योजना सिंह बताती हैं कि आइसोटॉप न केवल हेल्थ सेक्टर में बल्कि एग्रीकल्चर में और पावर जनरेशन में अहम भूमिका निभा रहा है। इसकी आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये ब्रिट दिन रातकड़ी मेहनत करता है और हर हफ्ते के आखिर में हर एक सेंटर तक इसकी स्पलाई मुहैया करायी जाती है।

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Nuclear Agriculture A New Concept- बर्बाद होते हज़ारों टन अनाज को बचाना है

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आंकड़े कहते हैं कि देश में हर साल भंडारण के दौरान करीब 40 % से अधिक अनाज बर्बाद हो जाता है। यदि देश में तैयार होने वाला खाद्य पदार्थ या खाद्यान्न सुरक्षित कर लिया जाए तो करोड़ों लोगों को भोजन मिल सकता है। हरियाणा, पंजाब और छत्तीसगढ़ के अलावा पंश्चिम बंगाल में अनाज की सबसे ज्यादा पैदावार होता है। पंजाब अनाज उगाने के मामले में तीसरे स्थान पर आता है, यहां हर साल 1.20 करोड़ टन चावल का उत्पादन होता है। गेहूं उगाने के मामले में भी इसकी गिनती अग्रणी राज्यों में होती है। मूंगफली, कैस्टरसीड और कपास में गुजरात अव्वल है। हरियाणा की बात करें तो यहां 70 फीसदी लोग खेती करते हैं। गेहूं, गन्ना और चावल के अलावा सूरजमुखी की खेती में यह प्रदेश अग्रणी है। हिमाचल प्रदेश में टमाटर, लहसुन, अदरक और आलू जैसी नकदी फसलों के अलावा सेब, आड़ू और अन्य फलों के बागान हैं। लेकिन सबसे सामने एक ही समस्या है, फसलों को स्टोर करने की । महंगे दामों पर Cold Storage या अनाज गोदामों में यहां के लोग फसलें रखने के लिये मजबूर हैं। कहा जा सकता है कि खाद्यान्नों को सुरक्षित करने के सरकार के तमाम उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं ऐसे में इन सबके बीच परमाणु कृषि जैव प्रौद्योगिकी यानी फूड इरेडिएशन एक बेहतर उपाय नजर आ रहा है।

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NUCLEAR AGRI
NUCLEAR AGRI

न्यूक्लियर रेडियएशन पर आधारित biotechnology से खाद्यान्न को लंबे समय तक साफ सुथरा और कीटाणु रहित रखा जा सकता है यानी इससे खाद्य पदार्थों जिनमें अनाज से लेकर फल फ्रूट और कई अन्य खाने पीने की चीजें शामिल हैं.

Food Irradiation

फूड इरेडिएशन कृषि में बेहद अहम भूमिका निभा रहा है। इसमें फलों सब्जियों और अन्य खाद्य पदार्थों की shelf-life बढ़ाकर उन्हें बैक्टीरिया के प्रकोप से बजाया जाता है । फूड इरेडिएशन रेडिएशन की वह टेक्नीक (Food Irradiation Radiation Technique) है जिसमें खाद्य पदार्थों को रेडिएशन की निर्धारित मात्रा में एक सीमित वक्त के लिए गुजारा जाता है। यह रेडिएशन खाद्य पदार्थों के बीच से कुछ मात्रा में होकर कुछ वक्त के लिए गुजरती है और उसे सुरक्षित कर लेती है। इसकी वजह से फल सब्जियां या दूसरे अनाजों के बीच में पैदा होने वाले कीटाणु खत्म हो जाते हैं और यह लंबे समय के लिए सुरक्षित हो जाते हैं।

भारत में फिलहाल 26 FOOD IRRADIATION सेंटर है (26 Gamma Radiation Processing Plants) जो कि एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड की कड़ी निगरानी में काम करते हैं । केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह कहते हैं, खाद्य संरक्षण के लिए गामा विकिरण तकनीक (Gamma irradiation technology) पहले ही private players के साथ साझा की जा चुकी है.एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर संयुक्त रूप से फूड रेडिएशन सेंटर खोलने की इस पहल पर काम कर रहे हैं अभी तक भारत ने कई सारे खाद्य पदार्थों पर इसका सफल परीक्षण किया है । आलू , प्याज, मांस-मछलियां और खाद्यान्नों में इस प्रोसेस के बाद अंकुरण कम होता है यानी उन्हें स्प्राउट्स नहीं आते हैं और यह 3 से 6 महीने तक खराब नहीं होते हैं ।

कैसे काम करती है cobalt-60 की किरणें

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गामा किरणों ( Gamma radiation) की बौछार से खाद्य सामग्री लंबे समय तक संरक्षित रहती है क्योंकि इनमें मौजूद सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं। हां एक बात और ध्यान में रखते जरूरी है कि भारत के अधिकारियों के मुताबिक इससे फसल या फल सब्जियों की गंध गुणवत्ता या क्वालिटी में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं आती है महाराष्ट्र के लासलगांव में रेडिएशन टेक्नीक से आमों को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया कई सालों से जारी है इसके अलावा मुंबई में भी Radiation Processing Plant, BRIT, Vashi इस प्रक्रिया से संचालित हो रहा है।


Nuclear Agriculture A New Concept-मिट्टी की जांच है जरूरी

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फूड इरेडियेशन प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है मिट्टी की जांच करना। न्यूक्लियर एग्रीकल्चर में मिट्टी की जांच सबसे पहला और अहम कदम है । इस प्रक्रिया में मिट्टी में मौजूद कैल्शियम सल्फर, फॉसफोरस, जिंक मैंगनीज, मॉलीब्लेडिनम जैसे पोषक तत्वों की जांच की जाती है। उसके आधार पर किस मिट्टी में कौन सी फसल की कौन सी वेराइटी तैयार की जा सकती है इसका अध्ययन होता है। फसल में लगे कीड़ों को खत्म करने में नाभिकीय विकिरण (nuclear radiation) का प्रयोग किसानों का खेतों के लिए एक आदर्श प्रयोग होता है.

रेडिएशन से किस तरह लाभ होता है

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विकिरण और आइसोटोप प्रौद्योगिकी बोर्ड (BRIT) की वैज्ञानिक डॉ. योजना सिंह चौहान बताती हैं कि आम और केले को फूड रेडिएशन प्रोसेस से गुजारने के बाद इसको पकने में देर लगती है। आलू और प्याज में अंकुरण पर रोक लग जाती है। गेहूं और चावल के साथ दालों में कीड़े नहीं लगते। जबकि मछली, अंडे और अन्य मांसाहारी चीजों में सूक्ष्म जीवों के पनपने में कमी आती है । मसालों की बात करें तो इनमें कीट और अन्य सूक्ष्म जीव पैदा नहीं होते हैं। आज हमारे देश के पास भोजन को सुरक्षित रखने का कोई स्थायी और कारगर रसायन उपलब्ध नहीं है। ऐसे में नाभिकीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी के प्रयोग से फूड इरेडिएशन के जरिए भोजन को विकिरण के संपर्क में लाकर उसे सड़ने से बचाया जा सकता है।

Nuclear Agriculture A New Concept-पूरी तरह सुरक्षित है प्रक्रिया

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रेडिएशन की नाम सुनकर बहुत से लोग डर जाते हैं लेकिन बार्क से जुड़े वैज्ञानिक धीरज जैन कहते हैं कि सबसे पहले रेडियेशन के फायदों को समझने की ज़रूरत है। इसके बारे में भ्रम खत्म करने से हम समझ पाएंगे कि फसलों पर रेडियेशन का कोई गलत प्रभाव नहीं होता। क्योंकि बार्क अपने शोध द्वारा यह स्पष्ट कर चुका है कि फूड इरेडिएशन पूरी तरह से एक सुरक्षित प्रक्रिया है और इसे भोजन और खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। भारत जैसे तमाम अन्य देशों में जहां इस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है अनाज को और फलों को लंबे समय तक धूप में रख कर नहीं सुखाना पड़ता है बल्कि खाद्दान्न में से गामा किरणों को सिर्फ 15 सेकंड के लिए (इस फूड से) गुजारा जाता है जिससे इसके अंदर पैदा होने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और यह उनके आक्रमण से सुरक्षित हो जाता है। परमाणु ऊर्जा और उससे जुड़ी तकनीक गांवों के भी काम आ रही है। बीते साल छत्तीसगढ़ सरकार ने BARC और केंद्र सरकार के बोर्ड ऑफ रेडिएशन एंड आइसोटॉप टेक्नोलॉजी (BRIT) से दो समझाते किये हैं। जिसके तहत अनाज, फलों, सब्जियों और लघु वनोत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जायेगा और गोबर से बिजली बनाने में मदद मिलेगी।

-कितनी फसलों की किस्मों का हो चुका है विकास

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भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने पिछले कई सालों में नाभिकीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी कार्यक्रम ( Nuclear Agriculture Biotechnology Program) के तहत विभिन्न राज्यों के विश्वविद्यालयों के सहयोग से 49 की नई फसलें तैयार की है। इनमें मूंगफली, मूंग दाल, उड़द दाल, अरहर दाल के अलावा सोयाबीन की और सूरजमुखी के अलावा जूट और प्याज की कई किस्में शामिल है। बता दें कि इनमें से कई फसलें जिनमें मूंगफली भी शामिल हैं वे न केवल अपनी मूल प्रजातियों की तुलना में आकार में बड़ी है बल्कि इनकी पैदावार भी कहीं अधिक होती है। एटॉमिक रिसर्च सेंटर मुंबई के वैज्ञानिक डॉ राजेश वत्स बताते हैं कि नाभिकीय विकिरण का मुख्य लाभ आनुवांशिक भिन्नता में बढ़ोतरी करना है । इस तकनीक से अनाज दलहन और तिलहन की कई प्रजातियों में मनचाहे गुण विकसित किए जाते हैं।

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