जब कश्मीर पर नेहरु के दांव से चित्त हुए जिन्ना

डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

1947 में विभाजन की विभीषिका से जूझते भारतीय उपमहाद्वीप में असंतोष,अस्थायित्व,असहिष्णुता,अन्याय,अराजकता,अलगाव, अमानवीयता बदले की भावना,सांस्कृतिक विभेद और पृथकता के द्विराष्ट्रवाद की आग जल रही थी।इस बीच अकस्मात और अप्रत्याशित कश्मीर की युद्धक चुनौती से निपटने को देश बिलकुल तैयार नहीं था।आक्रमण हो चूका था और कश्मीर के महाराजा का ढुलमुल रवैये असमंजस बढ़ा रहा था।इस बीच कश्मीर पर कबाइलियों के नियंत्रण से उपजी परिस्थितियों के बीच डिफेंस कमेटी की बैठक में माउन्टबेटन और चीफ़ ऑफ स्टाफ़ ने फौजियों को कश्मीर न भेजने का सुझाव दिया।लेकिन नेहरु ने उनके विचारों को नकार कर साफ कहा कि कश्मीर में बुराई के आगे झुक जाने से शांति नहीं हो सकती।इस घटना का जिक्र पूर्व रक्षा मंत्री जसवंतसिंह ने अपनी बहुचर्चित किताब “खतरे में भारत”में भी किया है।
दरअसल भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल माउंटबेटन कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी सैन्य टकराव नहीं होने देना चाहते थे।इसका प्रमुख कारण भी बेहद दिलचस्प था।उस समय भारत और पाकिस्तान दोनों की ही फौजों की बागडोर ब्रिटिश कमांडरों के हाथ में थी, माउंटबेटन को अंदेशा था कि अफसर आपस में लड़ने से मना कर देंगे।वहीं नेहरू ने स्पष्ट कर दिया था कि वे कश्मीर जैसी जगह पर पैर मजबूती से जमाना चाहते हैं, जिससे हिमालय पर दबदबा कायम हो और भारत हमला करने की पहल कर सके।
माउन्टबेटन की कूटनीतिक चालों के बीच कश्मीर का भारत में विलय देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरु की दूरदर्शिता,साहस और शेख अब्दुल्ला से मजबूत संबंधों से ही संभव हो सका।जबकि तत्कालीन परिस्थितियां बिलकुल मुफीद नहीं थी और कश्मीर की राज सत्ता का रुख भी पाकिस्तान के लिए बेहतर अवसर प्रदान कर रहा था।

14 अगस्त 1947 को जिन्ना की जिद और द्विराष्ट्रवाद ने गंगा जमुनी तहजीब का विध्वंस कर रक्त रंजित इतिहास लिख दिया था।प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैय्यर कहते है,”विभाजन के लिए आप किसी को भी दोषी ठहराये वास्तविकता यह है कि इस पागलपन ने दो समुदायों और दो देशों के बीच दो पीढ़ियों से भी अधिक समय के लिए संबंधों में कडुवाहट उत्पन्न कर दी।”
विभाजन के दंश झेलने वाले भारत और उसके टुकड़े पाकिस्तान के बीच अविश्वास की रेखा खींची जा चुकी थी।इसका असर कश्मीर पर पड़ना स्वभाविक ही था।हिंदू,मुस्लिम और बौद्ध संस्कृति से आबाद इस रियासत का आज़ाद रहना पाकिस्तान को गंवारा नहीं हुआ।द्विराष्ट्र को लेकर मुखर पाकिस्तानी सियासतदानों का यह मानना था कि उनकी सीमा से लगे कश्मीर मुस्लिम बाहुल्य है,अत:उसका स्वभाविक विलय पाकिस्तान में होना चाहिए।

 


कश्मीर के राजा हरीसिंह अपनी बादशाहत के नशे के चूर होकर अपनी रियासत को मोल भाव के तराजू में तोल रहे थे।वे कश्मीर की सभ्यता,संस्कृति और भौगोलिक परिस्थितियों को दरकिनार कर अपने प्रभुत्व को किसी कीमत पर बनाए रखना चाहते थे।जम्मू कश्मीर ब्रिटिश सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था और इसलिए वह इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया ऐक्ट के दायरे में भी नहीं आता था।जाहिर है वैधानिक कारणों से भारत और पाकिस्तान के बीच स्थित कश्मीर को औपचारिक तौर पर बंटवारे के बाद अस्तित्व में आने वाले किसी देश को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता था।
कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की बदनीयती बहुत जल्द सामने आ गई।कुछ ही दिनों बाद महाराज को पाकिस्तानी चुनौती से रूबरू होना पड़ा,जब पाकिस्तान की शह पर कुछ लोगों ने कश्मीर में भी सांप्रदायिक विष वमन करते हुए यह अफवाह फैलाई कि कुछ डोगरा सैनिक मुसलमानों से ज्यादती कर रहे हैं।इस सुनियोजित अफवाह का खतरनाक असर हुआ और महाराजा के सैनिकों में फूट पड़ गई। पाकिस्तानी कबाईली हमलावरों के साथ मिलकर कुछ मुस्लिम सैनिकों ने इस्लाम जिंदाबाद के नारे लगाते हुए मुजफ्फराबाद पर हमला कर दिया।इस संकट के दौर में महाराजा हरीसिंह तय नहीं कर पा रहे थे कि क्या किया जाए।क्योंकि लोकप्रियता को लेकर भी उनकी स्थिति ठीक नहीं थी जबकि सैन्य मोर्चे पर वे बेहद कमजोर महसूस कर रहे थे।


इस स्थिति का वर्णन शेख अब्दुल्ला ने अपनी किताब फ्लेम्स ऑफ द चिनार में किया है।अब्दुल्ला के शब्दों में ”नये हालात में हमें कुछ सियासी कदम उठाने को मजबूर कर दिया।हम पाकिस्तान से सचेत हो चुके थे और अपनी कौमी वजूद को बचाने के लिए हर तरफ देख रहे थे।महाराजा ने अब तक औपचारिक रूप से भारत में शामिल होने के दस्तावेजों पर दस्तखत नहीं किए थे,ऐसे में भारतीय सेना की और से कोई भी कदम उठाया जाना गैर क़ानूनी माना जाता।”
शेख अब्दुल्ला मुस्लिम होकर भी भारत पर ज्यादा भरोसा करते थे और इसका कारण भारत का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप और नेहरु से उनकी मित्रता थी।इस सबके बीच नेहरु का साफ कहना था कि उनका देश कश्मीर के महाराजा की तभी मदद करेंगा जब वह भारत में कश्मीर के विलय की घोषणा कर दे।वहीं महाराजा हरिसिंह चाहते थे कि भारत बिना विलय जैसी शर्तों के उनकी फौजी मदद कर दे।कश्मीर के बदलते हालात और पाकिस्तान के बढ़ते फौजी दबाव से पस्त महाराजा हरिसिंह की मनोस्थिति का जिक्र महाराजा के विश्वस्त अधिकारी मेहरचंद महाजन की लिखी पुस्तक एक्सेशन ऑफ कश्मीर टू इंडिया में दर्ज है।”महाराजा के साथ मशविरा करके यह तय किया गया कि अगर हवाई जहाज का इंतजाम कर लिया जाए तो दिल्ली की मदद ली जा सकती है।अगर वह संभव नहीं हुआ तो हम पाकिस्तान के सामने आत्म समर्पण कर देंगे।”


नेहरु महाराज की धूर्तता को जानते थे और वे कश्मीर के भारत में विलय के सामरिक महत्व को समझ चूके थे।अंततः महाराज को नेहरु के आगे झुकना ही पड़ा और जम्मू कश्मीर के विलय का भारतीय मसौदे पर हस्ताक्षर करना पड़े।26 अक्टूबर 1947 को विलय स्वीकार कर लिया गया और अगली ही सुबह भारतीय सैनिकों को विमान से रवाना कर दिया गया।भारतीय सैनिकों ने ऐनवक्त पर श्रीनगर पहुंच कर पाकिस्तान की उस योजना को पूरी होने से रोक दिया जिसके अनुसार यह विश्वास किया जाता है कि पाकिस्तानी फौज यह मन बना चूकी थी कि श्रीनगर पर कब्ज़े के बाद समूचे जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की घोषणा की जाएगी और इस जश्न में जिन्ना ख़ुशी ख़ुशी वहां पहुंचेगे।

 


जम्मू कश्मीर के लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला के सहयोग से जम्मू कश्मीर भारत का अंग बन गया और इस प्रकार महाराजा की राज शाही समाप्त हो गई।नव स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत की छवि को लेकर नेहरु बेहद संजीदा थे और इसीलिए उन्होंने पाकिस्तान को संयुक्तराष्ट्र में आक्रमणकारी राष्ट्र के रूप में प्रचारित भी किया।
31दिसंबर 1948 को भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम हो गया। लगभग आठ माह के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् ने एक मसौदा पेश करते हुए जम्मू और कश्मीर से पाकिस्तान को अलग हटने और वहां पर भारतीय सेना की तैनाती को जरूरी माना।संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत के रुख को न्यायोचित ठहराया वहीं अमेरिका नेहरु की वैश्विक और तटस्थ छवि से आशंकित था।भारतीय उपमहाद्वीप में अमेरिकी वर्चस्व स्थापित करने के लिए उसे मित्र की तलाश थी और यह संभावना उसे पाकिस्तान में दिखी। अमेरिकी प्रभाव के कारण ही कश्मीर से हटने के लिए सुरक्षा परिषद् ने पाकिस्तान पर दबाव नहीं बनाया और अंततः यह समस्या इस भूभाग के लिए एक नासूर बन गई।
कश्मीर को भारत पाकिस्तान के बीच कडुवाहट का प्रमुख कारण बताया जाता है,लेकिन पंडित नेहरु इससे सहमत नहीं थे।उन्होंने एक बार संसद में कहा था कि,”लोगों की यह भ्रांतिपूर्ण धारणा है कि कश्मीर विवाद ही दोनों देशों के संघर्ष का कारण है। हमारी विचारधारा ही भिन्न है। हम धर्म निरपेक्षवाद में विश्वास करते है किन्तु पाकिस्तान इस्लामवाद और द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत में विश्वास करता है। इस सिद्धांत के अनुसार कश्मीर में मुसलमानों का बहुमत पाकिस्तान के लिए असहनीय तथ्य है।भारत के प्रति शत्रुता का विचार पाकिस्तान की धार्मिक राजनीति का अंग बन गया है।”

 

बहरहाल देश के उत्तरी कोने में स्थित जम्मू कश्मीर भारत की सामरिक भौगोलिक स्थिति को मजबूत करता है।इसके उत्तर में चीन,पूर्व में तिब्बत,उत्तर पश्चिम में अफगानिस्तान और पश्चिम में पाकिस्तान है।नेहरु की दूरदर्शिता,कूटनीति और सामरिक विद्वत्ता से नव स्वतंत्र भारत ने कश्मीर के रूप में एक बड़े भूखंड को पाकिस्तान में मिलने से रोक दिया और उस पर निर्णायक बढ़त भी हासिल कर ली।

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