Navratri Special Puja And Varat Vidhi- नवरात्रि यानी भगवती दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का पर्व

devi durga
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Navratri Specal Puja And Varat Vidhi-हर साल में दो बार नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। एक बार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक तथा दूसरी बार अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक। कुछ लोग इसे नवान्न उत्सव भी मानते हैं। यानी फसल कट कर घर आने का पर्व। एक बार रबी की फसल कट कर आने का तो दूसरी खरीफ की फसल का।

नवदुर्गा सिर्फ नौ दिनों की पवित्रता और इस बहाने देवी पूजा का ही पर्व नहीं है बल्कि भारतीय समाज में स्त्रियों की शक्ति का प्रतीक भी है। पुरुष सत्ता के पूर्व भारतीय समाज में स्त्रियों को वे अधिकार प्राप्त थे जो आज पुरुषों को हैं। नवरात्रि पूजन अथवा नवदुर्गा की चहल-पहल से यह तो लगता ही है कि एक युग वह भी था जब भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति कहीं ज्यादा मजबूत और पुरुष के मुकाबले उच्चतर थी। नवदुर्गा इसी स्त्री शक्ति की प्रतीक हैं। 

व्रत की परंपरा का आरंभ

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 व्रत और पारायण की यह परंपरा तब आई होगी जब वैष्णव संप्रदाय फला-फूला होगा। इसीलिए शाक्त परंपरा की देवियों का वैष्णव परंपरा में विलय हुआ और यह नवरात्रि बजाय मातृका देवियों की प्रथम सत्ता को स्थापित करने के राम नवमी और विजयादशमी से जोड़ दिया गया। वैष्णव संप्रदाय के रामभक्त इस नवरात्रि यानी चैत्र की नवरात्रि को भगवान राम के जन्म दिवस के रूप में मनाते हैं और अश्विन की नवरात्रि को लंका विजय के उपरांत राम के अयोध्या लौटने की रीति के तौर पर। पर नवरात्रि को भगवती दुर्गा के नौ रूपों के तौर पर मनाने की ही मान्यता असल है। वनरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है।

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भगवती दुर्गा के नौ रूप

शैलपुत्री के बाद ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कान्यायनी, कालरात्रि और अष्टमी को महागौरी का पूजन किया जाता है। अंत में महागौरी के बाद यह पूजा उठा दी जाती है। देवी भगवती पुराण के अनुसार ये नौ देवियां मातृका हैं और हमारी आदिम सभ्यता व संस्कृति की रक्षक। मान्यता है कि इनके पूजन से मनुष्य की इच्छापूर्ति होती है और देवी उस पर प्रसन्न होती है। कुछ श्रद्घालु इन दिनों दुर्गा सप्तपदी का पाठ करते हैं। संपूर्ण पूर्वी भारत और हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोग आमतौर पर देवी पूजक होते हैं। पर जहां उत्तर भारत में देवी निरामिष मानी गई हैं वहीं पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में देवी बलि को स्वीकार करती हैं। इसीलिए बंगाल और असम में क्रमश कालीदेवी और कामाख्या देवी पर बलि चढ़ाना शुभ समझा जाता है। जबकि हिमालय के उत्तरी राज्यों में चाहे वे हिमाचल प्रदेश की छिन्नमस्ता हों या कांगड़ा की ज्वाला देवी अथवा चामुंडा या अन्नपूर्णा और जम्मू की वैष्णो देवी में बलि चढ़ाने की मनाही है।

देवी पूजा और समानता का भाव

देवी पूजन को असली मर्म यही है कि स्त्री को उसके पूरे अधिकार उसे दिए जाएं और समाज में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं हो। तब बंद हो जाएगा भ्रूण हत्या जैसा घिनौना कृत्य जो लोग चोरी छिपे करते ही रहते हैं। हालांकि सरकार ने लिंग जांच पर सख्ती से रोक लगा रखी है पर लोगबाग यह जांच छुप-छुपाकर करा ही लेते हैं और लड़की भ्रूण को प्रसव पूर्व ही मार देते हैं। इसके अलावा उत्तराधिकार में अभी भी बेटे को ही पूरा हक समाज देता है। बेटी को समाज का भय दिखाकर उससे वंचित कर दिया जाता है। नौकरियों में भी उनके साथ भेदभाव बरता जाता है।

स्त्रियों को सम्मान और बराबरी देने की पहल हो

आमतौर पर पुरुष कर्मचारी महिला बॉस के अधीन काम करना अपनी तौहीन समझते हैं इसलिए कॉरपोरेट ऑफिस भी महिलाओं को तरक्की देते वक्त यह देखते हैं कि उनके कर्मचारियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। मगर सौ बात की एक बात कि महिलाएं अगर नौकरी करने लगीं तो वे एक न एक दिन तो पुरुषों की दासता से मुक्त हो ही जाएंगी और तब वे वाकई देवीरूपा होंगी। जब वे दासता की बेडिय़ों से मुक्त होंगी। स्त्री को  सशक्त करने का समाज प्रयास करे। और इसके लिए उपयुक्त समय है देवी भगवती का पूजन।