मोदी लहर में बह गया विपक्ष का वंशवाद, बेटे-बेटी वाली सियासत खारिज !

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आर के झा

बह गया विपक्ष: वंशवाद की राजनीति हमेशा से बीजेपी की सियासत के सबसे अहम मुद्दों में रहा है। वह इस मुद्दे को लेकर हमेशा से विपक्ष पर हमलावर रही है। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस, सपा, आरजेडी, रालोद, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी पर निशाना साधती रही है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दौर में बीजेपी ने परिवारवाद के खिलाफ अपने तेवर पहले से ज्यादा तल्ख किए हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी कांग्रेस और मोदी विरोधी दूसरी पार्टियों के वंशवाद पर जमकर तंज कसा। खासतौर पर राहुल गांधी पर।

बेटे-बेटियों को रेवड़ियों की तरह बांटे टिकट

हालांकि बीजेपी की तमाम आलोचनाओं के बाद विपक्षी दलों के नेता अपने बेटे-बेटियों को टिकट देते रहे या दिलाते रहे। ऐसे में वंशवादी सियासत के खिलाफ बीजेपी नकारात्मक माहौल बनाने में सफल रही और परिणाम आया तो बड़े-बड़े नाम भी धराशायी हो चुके थे।

वंशवाद की हार का सबसे बड़ी हार राहुल ने झेली

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अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पार्टी के बड़े नेताओं के बेटों को लेकर खफा हैं। करारी हार के बाद सीडब्ल्यूसी की बैठक में राहुल गहलोत, कमलनाथ और पी चिदंबरम पर बेटों को टिकट दिलाने के लिए खूब बरसे। क्योंकि ये नेता पूरे प्रदेश में ध्यान देने की बजाय सिर्फ अपने बेटों को जितवाने में जुटे रहे। इससे पार्टी की दुर्गति हुई। दरअसल, विपक्ष में वंशवाद का सबसे बड़े उदाहरण खुद राहुल गांधी हैं, जिन पर ‘नामदार’ के नाम से पीएम नरेंद्र मोदी पूरे चुनाव में प्रहार करते रहे और राहुल खुद अपने सबसे बड़े गढ़ अमेठी से चुनाव हार गए।

रजवाड़ों से नई पीढ़ी के वोटरों का मोह भंग

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बह गया विपक्ष: राजनीतिक राजवाड़ों से नई पीढ़ी के वोटर का मोहभंग हो गया है। वो किसी का साम्राज्य या चेहरा देखकर आजकल वोट नहीं करता। कुछ राजनीतिक परिवार लोकतंत्र में खास तरह का ‘राजतंत्र’ चला रहे थे। लेकिन यह आज के वोटर को स्वीकार नहीं है। चुनाव आने पर नए जमाने के ये राजा पहले अपने परिवार को टिकट देते थे। जब उनसे कुछ टिकट बचता तब कार्यकर्ता का नंबर आता था।

परिवार को देते थे बड़ा पद

जब वे सत्ता में होते तो सारे बड़े पद अपने परिवार को देते थे, जो बचता था वो कार्यकर्ता को मिलता था। इसलिए ऐसे दलों को जनता भी नकार रही है और उनके कोर वोटर भी। जिन जातियों के नाम पर ये ‘राजनीतिक रजवाड़े’ खड़े हुए उन जातियों ने भी उन्हें खारिज कर दिया। अब इन दलों के अंदर भी परिवारवाद के खिलाफ आवाज उठने लगी है।

पार्टी को ले डूबा गहलोत का पुत्र मोह

राजस्थान के सीएम अशोक गहलौत ने अपने बेटे वैभव गहलोत को जोधपुर से टिकट दिलवाया। टिकट दिलवाने के बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान जोधपुर में अपने बेटे वैभव गहलौत को जिताने में लगाया। उन्होंने राज्य में 130 रैलियां की…इनमें से 93 रैलियां तो केवल वैभव के लिए की। बेटे के चक्कर में वो प्रदेश के दूसरे हिस्सों में ध्यान नहीं दे पाए। फिर भी वो बीजेपी के गजेंद्र सिंह शेखावत से बुरी तरह हार गए। अब इस बात पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी गुस्से में हैं।

जाटलैंड ने नकारे हुड्डा पिता-पुत्र

जाटलैंड रोहतक कांग्रेस और उसके वंशवाद दोनों का बड़ा गढ़ है। पहले यहां से स्वतंत्रता सेनानी रहे रणवीर सिंह हुड्डा दो बार सांसद बने। फिर उनके पुत्र भूपेंद्र हुड्डा ने भी चार बार यहां का प्रतिनिधित्व किया। भूपेंद्र हुड्डा के बेटे दीपेंद्र हुड्डा भी यहां से तीन बार सांसद रहे। लेकिन आखिर जनता इस परिवार को ही कब तक चुनती। इस बार दीपेंद्र हुड्डा को बीजेपी के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा। लगातार 10 साल तक हरियाणा के सीएम रहे भूपेंद्र हुड्डा ने सोनीपत से चुनाव लड़ा। लेकिन वहां बीजेपी के मौजूदा सांसद रमेश कौशिक के हाथों उन्हें हार का सामना करना पड़ा। कुल मिलाकर हरियाणा के सबसे बड़े कांग्रेसी परिवार को मोदी लहर में शून्य पर आउट होना पड़ा।

भजनलाल-बंसीलाल के वंशज भी हारे

हरियाणा के सीएम रहे बंसीलाल की पौत्री और कांग्रेस नेत्री किरण चौधरी की बेटी श्रुति चौधरी को भिवानी-महेंद्रगढ़ लोकसभा सीट से हार का सामना करना पड़ा। वो 2009 में यहां से कांग्रेस की सांसद रह चुकी हैं। लेकिन इस बार जनता ने नकार दिया।
हिसार सीट से पूर्व सीएम भजनलाल के पौत्र और कुलदीप विश्नोई के बेटे भव्य विश्नोई को जनता ने नकारते हुए बीजेपी नेता के वंशवाद को स्वीकार कर लिया। यहां जाट नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह के बेटे बिजेंद्र सिंह ने चुनाव जीता है।

चौटाला परिवार के बुरे दिन

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अब आते हैं चौटाला परिवार पर। राजनीति में इस परिवार के बुरे दिन चल रहे हैं। पहले तो यह परिवार आपस में लड़ा। जिससे इनेलो से टूटकर जन नायक जनता पार्टी दोनों ने अपने परिवार के सदस्यों को मैदान में उतारा। लेकिन जीत किसी को नहीं मिली।
जेजेपी बनाने वाले दुष्यंत चौटाला हिसार से चुनाव हार गए, उनके छोटे भाई दिग्विजय चौटाला सोनीपत में हारे। जबकि अभय चौटाला के छोटे बेटे अर्जुन चौटाला इनेलो की टिकट पर कुरुक्षेत्र से हार गए।

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सैफई परिवार की पकड़ हुई कमजोर !

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यूपी पर नजर डालें तो सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद मुलायम सिंह यादव परिवार के कई दिग्गज हार गए। अखिलेश यादव ने अपनी आजमगढ़ सीट बचा ली लेकिन कन्नौज में उनकी पत्नी डिंपल यादव हार गईं। राम गोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव को हार का मुंह देखना पड़ा। अखिलेश के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को बदायूं से हारना पड़ा। सपा से बगावत करके प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बनाने वाले अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव तो अपने सबसे बड़े गढ़ फिरोजाबाद से चुनाव हार गए। हालांकि यहां भी बीजेपी का वंशवाद जीत गया। यहां यूपी के श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा मौर्य ने चुनाव जीता। मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से जीते लेकिन मार्जिन कम हो गया।

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लालू की बुझ गई लालटेन

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बिहार की पाटलिपुत्र सीट से लालू प्रसाद की बड़ी बेटी मीसा भारती दोबारा अपनी किस्मत आजमा रही थीं….और इस बार भी उन्हें रामकृपाल यादव के हाथों शिकस्त मिली। उन्हें पिछली बार भी रामकृपाल यादव के हाथों हार मिली थी। मीसा ही नहीं लालू की पार्टी का सफाया हो गया। उसका एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका।

देवगौड़ा परिवार : दादा-पौत्र दोनों हारे

कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री एवं जेडीएस अध्यक्ष एचडी देवेगौड़ा को तुमकुर लोकसभा सीट पर हार का सामना करना पड़ा। देवगौड़ा के पौत्र निखिल को मांड्या सीट पर शिकस्त मिली। हालांकि, देवेगौड़ा के दूसरे पौत्र प्रवल रेवन्ना दादा की परंपरागत सीट हासन से जीतने में सफल रहे।

तेलंगाना में हारीं केसीआर की बेटी

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी कलवकुंतला कविता को निजामाबाद लोकसभा क्षेत्र में बीजेपी ने हराया. निजामाबाद सीट पर 178 किसानों सहित185 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था। 2019 के लोकसभा चुनाव में किसी एक सीट पर यह सर्वाधिक है। यह रिकॉर्ड तेलंगाना सरकार के खिलाफ किसानों की नाराजगी से बना।

पास नहीं हुए पवार के पौत्र

दूसरी ओर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार के पौत्र पार्थ पवार महाराष्ट्र की मावल लोकसभा सीट से चुनाव हारे। पार्थ पवार पूर्व उप मुख्यमंत्री अजित पवार के बेटे हैं। हालांकि, शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले बारामती से जीतने में कामयाब रहीं. यह सीट इस परिवार का गढ़ मानी जाती है।

बड़े बीजेपी नेताओं के कांग्रेसी पुत्रों का हाल

राजस्थान की बाड़मेर सीट से पूर्व विदेश एवं रक्षा मंत्री जसवंत सिंह के पुत्र मानवेंद्र सिंह को कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़कर हार का सामना करना पड़ा। उधर, उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल सीट से पूर्व मुख्यमंत्री और इसी सीट से सांसद रहे भुवन चंद्र खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी भी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव हार गए।