‘दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है..जैसी शायरी गढ़ने वाले मिर्जा गालिब की जयंती, पढ़ें उनकी मशहूर शायरियां

‘दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है…’इश्क ने ‘गालिब’ निकम्मा कर दिया… जैसी बेहद मशहूर शायरियां लिखने वाले शायर मिर्जा गालिब को उनके चाहने वाले उनकी शायरियों के माध्यम से उन्हें अपने दिल में बसाए हुए हैं। मिर्जा गालिब का पूरा नाम असद-उल्लाह बेग खां उर्फ गालिब था, उनका जन्म 27 दिसंबर 1796 में उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में एक सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था।

छोटी सी उम्र में गालिब के पिता की मौत हो गई जिसके बाद उनके चाचा ने उन्हें संभाला उनके बाद उनकी देखभाल उनके नाना-नानी ने की। छोटे पर्दे यानि टेलीविजन पर गुलज़ार का टीवी सीरियल ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ भी खासा चर्चित रहा था।

पेश हैं उनकी बेहतरीन चुनिंदा शायरियां–

दिल-ए-नादां, तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमां, लेकिन फिर भी कम निकले

मेहरबां होके बुलाओ मुझे, चाहो जिस वक्त
मैं गया वक्त नहीं हूं, कि फिर आ भी न सकूं
क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

या रब, न वह समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात
दे और दिल उनको, जो न दे मुझको जबां और

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

गालिबे-खस्ता के बगैर कौन-से काम बंद हैं
रोइए जार-जार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों

तुम सलामत रहो हजार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हजार

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

कैदे-हयात बंदे-.गम, अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी, .गम से निजात पाए क्यों

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

रंज से खूंगर हुआ इंसां तो मिट जाता है गम
मुश्किलें मुझपे पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

तुम सलामत रहो हजार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हजार

मिर्जा गालिब का मिजाज और दर्द उनकी शानदार शायरियों में छलकता है। गालिब ने तमाम शेर, शायरियां और किताबें लिखी हैं। मिर्जा गालिब ने अपनी आखिरी सांस 15 फरवरी 1869 में अपनी गालिब की हवेली, चांदनी चौक में ली थी।

https://youtu.be/G4fyG5_uWlk

 

 

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