महाशिवरात्रि स्पेशल- पार्वती होने का अर्थ…

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डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

महाशिवरात्रि स्पेशल- मन, कर्म और वचन से प्रेम को प्राप्त करने की अगाध श्रद्धा का प्रतीक है माँ सृष्टि का प्रतिरूप पार्वती। शिव अचल अदृश्य आत्मा है जबकि पार्वती शक्ति की आराधना है। पौराणिक ग्रंथों में देवी पार्वती को सर्वोच्च परब्रह्म की शक्ति रूप में उन्हें प्रकट किया गया है। सौभाग्य सूचक देवी पार्वती का जीवन त्याग,समर्पण,धैर्य,संकल्प और सिद्धि का पर्याय है। शिव से अनुराग इतना की माता पार्वती ने भौतिक सुख का परित्याग कर ग्रीष्म काल में अपने चारों और अग्नि कुण्ड जलाकर कड़ी तपस्या की थी। सूर्य के प्रचंड ताप से अविचलित वे लीन रही तथा वर्षाकाल की भीषणता और भयावहता को विनम्रता से निष्क्रिय करती रही। 

महाशिवरात्रि स्पेशल-शिवपुराण में पार्वती की तपस्या का वर्णन

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मन और इन्द्रियों का निग्रह कर सहस्त्रों वर्षों तक निराहार रही। शिवपुराण में पार्वती की तपस्या का वर्णन किया गया है जिसके अनुसार पार्वती ने सर्वप्रथम राजसी वस्त्रों का अलंकारों का परित्याग किया। वे घने वन में प्रस्थान कर गई और मूंज की मेखला धारण कर वल्कल वस्त्र पहन लिया। उन्होने मृग चर्म धारण किया और गंगावतरण में कठोर तपस्या पर बैठ गईं।

जब पार्वती को भा गये जटाधारी शिव

शिव की विचित्रताएं अकल्पनीय रही है। कंठ में पुंड माला, गले में रुद्राक्ष, त्रिशूल, डमरू और तन पर शमशान की भस्म। मनुष्य और असुरों में समान रूप से पूजे जाने वाले शिव के प्रति पार्वती का अनुराग प्रेम की निश्छलता को प्रतिबिंबित करता है।  भगवान शिव के प्रति इस अनुराग की परीक्षा लेने के लिये सप्तऋषियों पार्वती के पास गए। उन्होंने पार्वती के पास जाकर कहा कि शिव जी औघड़, अमंगल वेषधारी और जटाधारी हैं और वे तुम्हारे लिये उपयुक्त वर नहीं हैं। उनके साथ विवाह करके तुम्हें सुख की प्राप्ति नहीं होगी। तुम उनका ध्यान छोड़ दो।

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महाशिवरात्रि स्पेशल-अपने विचारों पर दृढ़ रहीं पार्वती

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किन्तु पार्वती अपने विचारों और निर्णय पर दृढ़ रहीं। उनकी दृढ़ता और संकल्प को देखकर सप्तऋषि  मनोरथ पूर्ण होने का आशीर्वाद देकर लौटे।  शिव पार्वती के जीवन में प्रेम,स्नेह,समर्पण,परस्पर विश्वास,निष्ठा और निश्छलता के विभिन्न रूप हमारी संस्कृति और सभ्यता की धरोहर है।

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निष्कपट अभिलाषाओं के साथ रहती हैं पार्वती

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भारतीय समाज में यह विश्वास किया जाता है की माँ पार्वती वहीं विराजती है जहां सृजनात्मक साधना के भाव और निष्कपट अभिलाषाएं विद्यमान हो। वे प्रेम की पवित्रता,सादगी,सुख का त्याग,दयालुता और मानवीय गुणों की व्यापकता है। वह निर्भयता की प्रतीक है। भगवान शिव के साथ दुर्गम कैलाश पर्वत पर रहने का उनका संकल्प प्रेम के प्रति असीम समर्पण की उच्चता है। युगों युगों से माँ पार्वती से प्रेम और उसकी पवित्रता का सम्मान करने की जीवन में प्रेरणा मिलती है।