UP के पहले चरण की सीटें, जिन पर कांग्रेस के सामने खाता खोलने की चुनौती

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उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव 2019 के लिये पहले चरण की 8 संसदीय सीटों पर 11 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे.  इनमें सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर की सीटें शामिल हैं. सूबे की ये सभी आठ लोकसभा सीटें पश्चिम उत्तर प्रदेश की हैं. पहले चरण की सियासी लड़ाई बीजेपी बनाम सपा-बसपा-आरएलडी गठबंधन के बीच सिमटती जा रही है. ऐसे में कांग्रेस के लिए इस दौर में खाता खोलने की बड़ी चुनौती है.

2014 में 8 सीटों पर जीती थी बीजेपी

2014 के लोकसभा चुनाव में इन सभी आठ सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी. हालांकि, बाद में 2018 में कैराना लोकसभा सीट पर हुए चुनाव में बसपा और सपा के समर्थन से आरएलडी ने बीजेपी से ये सीट छीन ली थी. इसी जीत के फॉर्मूले को 2019 के लोकसभा चुनाव में दोहराने के लिए सपा-बसपा और आरएलडी ने हाथ मिलाया है. गठबंधन से दरकिनार हुई कांग्रेस अब अकेले चुनावी मैदान में उतरी है

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6 सीटों पर लड़ रही है कांग्रेस

कांग्रेस पहले चरण की आठ लोकसभा सीटों में से कांग्रेस महज 6 सीटों पर चुनावी मैदान में है. बागपत में जयंत चौधरी और मुजफ्फरनगर सीट पर चौधरी अजित सिंह के खिलाफ कांग्रेस ने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं. एक तरह से कांग्रेस ने इन दोनों सीटों पर आरएलडी को वॉकओवर दिया है. इस तरह से कांग्रेस पहले चरण में तीन चौथाई सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है.

इनका भाग्य दांव पर

 कांग्रेस ने सहारनपुर सीट से इमरान मसूद, कैराना से पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक, बिजनौर से नसीमुद्दीन सिद्दीकी,  हरेंद्र अग्रवाल, गाजियाबाद से डॉली शर्मा और गौतमबुद्ध नगर अरविंद कुमार सिंह को मैदान में उतारा है. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इन छह लोकसभा सीटों में से महज सहारनपुर सीट है, जहां कांग्रेस कुछ चुनाव लड़ती हुई नजर आ रही है. लेकिन बसपा ने मजबूत और मुस्लिम उम्मीदवार हाजी फजलुर्रहमान को उतार दिया है.ऐसे में सहारनपुर सीट पर मुस्लिम वोट बसपा और कांग्रेस के बीच बटने की संभावना दिख रही है. ऐसे ही बिजनौर लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को उतारा है. जबकि गठबंधन से बसपा के मलूक नागर मैदान में है. सहारनपुर की तरह बिजनौर सीट पर भी मुस्लिम वोटों के बंटने की अटकलें लगाई जा रही हैं.

इन पर लगाया है दांव

मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने बाबू बनारसी दास के बेटे हरेंद्र अग्रवाल को उतारा है. बीजेपी ने भी अपने दो बार के मौजूदा सांसद राजेंद्र अग्रवाल को एक फिर उम्मीदवार बनाया है. जबकि गठबंधन ने हाजी याकूब कुरैशी पर दांव लगाया है. इससे पहले बीजेपी उम्मीदवार के जीत की मुख्य वजह मुस्लिम वोटों के बटना माना जाता है. इस बार अकेले चुनावी मैदान में हैं, जबकि बीजेपी और कांग्रेस ने वैश्य समुदाय पर दांव लगाया है.

जातिगत समीकरण

गाजियाबाद में कांग्रेस ने ब्राह्मण उम्मीदवार के तौर पर डॉली शर्मा को उतारा है. इस सीट पर करीब दो लाख ब्राह्मण मतदाता हैं. लेकिन इस सीट पर करीब 27 लाख वोटर हैं. ऐसे में महज ब्राह्मण वोटों से जीत के द्वार नहीं खुलते दिख रहे हैं. ऐसे ही गौतमबुद्ध नगर सीट से कांग्रेस ने अरविंद कुमार सिंह को उतारा है. जबकि बसपा ने सतबीर गुर्जर और बीजेपी से महेश शर्मा मैदान में है. इस तरह से त्रिकोणीय मुकाबला माना जा रहा है, लेकिन अरविंद के लिए ये इलाका नया है. ऐसे में उन्हें नोएडा संसदीय सीट पर अपने पहचान बनाने की एक बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

दिलचस्प बात ये है कि पहले चरण की ऐसी कोई भी सीट नहीं हैं, जहां महज मुस्लिम मतों से सहारे जीती जा सके. ऐसे में राजनीतिक समीकरण के लिहाज से देंखे तो कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों को अपने वोटबैंक के साथ-साथ दूसरे मतों को अपने साथ जोड़ने की बड़ी चुनौती है. वही, सपा-बसपा-आरएलडी के वोटबैंक को देखें तो करीब 50 फीसदी के ऊपर पहुंच रहा है. ऐसे में गठबंधन अगर अपने वोटबैंक को साधकर रखता है तो सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के लिए होगी.