15 जनवरी से शुरू होगा महाकुंभ, जानें क्या है धार्मिक मान्यता

इलाहाबाद में महाकुंभ की सारी तैयारियां पूरी हो गई हैं। 15 जनवरी से 4 मार्च तक यहां कुंभ मेला लगेगा। यहां हर साल माघ मेले का आयोजन किया जाता है। जो मकर संक्रांति के दिन से शुरू होकर महा शिवरात्रि तक चलता है। महाकुंभ 12 साल में एक बार होता है जबकि अर्ध कुम्भ का आयोजन 6 सालों में एक ही बार होता है।

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धार्मिक मान्यताओं की बात करें तो‍ कुम्भ का शाब्दिक अर्थ है कलश। कुम्भ मेले का इतिहास हजारों वर्ष पुराना माना जाता है। यह वह समय था पृथ्वी पर केवल देव और दानव ही रहते थे, मानव नहीं। इस समय सबसे महत्वपूर्ण कार्य था धरती को रहने लायक बनाना और धरती पर मानव सहित अन्य आबादी का विस्तार करना।

महाकुंभ इलाहबााद यानी आज के प्रयाग में आयोजित हो रहा है। प्रयाग में हिंदू धर्म से तीन पावन नदियों का समावेश होता है, जिसमें गंगा, यमुना और सरस्वती एक साथ बहती हैं। यहीं पवित्र स्नान की परंपरा है।

धरती के विस्तार और इस पर विविध प्रकार के जीवन निर्माण के लिए त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) ने लीला रची और उन्होंने देव तथा दानवों की शक्ति का उपयोग कर समुद्र मंथन कराया। समुद्र मंथन कराने के लिए रचा जाना आवश्यक था।

इसी के तहत ऋषि दुर्वासा ने एक बार अपना अपमान होने के कारण इन्द्र को ‘श्री’ (लक्ष्मी) से हीन हो जाने का शाप दे दिया। जिसके कारण लक्ष्मी समुद्र में चली गयी। भगवान विष्णु ने इंद्र को शाप मुक्ति के लिए असुरों के साथ ‘समुद्र मंथन’ के लिए कहा और दैत्यों को अमृत का लालच दिया। यह समुद्र था क्षीर सागर जिसे आज हिन्द महासागर कहते हैं। ऐसे में मंदराचल पर्वत मथनी बना, वासुकी नाग उसकी नेति (रस्सी) और आधार बना विष्णु का कच्छप (कछुआ) अवतार। मंथन से चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई जिन्हें देवों और दानवों में बराबर बाँट लिया गया परन्तु जब धन्वन्तरि ने अमृत कलश देवताओं को दे दिया तो फिर युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। तब भगवान् विष्णु ने स्वयं मोहिनी रूप धारण कर सबको अमृत-पान कराने की बात कही और अमृत कलश का दायित्व इंद्र-पुत्र जयंत को सौपा। अमृत-कलश को प्राप्त कर जब जयंत दानवों से अमृत की रक्षा हेतु भाग रहा था तभी इसी क्रम में अमृत की बूंदे पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरी- हरिद्वार, नासिक, उजैन और प्रयागराज। चूँकि विष्णु की आज्ञा से सूर्य, चन्द्र, शनि एवं बृहस्पति भी अमृत कलश की रक्षा कर रहे थे और विभिन्न राशियों (सिंह, कुम्भ एवं मेष) में विचरण के कारण ये सभी कुम्भ पर्व के साक्षी बन गये। इस प्रकार ग्रहों एवं राशियों की सहभागिता के कारण कुम्भ पर्व ज्योतिष का पर्व भी बन गया। जयंत को अमृत कलश को स्वर्ग ले जाने में 12 दिन का समय लगा था और माना जाता है कि देवताओं का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर होता है। यही कारण है कि कालान्तर में वर्णित स्थानों पर ही ग्रह-राशियों के विशेष संयोग पर 12 वर्षों में कुम्भ मेले का आयोजन होता है।

मान्यताएं अपनी जगह हैं लेकिन बुद्धिजीवियों के लिये शोध का विषय है कि कब कुम्भ आरम्भ कब हुआ। किन्तु यह एक स्थापित सत्य है कि प्रयाग कुम्भ का केन्द्र बिन्दु रहा है। ऐतिहासिक साक्ष्य दर्शाते हैं कि कुम्भ मेले का आरम्भ महाराज हर्षवर्धन के शासन काल (664 ईसा पूर्व) में हुआ जब कुंभ मेले को विभिन्न मतों से मान्यता प्राप्त हो गयी थी। प्रसिद्व यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तांत में कुंभ मेले की महानता का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि राजा हर्षवर्धन प्रयाग के संगम की रेत पर एक महान पंचवर्षीय सम्मेलन का आयोजन करते थे और अपनी सम्पत्ति को सभी वर्गो के गरीब एवं धार्मिक लोगों में बांट देते थे। इस व्यवहार का अनुसरण उनके पूर्वजों के द्वारा किया जाता था। शास्त्रों के अनुसार भी ब्रह्मा जी ने पवित्रतम नदी गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर दशाश्वमेघ घाट पर अश्वमेघ यज्ञ किया था और सृष्टि का सृजन किया था।

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