कव्वालियों के लिये याद आती है 60 की हिट मूवी ‘बरसात की रात’

barsat ki rat

कव्वालियों के लिये आज भी याद आती है 1960 में रिलीज ‘बरसात की रात’। एक रोमांटिक फिल्म होने के साथ-साथ आने वाले दशकों तक भी जिस बात के लिए यह मूवी याद रखी जाएगी वह है उसका संगीत। इस संगीत को समृद्ध करने वाले गीत रचे थे साहिर लुधियानवी ने। उस पर सिनेमा हाल में बैठे दर्शकों के दिल बल्लियों उछालने वाली नायक और नायिका की जोड़ी—मधुबाला और भारत भूषण।

‘ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात

कव्वालियों के लिये याद की जाने वाली इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मधुबाला से भारत भूषण की नजदीकियों के फिल्मी किस्से चूंकि उस जमाने की अखबारों और पत्रिकाओं में स्थान बना चुके थे, इसीलिए जब फिल्म पर्दे पर आयी तो दर्शकों को मानो किस्से भी असली लगने लगे। हालांकि यह बात अलग है कि मधुबाला भारत भूषण की पत्नी सरला की जिगरी दोस्त थीं। जैसे ही पर्दे पर शायर बने भारत भूषण ‘ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात’ था ‘मैंने  शायद तुम्हें पहले भी कहीं देखा है’ गाते तो आंखों से बतियाती मधुबाला के हाव-भाव देखने वाले होते।

यह फिल्म मधुबाला की अंतिम फिल्मों में से एक थी। 1950 से लगातार वह हिट पर हिट दे रही थीं लेकिन वर्ष 1960 मधुबाला को ओर भी बुलंदियों पर ले गया। इस साल ‘बरसात की रात’ के साथ के. आसिफ की मुगले-आजम भी रिलीज हुई थी। गजब की खूबसूरती, उस पर कई हजार वाट की हंसी वाली मुमताज जहां को मधुबाला नाम देविका रानी ने दिया था।

न तो कारवां की तलाश है (कव्वाली)

संगीत में भी जो बात दर्शकों और श्रोताओं के सिर चढ़ बोली वह थी फिल्म की कव्वालियां। ‘न तो कारवां की तलाश है न तो हम सफर की तलाश है’, रेडिया पर उस वक्त भी खूब गायी गई। फिल्म का कोई भी गाना उठा लो, आउट डेटेड नहीं लगता। पीएल संतोषी के निर्देशन में बनी यह फिल्म मूलत: प्रेम कहानी थी। फिर प्रेम कहानी तो रोमांस तब तक अधूरा ही कहा जाएगा जब तक वह बारिश में न भीगे। खासकर उनका तो कतई नहीं जिन्होंने किसी को दिल दे दिया हो। दिल देते ही हर प्रेमी कवि तो जरूर ही बन जाता है भले ही छोटा-मोटा कवि क्यों न हो।

भला हो इस बारिश का जिसने हमें बेशकीमती कवियों कालीदास, कीट्स, गालिब और साहिर जैसे से नवाजा है। इसके अलावा जिसके कारण यह फिल्म लोगों के दिलों में घर बना पायी, वह था नारी प्रधान फिल्म। इसमें मुमताज बेगम के अलावा श्यामा भी थीं। वहीं ‘आरपार’ फिल्म वाली श्यामा जिसने बाद में सिनेमैटोग्राफर कली मिस्त्री से से शादी कर ली थी।

ये इश्क इश्क है (कव्वाली)


कव्वालियों के लिये आज भी याद आती है 1960 में रिलीज ‘बरसात की रात’। एक रोमांटिक फिल्म होने के साथ-साथ आने वाले दशकों तक यह संगीत के लिये याद की जाएगी।

हालांकि यह फिल्म भी ब्लैक एंड व्हाइट लेकिन पेशकश के मिजाज से पूरी तरह रंगीन थी। कहानी में अमान (भारत भूषण) का सामना मानसून की पहली बरसात में मधुबाला (शबनम) से होता है। बारिश में भीगी, सकुचाती शबनम की तस्वीर अमान के दिलोदिमाग पर चस्पां हो जाती है। वह जाना-माना शायर अब रेडियो पर गाना गाता है तो उसी रात की मुलाकात की बात गाने में सुनकर शबनम को समझते देर नहीं लगती कि यह वही शायर है जिसकी शायरी पर वह फिदा है। एक अन्य कार्यक्रम में दोनों का फिर आमना-सामना होता है। फिर मुलाकातों के सिलसिले के बाद अमान शबनम की बहन को ट्यूशन पढ़ाने लगता है।

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जी चाहता है चूम लूं (कव्वाली)

प्रेम परवान चढ़ने लगता है तो एक दिन शबनम के पिता खान बहादुर जो शहर के पुलिस कमीशनर हैं, केएम सिंह पर यह राज जाहिर हो जाता है। वे उसे घर से निकाल देते हैं। वे दोनों शहर छोड़कर लखनऊ में किसी दोस्त के यहां जैसे ही निकाह करना चाहते हैं तो इंस्पेक्टर शेखर सीन में दाखिल हो जाता है। शबनम को बाकायदा घर लाया जाता है जहां खान बहादुर अपने दोस्त के बेटे से शादी करवाने के लिए शबनम को उसी शहर में उसी घर में ले जाते हैं जिस दोस्त के घर में अमान ठहरा होता है। कव्वालियों की प्रतियोगिता के सिलसिले में कव्वाली गाने वाली बहने उसी के शहर में आई होती हैं, जिनकी कव्वालियां रचनाबद्ध अमान ही करता है। कव्वाली प्रतियोगिता उन्हें पराजित होते देख अमान खुद माइक संभालता है, जिसकी अवाज़ बीमार शबनम पहचान लेती है। अंत में दोनों का मिलना हो जाता है।

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फिल्म निर्माण टीम: प्रोड्क्शन : आर. चंद्रा, निर्देशन : पीएल संतोषी, गीतकार : साहिर लुधियानवी, संगीतकार : रोशन, सितारे : मधुबाला, भारत भूषण, श्यामा, मुमताज बेगम, केएन सिंह, रिलीज : 1960, कथा : रफी आजमेरी, पटकथा : पीएल संतोषी एवं भारत भूषण, संवाद : एस. सैलानी