जलियांवाला बाग हत्याकांड: एक सदी के बाद भी हरे हैं जख़्म

collage jaliawala

NIROSHA SINGH

जलियांवाला बाग हत्याकांड, 13 अप्रैल 1919 का दिन, राष्ट्र की स्मृतियों में एक सदी के बाद भी ताज़ा है। यह वह दिन है जब बैसाखी मनाने जुटे निहत्थे, बेकसूर और मासूमों पर अंग्रेज़ सरकार का कहर बरपा था। इस दिन अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में एक जनसभा रखी गई थी। डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलट एक्ट के विरोध में लोग शांतिपूर्ण ढंग से अपना विरोध दर्ज कराने के लिए यहां जमा हुए थे, इसमें औरतें, मर्द, बच्चे सब थे । वहां एकत्रित लोग इस बात से अनजान थे कि पूरे पंजाब समेत अमृतसर में मार्शल लॉ लग चुका है। सब कुछ बड़े शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था।

jaliawala bagh

इसी समय जरनल डायर (रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर) ने अपने 90 सैनिकों के साथ जलियांवाले बाग की घेराबंदी कर दी और अपने सैनिकों को फायर करने का आदेश दे दिया। पूरे दस मिनट तक गोलियां चलती रहीं। लोगों ने जान बचा कर भागने की कोशिश की मगर दरवाजे बंद हो चुके थे, जो रास्ता खुला था वह इतना तंग था कि लोग भागने में नाकाम रहे और अंग्रेज सिपाहियों की गोलियों का शिकार हो गए। 1650 राउंड फायर होने के बाद सभी सिपाहियों की गोलियां खत्म हो गयीं।

1800 से अधिक लोग मारे गए , ऐसा था आलम
bodies in well

हवा में धूल और खून के छींटे थे, हरी घास खून से लाल हो गई थी, पूरा जलियांवाला बाग मासूमों की चीखों से गूंज उठा था। हर तरफ लाशें ही लाशें दिख रही थीं। कुछ गोली से मारे गए तो सैकड़ों ने कुएं में छलांग लगा दी। बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुएं से ही मिले। आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए। स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी। उस घटना को याद कर के आज भी हर भारतीय का खून खौल उठता है।

अपनी आंखों से जघन्य हत्याकंड को देख रहा था एक बच्चा…
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13 अप्रैल 1919 को जब अंग्रेज़ सैनिक भारतीयों पर गोलियां बरसा रहे थे एक छोटा सा बच्चा यह सब अपनी आंखों से देख रहा था। इस फायरिंग से अनजान भीड़ में खोया यह बच्चा बड़े उत्त्साह के साथ सबको पानी पिला रहा था, उसे नियति ने बचा लिया था। शायद इसलिए कि वो इन मासूमों की मौत का बदला ले सके। तब इस मासूम से बच्चे ने यह प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक वो इस घटना के जिम्मेदार लोगों को को मौत के घाट नहीं उतरेगा तब तक उसके मन से ये छाप नहीं उतरेगी। मुख्यरूप से घटना के जिम्मेदार दो लोग थे एक वहां मौजूद जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर तथा दूसरा तत्कालीन पंजाब गवर्नर माइकल फ्रांसिस ओ ड्वायर।

मर गया था डायर

वो वीर सपूत 1934 में लन्दन पहुंच गया लेकिन जिन दो हैवानों को उसने मारने की प्रतिज्ञा ली थी उसमे से जरनल डायर 1927 में ही बीमारी की वजह से मर चुका था। अब उस शख्स का एक ही लक्ष्य था और वो था माइकल ओ डायर की हत्या। इसके लिए वह 6 वर्ष तक मौके तलाशता रहा और अंततः 13 मार्च 1940 में उसे यह मौका तब मिला जब माइकल ओ डायर लंदन के काक्सटन हॉल में एक सभा में शामिल होने के पहुंचा। वो बच्चा जो अब एक जवान शख्स था, वह भी उस सभा में शामिल हुआ। वह एक मोटी किताब के पन्नों को रिवाल्वर के आकार में काट कर उनमें रिवाल्वर छिपा कर हाल के भीतर घुसने में कामयाब हो गया। सभा के समाप्त होते ही सभी उठ कर बाहार जाने लगे तथा तभी मौका पा कर उसने ओ डायर को निशाना बनाते हुए गोलियां दाग दी. डायर को दो गोलियां लगीं और वह वहीं ढेर हो गया।

सजा को सहर्ष स्वीकार किया
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वो वीर सपूत अपना बदला ले चुका था। वह चाहता तो वहां मौजूद और लोगों को मार कर वहां से भाग सकता था। लेकिन उसने गोलियां होने के बावजूद भी ना किसी और को नहीं मारा और ना वहां से भागा। क्योंकि उसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली थी। भारत मां के वो वीर सपूत थे सरदार उधम सिंह । 31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में उधमसिंह को फाँसी दे दी गई, जिसका उन्हें कोई गम नहीं था। उन्होंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उधमसिंह के अवशेष भारत को सौंप दिए।

शहीद उधम सिंह द्वारा माइकल ओ ड्वायर को मारने से भले ही जलियांवाला बाग़ में मारे गए मासूमों को वापिस ना लाया जा सका हो किन्तु दुनिया को ये सन्देश ज़रूर मिला कि इंसान के गुनाहों की सजा यहीं इसी दुनिया में मिलती है। आज जलियांवाला बाग हत्याकांड स्मृति दिवस है। 99 वर्ष पहले आज के दिन जो जख्म भारतवासियों के दिलों पर दिया गया, वो ऐसा नासूर बन गया कि हर वर्ष आज के दिन वो हरा हो जाता है। हम जलियांवाला बाग में मारे गए सभी मासूमों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।