किसानों को सबल बनाने के लिए ‘जयराम सरकार’ को तलाशने होंगे नए विकल्प

न्यूजीलैंड के बागवान जहां प्रति हेक्टेयर में 60 से 65 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन करते हैं, वहीं हिमाचल के सेब उत्पादक 5 से 6 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन करते हैं, यही हालत हर फसल की है मेहनत के बावजूद किसान के जीवन में वैसी खुशहाली देखने को नहीं मिलती है।

विकास शर्मा

दिसंबर की छुट्टियों में अपने घर गया तो गांव के ज्यादातर लोग गेंहू को पानी लगाने में व्यस्त दिखे। आगे बढ़ने से पहला बता दूं कि मेरा गांव हिमाचल प्रदेश के कांगडा जिले के ज्वाली कस्बे में है, इस क्षेत्र को प्रदेश के लोग सिद्धाथा ( Sidhatha medium irrigation scheme in Jawali ) के नाम से भी जानते हैं। यह पूरा क्षेत्र समतल है और जहां की जमीन भी काफी उपजाऊ है, लेकिन इलाके के लोग जमीन के इस उपजाऊपन का लाभ नहीं उठा पाते थे, दरसअल इस रबी सीजन से पहले तक, जहां के लोगों की खेतीबाड़ी के लिए बारिश पर निर्भर थी। इसी साल सिद्धाथा नहर ( Sidhatha) शुरू हुई और लोग की उम्मीदों को भी पंख लग गए। गांव का हर किसान आज बारिश ना होने को लेकर चिंतित नहीं है, सब व्यस्त है और सबको इंतज़ार है पानी लगाने के लिए अपनी तय बारी का। खुशहाली की तरफ जाते हुए किसानों को देखकर काफी खुशी हुई, लेकिन इसके साथ एक नए विचार ने भी जन्म लिया, क्या खेत तक पानी पुहंच जाने से किसानों के दिन बदल जाएंगे, शायद नहीं।

हाईटेक नहीं हैं किसान ( Farmers are not hi-tech)


वजह यह है कि ज्यादातर किसान कम पढ़े लिखे है, वो हाईटेक ( hi tech) ढ़ंग से खेती नहीं करते। सभी किसानों ने अपने खेतों में गेंहू बोया है। ऐसे में जरूरत है इन किसानों को हाईटेक करने की, इन्हें मुनाफे की खेती के गुर सिखाने की। उन्नत बीजों, उन्नत फसलों और खेती के साथ आय के साधनों के बारे में बताने की। शायद तभी इन किसानों को इस सिद्धाथा नहर से फायदा मिलेगा और इनके दिन फिर सकेंगे। हिमाचल प्रदेश की पूर्व सरकारों सरकारों के लिए में कृषि संकट गंभीर विषय नहीं रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर हालत काफी खराब है।

बंजर होती जा रही ज़मीन  (Land becoming barren)

 

प्रदेश की 30 फीसद जमीन ( 30 % of agriculture land) खेतीबाड़ी नहीं होने की वजह से बंजर हो गई है। प्रदेश में रबी की फसल में साल दर साल गिरावट दर्ज हो रही है। बढ़ती कृषि लागत, जंगली जानवरों और लावारिस पशुओं के बढ़ते नुकसान और फसल का कम एमएसपी मिलना जैसी कई वजह हैं जिनके कारण किसानों का खेतीबाड़ी से मोह भंग हो रहा है। इसका दोहरा नुकसान राज्य को भी हो रहा है, एक तो आर्थिक तौर पर और दूसरा बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़े के तौर पर। अगर इस समस्या को अभी गंभीरता से नहीं लिया तो सरकार को भविष्य में वैसी ही दिक़्क़तों का सामना करना पड़ेगा जैसे देश के अन्य राज्यों की सरकारें कर रही हैं। कृषक और कृषि की स्थिति को लेकर राज्य सरकारें कितनी चिंतित है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता हैकि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में किसी दल के घोषणा पत्र में कृषि क्षेत्र को लेकर कोई एक भी घोषणा व नीति पर चर्चा नहीं थी। हालात सामान्य है ऐसा भी नहीं भी नहीं है, बावजूद इसके किसान सरकार के एजेंडे पर नहीं है उनकी जरूरतों और परेशानियों में कोई दल गंभीरता नहीं दिखा रहा है।

इतना ही काफी नहीं है ‘सरकार’ (That’s not enough)

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ( himachal pradesh chief minister Jairam Thakur)  ने साल 2018 के बजट में एक विज़न के साथ इस दिशा में अपनी गंभीरता जरूर दिखाई। बजट ( state budget) में बागवानी सुरक्षा योजना के लिए 10 करोड़, पुष्प क्रांति के 10 करोड़ और मुख्यमंत्री मधु विकास योजना के 10 करोड़ खर्च करने की घोषणा की गई। इन योजनाओं के लिए यह रकम काफी कम है लेकिन ख़ुशी इस बात की है कि सरकार कृषि विविधता की तरफसोच रही है। सरकार को कृषि की वैज्ञानिक पद्धति से भी किसानों को अवगत करवाना होगा।

न्यूज़ीलैंड से कुछ सीखें….? (Learn something from New Zealand ….?

गौरतलब है कि न्यूजीलैंड ( new zealand) के बागवान जहां प्रति हेक्टेयर में 60 से 65 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन करते हैं, वहीं हिमाचल के सेब उत्पादक 5 से 6 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन करते हैं, यही हालत हर फसल की है जिससे मेहनत के वावजूद किसान के जीवन में वैसी खुशहाली देखने को नहीं मिलती है। कृषि और बागवानी को लेकर जैसी सोच अंग्रेजों में थी, वैसी ही सोच मौजूदा सरकार की चाहिए, अंग्रेज 17 वीं शताब्दी में आलू लाए, आज हिमाचल आलू बीज उत्पादन का हब है, शिमला के केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र में 51 उच्च उपज वाली किस्म के आलू बीज तैयार होते हैं, इसके अलावा पहाड़ी से मैदानी इलाकों में आलू का बम्पर उत्पादन होता है।

सेब,  चाय के उत्पादन को बढ़ावा देने की दरकार ( need to promote the production of tea)

अंग्रेज 18 वीं शताब्दी में चाय लाए, उन्होंने न सिर्फ इससे हिमाचल ( himachal pradesh)  के लोगों को वाकिफ करवाया, बल्कि दुनिया के बाजारों में भी कांगड़ा चाय को पहचान दिलाई। सेब उत्पादन से हुए बदलाव देखने हो तो शिमला -कुल्लू के लोगों के जीवन स्तर को देखकर इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है । यह सब फसलें आज प्रदेश की आर्थिकी में अहम भूमिका अदा कर रही हैं। इसके अलावा जिन जिन इलाकों में मजबूत कृषि तंत्र है, वहां बेरोजगारों की संख्या भी कम है। न्यूजीलैंड के बागवान जहां प्रति हेक्टेयर में 60 से 65 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन करते हैं, वहीं हिमाचल के सेब उत्पादक ( apple producers in himachal) 5 से 6 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन करते हैं, यही हालत हर फसल की है मेहनत के बावजूद किसान के जीवन में वैसी खुशहाली देखने को नहीं मिलती है। हिमाचल प्रदेश के दोनों बड़े दलों को कृषक और कृषि की स्थिति अभी इतनी चिंताजनक नहीं लगती है, शायद यही वजह है कि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में किसी दल के घोषणा पत्र में कृषि क्षेत्र को लेकर कोई छोटी बड़ी बात नहीं थी।

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