कुदरत की नेमतों का देश ऑस्ट्रेलिया/ In The Land Of Kangaroos

युक्लिप्‍टस और एंगोफोरा के सदाबहार ऊंचे -ऊंचे पेड़ ! उनके मोटे -मोटे तनों लेकिन पतली, नाजुक टहनियों से घिरे घर, बाजार बल्कि पूरा शहर ही ! इन पेड़ों की टहनियों पर बेखौफ बैठे रंगीन परों वाले सुग्‍गों के जोड़े । कभी अपने रंगीन परों को पसार इधर से उधर उड़ते अथवा आंखें मटकाते, चोंच लड़ाते दिखते । मैग्‍पई विशेष पक्षी । कौए जैसा, लेकिन गर्दन और छाती में सफेद धारियां । यदि सावधान न रहें, तो सिर में चोंच मार देते । कौए भी ऐसे, जब बोलते तो लगता कोई दूध पीता बच्‍चा मां को रो- रोकर बुला रहा हो !  शारी (पहाड़ी मैना) देख, अपने घर की याद आ गई । तोते तो एकदम रंग -बिरंगे । पेड़ों की ऐसी ही हरियाली अथवा प्राकृतिक सौंदर्य की रूप, छटा पूरे शहर में मुखर ! सहज, सवर्त्र  दृष्टिगोचर होता हुआ ।  सितंबर माह का तीसरा दिन । लेकिन पूरा वातावरण ठंड की चपेट में । ऐसी ठंड लखनऊ में जनवरी के महीने में होती है । दिल्‍ली या लखनऊ में सितंबर माह के प्रथम सप्‍ताह में उमस भरी गर्मी, बहते, पौंछते पसीने के विपरीत यहां रजाई ओढ़कर बैठे ठंड को हराने की जुगत भिड़ा रहे थे । इन दिनों दिल्‍ली में एसी ऑन होता है, जबकि यहां हीटर ऑन हैं । हिमाचल प्रदेश के कुल्‍लू, मनाली अथवा शिमला, डलहौजी के मौसम से भी कुछ अलग, अनोखा सा है यहां ।

प्रशान्‍त महासागर से घिरा ऑस्‍ट्रेलिया महाद्वीप का देश ऑस्‍ट्रेलिया ! इसका सबसे बड़ा शहर सिडनी है । ऑस्‍ट्रेलिया का सबसे घनी आबादी वाला शहर । यह ऑस्‍ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्‍यावसायिक केंद्र भी  है । जैसे भारत में मुंबई । सिडनी की सड़कों, मार्केट, शॉपिंग मॉल्‍स, ट्रेन, टेक्‍सी, स्‍मारक, पर्यटक स्‍थल जहां भी जाएं, जैसे भी पहुंचे, सभी जगह दुनिया भरके लोग सहज ही दिख जाते हैं । गोरे- भूरे, लाल- गुलाबी, गेहुंए- सांवले, काले सभी रंगों के । चौड़े चेहरे, चपटे चेहरे, बड़ी -बड़ी आंखें, छोटी -छोटी आंखें ! चौड़ी और लंबी नाक वाले, चपटी और चिपकी नाक वाले । गोरे अंग्रेज, तो भूरी रंगत वाले जापानी, चीनी, कोरियाई । गेंहुए, सांवले रंग वाले भारतीय, पाकिस्‍तानी, श्रीलंकाई तो काली रंगत वाले अफ्रीकन । यह बताया गया कि सिडनी शहर में सर्वाधिक जनसंख्‍या यूरोपियन और चीनी लोगों की है । चेट्सवुड मार्केट तो पूरी तरह चीनियों का ही है । सिडनी में पैरामंटा उप नगर में भारतीय समुदाय के लोगों की बहुतायत के साथ -साथ भारतीय दुकाने, रेस्‍टोरेंट भी बहुत हैं ।  इस क्षेत्र में श्रीलंकाई भी अधिक हैं । इसी प्रकार रॉकडेल क्षेत्र में नेपालियों की संख्‍या बहुत अधिक है ।

दिल्‍ली से अपराह्न 3.15 बजे एयरइंडिया के विमान से लगभग 12.30  घंटे की नॉन स्‍टॉप उड़ान के पश्‍चात ग्‍यारह हजार किलोमीटर का लंबा सफर विभिन्‍न आकाश मार्ग – दिल्‍ली,  बैंकॉक, हो –चिन्‍ह- मिन्‍ह, कोलबों, जकार्ता, डारबिन के ऊपर से 35000 फीट की ऊंचाई से  उड़ता हुआ हिंद महासागर तथा प्रशान्‍त महासागर को लांघता, पार करता हुआ विमान सुबह लगभग 7.00 बजे सिडनी एयरपोर्ट ( SYDNEY AIRPORT) पर उतरा था । एक नया देश सामने था । नया परिवेश, नई जगह, अजनबी शहर !  परन्‍तु देश बदलने से क्‍या होता है ? दुनिया में कहीं भी चले जाएं, धरती तो एक ही जैसी है । आकाश भी एक ही जैसा है । पानी एक सा है, और हवा भी एक सी । लेकिन हां ! अंतर है, तो शक्‍ल –सूरत, वेश- भूषा, भाषा- बोली, ओढ़ना- पहनना, रहन- सहन, खाने- पीने में है । सिडनी शहर की कुल जनसंख्‍या 60 लाख से ऊपर है । परन्‍तु ऑस्‍ट्रेलिया की कुल आबादी भारत के उत्‍तर प्रदेश राज्‍य से आधे के बराबर भी नहीं है । बेशक क्षेत्रफल में दुनिया का 6वां सबसे बड़ा देश है । प्रति व्‍यक्ति आय के मामले में विश्‍व का दूसरा देश । (Fully literate) पूर्णत: साक्षर, पूर्णत: शिक्षित !

 

 

माल वही, दाम अलग

यह जानकर आश्‍चर्य हुआ कि एक ही वस्‍तु का यहां हर दुकान, हर शॉप में अलग -अलग रेट है । एक ही मार्केट में किसी दुकान में कम, तो किसी में बहुत अधिक !  यानी माल वही, दाम अलग ! दुकानें समय पर खुलती हैं, और समय पर ही बंद होती हैं । लेकिन चीनी, नेपाली, भारतीय अपनी दुकानें देर शाम, देर रात तक भी इस प्रयोजन से खुली रखते हैं कि अधिक से अधिक बिक्री हो । ज्‍यादा से ज्‍यादा मुनाफा मिले । स्‍थानीय निवासी अपनी दुकानों को देर से खोलते हैं, और जल्‍दी बंद करते हैं । उनका उद्देश्‍य स्‍पष्‍ट है । न अधिक चिंता, मेहनत, ना ही अधिक कमाई  की अकांक्षा !  यह जानकर अच्‍छा लगा कि चीनी भी भारतीयों की तरह अपने परिवार, संबंधियों के प्रति बहुत समर्पित होते हैं । अपने परिवार का ध्‍यान रखने हेतु बुजुर्ग मां -बाप अपने युवा बेटा, बेटी, बहू, दामाद के बच्‍चों की देखभाल करने के लिए उनके साथ ही रहते हैं । उनकी हर प्रकार से सहायता करते हैं जिससे वे निश्चिंत होकर अपनी नौकरी, अपने कार्य पर एकाग्र होकर ध्‍यान दे सके । चीनी लोग मेहनती भी बहुत होते हैं । वे भी भारत की तरह अमीर, गरीब, भाषा, बोली के मामले में एक- दूसरे की तुलना करते हैं । एक- दूसरे को हेय दृष्टि से देखते हैं । मन में दुर्भावना भी पालते हैं । मुझे तो अंग्रेजों से अधिक चीनियों को देखने, जानने में अच्‍छा लग रहा था । गोरों को तो बचपन से ही बहुतायत में   देखा, जाना और संवाद होता रहा है । लेकिन चीनियों से कभी बात हुई होगी, याद नहीं है ।

सिडनी (SYDNEY) अत्‍यंत साफ -सुथरा और सुंदर शहर है । शहर घोड़े की नाल के आकार जैसा है । खाली भाग में समुद्र ! भरे हिस्‍से में घने पेड़ों से घिरा हुआ कॉस्‍मॉपालीटिन शहर ।  बहुत हरियाली, घने पेड़ -पौधे होने के बावजूद यहां न मक्‍खी है, ना ही मच्‍छर आदि । न धूल, ना ही धुआं । न कहीं कागज, कचरा, ना ही कहीं गड्ढे, पत्‍थर । सड़कों पर न गाय, ना भैंस । न कुत्‍ते, ना ही बिल्‍ली । न गधे, ना ही घोड़े । न भेड़, ना ही बकरियां । अर्थात कोई जानवर सड़क पर नजर नहीं आता है । जितनी साफ- सुथरी सड़कें हैं, उतने ही चौड़े तथा साफ -सुथरे फुटपाथ हैं । बस, कहीं- कहीं पेड़ों से झड़े सूखे पत्‍ते, फूल या तिनके जैसी बारीक टूटी हुई तीलियां, नाजुक टहनियां भर ! सड़क पार करने हेतु जगह- जगह क्रॉसिंग ! क्रॉसिंग के लिए खंभों पर इलैक्‍ट्रॉनिक  बटन !  ग्रीन सिग्‍नल होते ही सड़क पार करो । न कोई जल्‍दी, न कोई हड़बड़ाहट, झंझट  । यह देख, जानकर आश्‍चर्य भी हुआ, और अच्‍छा भी बहुत लगा । दो सड़कों के नाम भारतीय शहरों के नाम पर हैं । ये दो शहर और दो रोड हैं दिल्‍ली रोड, लखनऊ रोड ! किसी भी दिशा में चले जाएं, चारों ओर हरियाली ही हरियाली ! सड़कों की सफाई मशीनों से । यहां की सड़कें भी भारत या अन्‍य एशियन देशों से कुछ अर्थों में थोड़े भिन्‍न हैं । भारत में जहां शहरों में बढ़ती हुई गाडि़यों को ध्‍यान में रख, यातायात को सुचारू बनाए रखने, जनता की सुविधाओं के मद्देनजर तथा स्‍थान की कमियों के कारण अब हर शहर, कस्‍बे में फ्लाईओवर बनाए गए हैं । जबकि सिडनी में इसके बिल्‍कुल उलट है । यानी हमारी सड़कें, पुल जमीन से ऊपर हैं,   यहां सब कुछ जमीन के भीतर । टनल के बाद टनल ! चाहे गाडि़यों के लिए सड़क हो अथवा ट्रेन के लिए पटरियां !   3 से 5 मिनट के अंतरालों में तेज गाति से दौड़ती डबल  डेकर चमचमाती ट्रेनें  !

एक मार्केट में घूमने, शॉपिंग के इरादे से गए । पूरा मार्केट प्रवासी चीनियों की दुकानों, शॉप से भरा हुआ । मंदारिन शॉपिंग मॉल्‍स काम्‍पलेक्‍स  ! पूर्णत: चीनी, जापानी, कोरियाई वस्‍तुओं, आइटमों से भरा । मार्केट का  नाम बेशक चेट्सवुड है ! हम चीनियों के एक रेस्‍टोरेंट के बाहर पेवेंट पर खड़े हुए । रेस्‍टोंरेंट कांच की डिजाइनदार दीवारों से ढका हुआ था । कांच के बड़े- बड़े जारों में जिंदा मछली, कैंकड़े तैर रहे थे । बताया गया कि आप इन कैंकड़ों को पसंद करें । आपके सामने ही उन्‍हें काट कर, फ्रेश बनाकर खिलाएंगे । कैंकड़ों को देखकर, उन्‍हें ताजा काटकर, पकाकर खिलाने की कल्‍पना मात्र से घिन हो आई । कैंकड़ों की लंबी –लंबी, नुकीली, पतली टांगों को देखकर ताज्‍जुब हुआ कि कैसे लोग इन्‍हें लज़ीज खाने के तौर पर अपनी उंगलियों को चाटते होंगे !

ऑस्‍ट्रेलिया, न्‍यूजीलैंड, न्‍यू पपुआ गिनी में सर्दियों के बाद सितंबर माह में वसंत ऋतु आरंभ होती है । यानी भारत में इस समय पतझड़ शुरू होने जा रहा है, यहां वसंत का आगमन हुआ है । वैसे भी, यहां समय भारत से सर्दियों में 4.30 तथा गर्मियों में 5.30 घंटे आगे रहता है ।  यहां रिहाईशी इलाकों वाले बड़े -बड़े बहुमंजिला मकान हो, फ्लैट हों  अथवा 10 – 15 मंजिल वाली बिल्डिंग्‍स हों, घर के बाहर न तो ऊंची बाऊंडरी वॉल हैं, ना ही ऊंचे मेनगेट हैं । कहीं -कहीं तो सड़क के साथ ही घर हैं । कोई दीवार नहीं, गेट नहीं, फाटक नहीं !  लेकिन सभी घर पक्‍के और  बहुत  बड़े – बड़े !

ऑस्‍ट्रेलिया ( AUSTRALIA) में तीन मामलों में महिला – पुरूष में कोई असमानता नहीं है । किसी भी प्रकार की गाड़ी चाहे कार, बस या ट्रक आदि भारी वाहन हो, स्‍त्री -पुरूष एक समान चलाते हैं । किसी तरह का भेद- भाव नहीं । दूसरा, अपने घर में खाना बनाने में महिला -पुरूष दोनों समान रूप से किचन

संभालते हैं । बल्कि पुरूष इस मामले में अधिक निपुण हैं । तीसरा, अपने बच्‍चों की देख- भाल पति -पत्‍नी समान रूप से करते हैं । बच्‍चा होने के बाद पत्‍नी की मेटरनिटी लीव यदि खत्‍म हो जाए, तो पति लंबी छुट्टी लेकर घर और बच्‍चा दोनों को संभालता है । पत्‍नी अपनी ड्यूटी ज्‍वाइन करती है । इस में यह महिला -पुरूष का काम है, जैसा कोई मुद्दा नहीं है ।

By- Sher Singh

 

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here