Importance of Char Dham Yatra- गढ़वाल के राजा और पांडवों से जुड़ी शिव कथा से क्या है बद्रीनाथ का नाता

importance of chardham
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Importance of Char Dham Yatra–इन दिनों चारधाम यात्रा चल रही है.मान्यताओं के अनुसार चारधाम यात्रा का शुभारंभ यमुनोत्री से होना चाहिए। उसके बाद गंगोत्री और फिर केदारनाथ धाम के दर्शन का पुण्य अर्जित करते हुए अंत में बदरीनाथ की यात्रा का सुफल प्राप्त करना चाहिए। धामों के धाम बदरीनाथ की यात्रा के बिना शेष तीन धामों की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

chardham yatra
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उत्तराखंड की चार धाम यात्रा का महत्व इस रूप में सबसे अलग माना जाता है कि देश के बाकी तीर्थ स्थलों में श्रद्धालु जहां साल भर किसी भी समय दर्शन के लिए जा सकते हैं, वहीं चार धाम के कपाट गर्मी के मौसम में मई से नवंबर तक छह महीने के लिए ही खुलते हैं। बाकी छह महीने यानी सर्दियों में विधिवत अखंड ज्योति प्रज्वलित करने के साथ ही चारों मंदिरों के कपाट आम जन के दर्शनार्थ बंद कर दिये जाते हैं। विग्रह डोलियों में समीप के गांवों में निश्चित स्थान पर विधि-विधान के साथ स्थापित कर दिये जाते हैं और नियत किये गये पुजारियों द्वारा प्रतिदिन उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। ग्रीष्म के आगमन के साथ ही निश्चित तिथियों को विधि-विधान से मंदिर के कपाट आम जन के दर्शनार्थ खोल दिये जाते हैं।

Importance of Char Dham Yatra-

भौतिक रूप से बेशक इसका कारण इन धामों की विकट भौगोलिक परिस्थितियां मानी जाती रही हैं, क्योंकि शीतकाल में यहां भीषण बर्फबारी के कारण यात्रा मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। लेकिन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शीतऋतु में यहां देवगण पूजा-अर्चना करते हैं, इसलिए मनुष्यों का प्रवेश वर्जित होता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सतयुग में इस उच्च हिमालयी प्रदेश में भगवान विष्णु ने बदरी वन में घोर तपस्या कर अपने को नारायण स्वरूप में स्थापित कर कलियुग के सबसे बड़े तीर्थ का मान प्राप्त किया। माता लक्ष्मी ने स्वयं बदरी यानी बेर के वृक्ष के रूप में भगवान विष्णु की शीत, वर्षा और ताप से रक्षा की, अतः तपस्या के बाद लक्ष्मी जी के सेवाभाव और निष्ठा से प्रसन्न होकर विष्णु भगवान ने उन्हें बदरी नाम दिया और स्वयं उनके नाथ के रूप में बदरीनाथ कहलाये।

आदि शंकराचार्य ने किया जीर्णोद्धार

आठवीं शताब्दी में जगद‍्गुरु आदि शंकराचार्य ने हिंदू धर्म के पुनर्जागरण का जो बीड़ा उठाया, उसमें पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक शैव, वैष्णव और शाक्त मतों के बीच सामंजस्य बिठाते हुए संपूर्ण भारत की यात्रा की। उत्तराखंड क्योंकि पौराणिक काल से ही देवभूमि और ऋषि मुनियों की तपस्थली रहा है, इसलिए आदि शंकराचार्य ने उत्तराखंड का भ्रमण करते हुए गढ़वाल के तत्कालीन राजा कनकपाल के सहयोग से मठ मंदिरों की स्थापना और जीर्णोद्धार का स्तुत्य कार्य किया। इस क्रम में उन्होंने बदरी वन स्थित विष्णु भगवान की तपस्थली बदरीनाथ के निकट स्थित नारद कुंड से उनकी ध्यानस्थ मूर्ति बाहर निकाल मंदिर में पुनःस्थापित की। यहां मुख्य पुजारी के रूप में दक्षिण भारत के ब्रह्मचारी नंबूदरीपाद ब्राह्मण, जिन्हें रावल पदनाम मिला, की परंपरा का निर्वाह आज तक होता आ रहा है।

श्रद्धा, विश्वास और आस्था के प्रतीक उत्तराखंड के चार धामों का अस्तित्व पौराणिक काल से माना गया है, लेकिन तब गंगा-यमुना के उद्गम स्थल गंगोत्री-यमुनोत्री के साथ-साथ बदरी-केदार में पूजा-अर्चना का क्या और कैसा विधान रहा होगा, कहा नहीं जा सकता। लेकिन पुरानी परंपराओं को अक्षुण्ण रखते हुए समय के साथ-साथ राजा, महाराजाओं और शासन-प्रशासन द्वारा आस्था के इन केंद्रों का जीर्णोद्धार होता रहा और उन्हें भव्यता प्रदान की जाती रही। इन चार धामों का महात्म्य इस कारण भी बहुत ज्यादा माना गया है क्योंकि श्रद्धालु इनके इर्द-गिर्द पूजी जाने वाली जलधाराओं, वृक्षों और शिलाखंडों के रूप में सतयुग, त्रेता और द्वापर युग के ऋषि मुनियों, महामनीषियों के दर्शन का पुण्य अर्जित करते हैं।

Importance of Char Dham Yatra–राजमहज से भेजा जाता है कलश

धामों के धाम बदरीनाथ की बात करें तो गढ़वाल के राजा द्वारा विधिवत कपाट खोलने और बंद करने की जो परंपरा मध्यकाल से शुरू की गई थी, वह ब्रिटिश शासन काल से आजाद भारत तक उसी तरह निभाई जा रही है। सरकार के संरक्षण के बावजूद प्रतीकात्मक रूप से टिहरी राज परिवार के मुखिया वसंत पंचमी के दिन पंचांग की गणना के आधार कपाट खोलने का शुभ मुहूर्त निकलवाते हैं। ये सारे विधि-विधान उनके नरेंद्रनगर स्थित राजमहल में संपन्न होते हैं। कपाट खुलने की तिथि घोषित होते ही महारानी महल की कुंवारी कन्याओं के साथ मिलकर तिल का तेल निकाल घड़े में रखती हैं। इस प्रक्रिया को ‘गाड़ू घड़ी’ कहा जाता है। तेल का घड़ा बदरीनाथ के स्थानीय डिमरी पुरोहितों को राजमहल बुलाकर सौंप दिया जाता है। नियत समय पर कलश यात्रा ढोल, दमाऊ के साथ विभिन्न पड़ावों से होते हुए मुख्य पुजारी रावल और विष्णु जी के विग्रह की प्रतीक उद्धव जी की डोली के साथ तय तिथि को पांडुकेशर से बदरीनाथ पहुंचती है। वहां विधि-विधान से मंत्रोच्चार के बीच कपाट खोले जाते हैं और तिल के तेल से बदरीनाथ जी का अभिषेक किया जाता है। कपाट खुलने के समय बदरीनाथ जी की मूर्ति के ऊपर घी में सना जो ऊनी वस्त्र सुशोभित होता है, उसे वहां उपस्थित श्रद्धालुओं में प्रसाद रूप में वितरित कर दिया जाता है। नवंबर में कपाट बंद होते समय बदरीनाथ जी को ओढ़ाया जाने वाला भेड़ की ऊन से निर्मित यह वस्त्र देश की सीमा के अंतिम गांव माणा की किसी कुंवारी कन्या द्वारा एक ही दिन में काता और बुना जाता है।

भविष्य बदरी में होगी पूजा!

बदरीनाथ धाम के अलावा इसी क्षेत्र में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बदरीनाथ के चार और मंदिर स्थापित हैं, जो भगवान बदरीनाथ के अलग-अलग स्वरूपों के प्रतीक हैं। इनमें से एक हैं ध्यान बदरी, दूसरे योग बदरी, तीसरे वृद्ध बदरी और चौथे भविष्य बदरी। ऐसी मान्यता है कि कलियुग में भगवान विष्णु के ही अंशावतार नर और नारायण पर्वत, जिनकी उपत्यका में भगवान बदरीनाथ का मंदिर स्थापित है, जब आपस में मिल जाएंगे तो वर्तमान बदरीनाथ धाम मनुष्य की पहुंच से दूर हो जाएगा। तब भविष्य बदरी में ही बदरीनाथ स्वरूप भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना होगी।

Importance of Char Dham Yatra–पांडवों से जुड़ी शिव कथा

भगवान के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ के दर्शन बिना बदरीनाथ के दर्शन का सुफल नहीं मिलता है। प्रकृति की विराट सत्ता के बीच केदारनाथ के रूप में स्थापित भगवान शंकर के यहां वास करने संबंधी अनेक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें सबसे प्रचलित पांडवों से जुड़ी है। शिव पांडवों को दर्शन न देने की मंशा से भैंसे का रूप धारण कर यहां चले आये, लेकिन पहचाने गये। वह धरती में समा जाना चाहते थे, लेकिन भैंसे का पृष्ठ भाग भीम द्वारा पकड़ लिया गया। अंततः शिव ने पांडवों को दर्शन देकर कृतार्थ किया और भैंसे के पृष्ठ भाग को पत्थर के रूप में पूजनीय बना दिया। माना जाता है कि बाद में पांडवों के वंशज जनमेजय ने इस मंदिर की स्थापना की। लेकिन यह इतिहासम्मत तथ्य है कि आठवीं सदी में उत्तराखंड भ्रमण के दौरान शंकराचार्य ने बदरीनाथ के साथ केदार धाम का भी जीर्णोद्धार किया और अंततः यही समाधिस्थ हुए।

दीपावली पर लक्ष्मी पूजा के दूसरे दिन बंद कर दिये जाते हैं गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट

सदियों से चार धाम यात्रा का शुभारंभ और समापन हर साल विधि-विधान से वैदिक मंत्रोच्चार के साथ होता चला आ रहा है। गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट हर साल अक्षय तृतीया के दिन खोले जाते हैं और दीपावली पर लक्ष्मी पूजा के दूसरे दिन बंद कर दिये जाते हैं, जबकि केदारनाथ और बदरीनाथ के कपाट पंचांग के आधार पर शुभ मुहूर्त देखकर खोले और बंद किये जाते हैं।