बेनजीर भुट्टो की हत्या के लिए मुशर्रफ ने ऐसे बुना था जाल…!

18 अक्टूबर 2007 को जब बेनजीर ने निर्वासन के बाद पाकिस्तान की सरजमीं पर कदम रखा तो लगभग तीस लाख लोगों की भीड़ उनके स्वागत में उमड़ पड़ी थी।इस बात से पाकिस्तान का सैन्य शासन बेहद डरा हुआ था। उनके हत्याकांड की परतें खुलने से एक बार फिर पड़ोसी मुल्क के सैन्य तानाशाहों का वह खौफनाक खेल सामने आया,जिसमें वे अपनी बादशाहत बरकरार रखने के लिए सर्वोच्च स्तर के लोकतान्त्रिक नेताओं का कत्लेआम करने से भी नहीं चूकते।

पाकिस्तान सेना ने इस मुल्क के अस्तित्व में आने के बाद आधे से ज्यादा समय से तानाशाही के जरिये सीधा राज किया है और वह किसी भी कीमत पर देश की सत्ता को अपने शिकंजे में रखती है। यही नहीं सेना को देश की जम्हूरियत में बिलकुल भी दिलचस्पी नही है और वे उसे नापसंद ही करते है। विदेश में निर्वासित जीवन बिताकर लौटने वाली बेनजीर पाकिस्तान में अपनी जान को लेकर आशंकित थी। उन्होंने इसका जिक्र बकायदा अपनी आत्मकथा में भी किया है-“मई 2007 में पाकिस्तान में एक अनिश्चित भविष्य की तरफ लौटते वक्त न सिर्फ अपने और अपने देश के बल्कि सारी दुनिया के लिए मौजूद खतरों से अच्छी तरह वाकिफ हूं। हो सकता है कि पहुंचते ही मैं गिरफ्तार कर ली जाऊं, हो सकता है कि मैं जब मैं हवाई अड्डे पर उतरूं तो उसी तरह गोलियों का शिकार हो जाऊं,जिस तरह अगस्त 1983 में मनीला में बेनिग्नो एक्विनो की हत्या की गई थी। पहले भी कई बार अल क़ायदा मुझे मारने की कोशिश कर चुका है। बेनजीर इस बात को भी साफ करती है कि पाक की सरजमी पर सैन्य ताकतें लोकतंत्र को स्थापित होते देखना ही नहीं चाहती।
बकौल बेनजीर “मैं अपने निर्वासन से लोकतान्त्रिक चुनाओं को लड़ने के लिए लौट रही हूं और वे लोकतान्त्रिक चुनाओं को बहुत नापसंद करते है। लेकिन मैं तो वही करूंगी जो मुझे करना है और मैं पाकिस्तान की जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं में साथ देने का अपना वादा पूरा करने का पक्का इरादा रखती हूँ। मैं पाकिस्तान के सभी बच्चों की खातिर यह जोखिम उठा रही हूं।”

1990 में भारत के खिलाफ आतंक की योजना को अंजाम देने के लिए पाकिस्तान ने वॉर ऑफ़ थाउजेंडस कट्स की नीति बनाई थी, सैन्य शासकों ने भारत में विध्वंस के ख्वाब देखते देखते अपने मुल्क के लोकतंत्र में ही इतने कट्स डाल दिए की वह शायद की कभी इससे उबर सके।

यह थी योजना

RAWALPINDI, PAKISTAN – DECEMBER 27: Former Prime Minister Benazir Bhutto arrives for a campaign rally waving to supporters through the sun roof of her armored car December 27, 2007 in Rawalpindi, Pakistan. She was assassinated as she left the rally, while again waving to the crowd through the sun roof. (Photo by John Moore/Getty Images)

परवेज़ मुशर्रफ़ ने वर्ष 1999 में बतौर सेना प्रमुख तब के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को पद से हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले ली थी। उन्होंने वर्ष 2008 में बतौर राष्ट्रपति त्यागपत्र दे दिया था। परवेज़ मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान में लोकतंत्र को समाप्त करने के लिए अपनी शैतानी योजना को इस प्रकार अंजाम दिया कि मुशर्रफ़ के आदेश पर जैसे ही बेनज़ीर भुट्टो रावलपिंडी में 27 दिसंबर 2007 को एक रैली को संबोधित करने के बाद निकलीं उनकी सुरक्षा के लिए किए गए इंतज़ाम को हटा लिया गया। बेनजीर ने मुशर्रफ से गुजारिश की थी वह उनकी सुरक्षा का भरोसा दिलाएं तथा एक विदेशी सुरक्षा दल को पाकिस्तान लाने की इजाजत दें। बेनजीर की यह भी मांग थी की विदेश से बम का हमला झेलने वाली गाड़ियाँ लाने की इजाजत मिले जिसमें बुलेट प्रूफ शीशे लगे हो। मुशर्रफ़ ने बेनजीर के अनुरोध को खारिज कर दिया था।

सैन्य तानाशाह ने बेनजीर की हत्या को बेहद योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया।
पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो पर आतंकी हमले के ख़तरे की चेतावनी के बावजूद उनके सभा स्थल लियाकत बाग के बाहर कोई ख़ास सुरक्षा व्यवस्था नहीं दिख रही थी और इसके अलावा रैली वाली जगह के पास स्थित इमारतों की छतों पर पुलिसकर्मियों को तैनात नहीं किया गया था और न ही एलीट फोर्स के अफ़सर यहां तैनात किए गए थे। उस रैली से निकलने के थोड़ी देर बाद ही बेनज़ीर भुट्टो की हत्या कर दी गई थी। मुशर्रफ पर ये आरोप भी है कि उन्होंने हत्या के बाद घटनास्थल को पानी से साफ़ का आदेश दिया था। इस आदेश के कारण घटनास्थल से साक्ष्य एकत्रित करना मुश्किल हो गया था।

पाकिस्तान सरकार के अनुरोध पर बेनज़ीर भुट्टो की हत्या की एक जांच संयुक्त राष्ट्र ने भी की थी। संयुक्त राष्ट्र ने जाँच की रिपोर्ट में कहा था कि यदि पर्याप्त सुरक्षा इंतज़ाम किए गए होते तो हत्या को रोका जा सकता था। रिपोर्ट में परवेज़ मुशर्रफ़ की तत्कालीन सैन्य सरकार की कड़ी आलोचना की गई थी और कई कड़ी टिप्पणियां की थीं। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि अधिकारियों ने क़त्ल की ठीक तरीके से जाँच नहीं की है।
विडम्बना ही है की पाकिस्तान में कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। जब भी किसी प्रधानमंत्री ने अपने लोक लुभावन कामों से जनता का दिल जीतने की कोशिश की,सेना को कभी रास नहीं आया और लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों को पद से हाथ धोना पड़ा। स्वयं बेनजीर भुट्टों ने इस बात को स्वीकार कर कहा था की प्रधानमंत्री रहते फ़ौज में सेवारत एक मेजर ने उन्हें बताया था कि उनकी सरकार का तख्ता पलटने के लिए गुप्तचर सेना ने पूरी तरह अस्थिरीकरण का एक कार्यक्रम बनाया है। एक माह बाद एक अन्य फ़ौजी ने उन्हें जानकारी दी कि फ़ौज सुप्रीम कोर्ट से एक सौदा करने जा रही है। एक संवैधानिक संकट खड़ा करने पर राष्ट्रपति उनकी सरकार को बर्खास्त कर देंगे और बदले में मुख्य न्यायाधीश को अंतरिम प्रधानमंत्री पद का वादा किया गया।
सेना,सत्ता,सियासत और न्यायपालिका की तमाम साजिशों के बाद भी बेनजीर ने पाकिस्तान में लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिश जिस शिद्दत के साथ की थी, उसकी कोई मिसाल नहीं हो सकती। वे मार्टिन लूथर किंग के इन शब्दों को सामने रखती थी कि जिस दिन हम अहम मसलों पर चुप रह जाते हैं उसी दिन हमारी ज़िन्दगी खत्म होना शुरू हो जाती है। लेकिन उनके जाने के बाद पाकिस्तान के सियासतदान ख़ामोशी से सेना की सियासत को झेल रहे हैं,और यह इस देश की नियति भी मान ली गई है।


डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

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