हिमाचल में भाजपा ने खेला जातीय और क्षेत्रीय समीकरण का दांव

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भाजपा ने नए टिकटों पर जातीय और क्षेत्रीय समीकरण बनाकर दांव खेला है। लंबे मंथन के बाद ही जयराम सरकार के मंत्री किशन कपूर और विधायक सुरेश कश्यप को लोकसभा चुनाव में उतारने का फैसला लिया है।

नए समीकरण में कांग्रेस के संभावित प्रत्याशियों का भी हिसाब-किताब लगाया गया है। किशन कपूर जयराम मंत्रिमंडल में वरिष्ठ मंत्री हैं। वह शांता कुमार के करीबी हैं। उन्हें विधानसभा चुनाव में भी शांता कुमार का भरपूर समर्थन रहा।

बेशक मौजूदा सांसद शांता मैदान से हट गए हों, मगर कपूर को प्रत्याशी बनाने में भी उनकी भूमिका मानी जा रही है। शांता और कपूर के संबंधों को भुनाकर भाजपा ब्राह्मणों और गद्दी समुदाय के वोट साधना चाहती है।

कांगड़ा सीट पर ब्राह्मण, ओबीसी और गद्दी समुदाय का हर चुनाव में दखल रहा है। इस सीट का दायरा कांगड़ा और चंबा जिले में है। कपूर गद्दी समुदाय से हैं तो वह खुद को चंबा जिले से भी जोड़ते हैं।

वह इस क्षेत्रीय संबंध की दुहाई दे सकते हैं। इधर, शिमला सीट से भाजपा के उम्मीदवार सुरेश कश्यप अनुसूचित जाति के भीतर सर्वाधिक संख्या वाले समुदाय से हैं। भाजपा और कांग्रेस पहले भी इसी समुदाय के प्रत्याशी देती रही हैं। दूसरा भाजपा ने अबकी सिरमौर जिले पर दांव खेला है।

मौजूदा सांसद सोलन जिले से हैं। कभी कांग्रेस का गढ़ रहे सिरमौर जिले से अब विधानसभा के अंदर भी भाजपा का वर्चस्व है जबकि शिमला और सोलन जिले से विधानसभा में कांग्रेस के ही ज्यादा विधायक हैं। सुरेश कश्यप जयराम ठाकुर के भी पसंदीदा हैं।

हमीरपुर से भाजपा ने अनुराग ठाकुर पर फिर भरोसा जताया है। पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र अनुराग 2008 में पहली बार हमीरपुर सीट से उपचुनाव लड़ने के बाद लगातार तीसरी बार सांसद हैं। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के गृह क्षेत्र मंडी से रामस्वरूप शर्मा 2014 में मोदी लहर में सांसद बने।

मोदी से उनके व्यक्तिगत संबंध हैं। उनके स्थान पर मंडी की सियासत के पंडित सुखराम पोते आश्रय शर्मा के लिए टिकट मांग समीकरण बिगाड़ने के संकेत दे चुके हैं। जयराम सरकार में सुखराम के बेटे अनिल शर्मा कैबिनेट मंत्री हैं तो ऐसे में भाजपा ने उनकी इस मांग को अनदेखा करने का जोखिम ले लिया है।