एवरेस्ट : एडवेंचर टूरिज़्म या शौकिया पर्वतारोहण का जानलेवा जुनून

View of Mount Everest and Nuptse with buddhist prayer flags fro
View of Mount Everest and Nuptse with buddhist prayer flags from kala patthar in Sagarmatha National Park in the Nepal Himalaya

पर्वतारोहण का जानलेवा जुनून बनता जा रहा है एवरेस्ट फतह करना। एवरेस्ट न तो पर्यटन और न ही सैर सपाटे का ठिकाना है। इस चोटी पर चढ़ने के सपनों को हकीकत का जामा पहनाना है तो गज़ब का साहस सीने में लेकर चलना पड़ता है। अव्वल दर्जे की ट्रेनिंग, साजोसामान, फौलाद से इरादे और अच्छा स्वास्थ्य सबसे ज़रूरी है। कभी हिमालय की इस दुर्गम चोटी पर चढ़ना सही मायनों में सपना ही था लेकिन अब तकनीक की मदद से 8850 मीटर ऊंचाई पर झंडा फहराने की चाहत में एडवेंचर टूरिज़्म के शौकीन बड़ी तादाद में नेपाल पहुंचते हैं। जिनमें ज्यादातर नौसिखिये होते हैं। कुछ तो ऐसे जिन्होंने कभी कोई पहाड़ी तक न चढ़ी हो । इन ट्रैकर्स की बदौलत ही यहां जानलेवा जाम लग जाता है, सैकड़ों टन कचरा बिखर जाता है। हिमालयी इकोसिस्टम का गंभीर उल्लंघन है ये शौकिया पर्वतारोहण जो कई गंभीर खतरों की ओर इशारा करता है।

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पर्वतारोहण का जानलेवा जुनून

पर्वतारोहण का जानलेवा जुनून: जिस एवरेस्ट को सर एडमंड हिलेरी और शेरपा तेनजिंग ने 1953 में फतह कर लिया था, उस पर आरोहण के संकल्प को दुनिया छोड़ने को तैयार नहीं है। पर्यावरणविद लगातार चेता रहे हैं कि एवरेस्ट पर बढ़ रहे दबाव, पर्यावरण के साथ हो रही छेड़छाड़ के नतीजे हैं कि ग्लेशियर टूट रहे हैं और जलजलों की ज़मीन तैयार हो रही है। हाल ही में एवरेस्ट की चढ़ाई के दौरान पिछले दिनों शौकिया पर्वतारोहियों की मौत ने एडवेंचर टूरिज्म के स्याह पहलुओं की ओर ध्यान खींचा है। बड़े पैमाने पर पर्यटक, शौकिया पर्वतारोही, ट्रैकिंग के शौकीन ऊंचे बर्फीले पहाड़ों का रुख कर रहे हैं। ट्रैवल और ट्रैकिंग कंपनियां लुभावने पैकेजों के साथ उन्हें बुलाती हैं लेकिन सुरक्षा, स्वास्थ्य और अन्य तकनीकी और कानूनी मुद्दों पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता।

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सरकार के दावे अपनी जगह हैं लेकिन यह भी सही है कि ट्रेकिंग के नियंत्रण और निर्धारण को लेकर देश में कोई विशिष्ट कानून नहीं हैं। टूरिज्म इंडस्ट्री का एक तंत्र तमाम व्यवस्थाओं की खिल्ली सा उड़ाता हिमालयी क्षेत्र को रौंद रहा है।

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पर्वतारोहण का जानलेवा जुनून: कतार दर कतार

कुछ जानकारों का मानना है कि अगर पर्वतारोही कतार दर कतार चढ़ाई कर रहे हैं तो ये आदर्श स्थिति तो नहीं कही जा सकती। इसके लिए सरकार को टूर ऑपरेटरों और ऑनलाइन सेवाओं के साथ तालमेल बनाकर एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे जान का जोखिम कम हो, उतने ही परमिट एकबारगी दिए जाएं जिनसे भीड़ न बने। पर्वतारोहियों को गाइड करने वाले शेरपाओं को भी अधिक चुस्त और मुस्तैद रहने की जरूरत है।

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एवरेस्ट की चढ़ाई के दौरान हुई मौतें यही बताती हैं. पिछले दिनों इंटरनेट पर कुछ पर्वतारोहियों की भेजी तस्वीरें खूब वायरल हुई थीं जिनमें चोटी की ओर बढ़ते लोगों की एक बहुत लंबी और ठसाठस कतार देखी जा सकती है. जिस तरह से कुछ लोग इंतजार करते दिखते हैं उससे लगता है कि बहुत धीरे धीरे ये कतार आगे की ओर खिसक रही थी.

जान ले रहा एडवेंचर टूरिज़्म

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एवरेस्ट ही नहीं उत्तराखंड से लेकर कश्मीर तक उच्च हिमालयी और दुर्गम बर्फीले क्षेत्रों की ट्रेकिंग किसी भी एडवेंचर टूरिस्ट का लक्ष्य होता है। लेकिन सपनों और इरादों के साथ आले दर्जे का प्रशिक्षण, साजोसामान, हिम्मत और स्वास्थ्य भी चाहिए। इनके अलावा हिमालय के प्रति एक बुनियादी नैतिकता का ख्याल रखना भी जरूरी है क्योंकि वो सिर्फ रोमांच और पर्यटन का ठिकाना नहीं है, उसकी अपनी एक गरिमा और जैव-विविधता है और अपना एक इकोसिस्टम है जिसका उल्लंघन इंसानी लालसा पर ही भारी पड़ सकता है।

“ट्रैफिक जाम” कहे गये दमघोंटू और विचलित कर देने वाले हालात में पर्वतारोहियों की जानें चली गईं. हालांकि कुछ तर्जुबेकार शेरपाओं और पर्वतारोहण के विशेषज्ञों के मुताबिक एवरेस्ट पर मौतों की वजह ट्रैफिक जाम नहीं बल्कि उचित व्यवस्थाओं और जानकारी का अभाव है.

ऑक्सीजन की कमी से होती है मौतें

एक शेरपा का कहना है कि एवरेस्ट की चढ़ाई करने वाले शौकिया पर्वतारोही अक्सर ये अंदाजा लगाने में चूक जाते हैं कि नीचे लौटते हुए दरअसल उनके पास पर्याप्त ऊर्जा और ऑक्सीजन भी रहनी चाहिए. और इसी घातक गड़बड़ी की चपेट में वे आ जाते हैं.
शेरपा का कहना है कि एवरेस्ट पर भीड़ स्वाभाविक है क्योंकि साल में वे बहुत गिनती के दिन होते हैं जब आसमान साफ रहता है और मौसम पर्वतारोहण के अनुकूल रहता है. ऐसे में हर पर्वतारोही इस साफ विंडो का लाभ उठाना चाहता है. यही देखते हुए नेपाल सरकार परमिट भी जारी करती है. हालांकि माना जा रहा है कि हाल की घटनाओं की वजह से नियमनिर्देशों में कुछ परिवर्तन किए जा सकते हैं.

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एवरेस्ट पर ट्रैफिक, प्रदूषण और टूर ऑपरेटरों के एक बड़े नेटवर्क की सक्रियता के बीच उच्च हिमालय के अन्य क्षेत्रों में भी मुश्किलें कम नहीं हैं. जैसे उत्तराखंड को ही लें जिसकी दुर्गम चोटियों की चढ़ाई और बर्फीले इलाकों की ट्रेकिंग एक दुर्लभ रोमांच बना हुआ है. इसी रोमांच को हासिल करने के लिए देश दुनिया के ट्रेकर बड़े पैमाने पर उत्तराखंड का रुख करते हैं. लेकिन साहसिक पर्यटन के उद्योग में भी कई खामियों और मुनाफे की बढ़ती लालसा के प्रवेश ने एक नया ‘डेंजर जोन’ इन शांत वादियों में निर्मित कर दिया है. लेकिन शौकिया ट्रेकर इस अदृश्य जोन को रोमांच समझकर लांघ जाते हैं और कभी सफल तो कभी निराश होकर लौटते हैं तो कुछ बदनसीब लौट भी नहीं पाते.

ट्रेक के मार्ग, विशेषज्ञों से मान्य होने चाहिए और किन क्षेत्रों में ट्रेकिंग वर्जित है, ये घोषित होना चाहिए. ट्रेकिंग और क्लाइम्बिंग से जुड़ी उत्तराखंड में करीब 500 एजेंसियां हैं और राज्य में करीब 200 चोटियां हैं जिनके लिए एडवेंचर टूरिस्ट खिंचे चले आते हैं.