दशहरा स्पेशल : परम ज्ञानी, पराक्रमी रावण का प्रेम

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डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

दशहरा स्पेशल: प्रेम निश्चल, निस्वार्थ और अगाध होता है। रावण का प्रेम इन सीमाओं को लांघ जाता है। उसके प्रेम की युक्ति में अलौकिकता है, भक्ति में निष्ठा और समर्पण है और शक्ति से अपराजेय का स्वाभाविक प्रेम।

रावण का समूचा जीवन प्रेम की रहस्यात्मक अनुभूतियों और लालसाओं के साथ चलता रहा। मानव से अतिमानव तक पहुंचने की ऊंचाई उसने देव प्रेम से हासिल की।रावण को संघर्षों से भी खूब प्रेम था, उसके जीवन मरण की संभावनाओं और आशंकाओं में वह प्रतिबिंबित भी होता है।

दशहरा स्पेशल- पराक्रमी था रावण

विद्वान रावण को ज्ञान अर्जन की इतनी उत्कंठा थी कि वे निर्जन द्वीप ने बैठकर सहस्त्रों वर्षों तक शिव जाप किया करते थे। श्रेष्ठता की अपूर्व जिजीविषा लिए पूरी लंका को ही स्वर्णजनित  कर दिया। भुजाओं में पराक्रम इतना कि कैलाश पर्वत को उठा लिया। पांडित्व ऐसा कि ज्योतिष में श्रेष्ठ रावण संहिता की रचना कर दी। नदियों के प्रति सम्मान इतना कि जब नर्मदा का वेग रोकने की सहस्त्रबाहु अर्जुन ने चेष्टा की तो रावण ने अपने एक बाण के प्रहार से बांध को तोड़कर महाराज के अभिमान को चूर- चूर कर दिया।

दशहरा स्पेशल-महादानी और रूपवान रावण

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शौर्य इतना प्रबल कि समूचे ब्रह्मांड को जीत लिया। दानी इतना कि देवलोक को जीत कर वापस उसे देवताओं को लौटा दिया। तेज और रूपवान इतना कि जग की सुंदरी मन्दोदरी से विवाह हुआ। प्रजा सम्मान के प्रति आग्रह इतना कि असुरों को भी स्वर्ण जनित महल उपहार में दे दिया। तप मर्यादा इतनी कि ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर रावण की नाभि में ही अमृत कुंड बना डाला। संगीत का ज्ञान इतना कि महादेव भी उससे प्रभावित हुए बिना न रह सके। महादेव का क्रोध का नृत्य तांडव रावण के वीणा वादन से ही प्रसन्नता में बदल गया और शिव ने इससे प्रभावित होकर उसे दुनिया की श्रेष्ठ तलवार चन्द्रहास उपहार में दे दी, जिससे कोई विजित नहीं हो सकता।

विद्वत्ता का सम्मान इतना की तीनों लोकों के श्रेष्ठ  विद्वानों राज दरबार की शोभा बढ़ाते थे।रावण के दरबारी मय को विमान रचना का भी ज्ञान था, रावण का पुष्पक विमान सहस्त्रों वर्षों पूर्व भारत के वैमानिकी विज्ञान के ज्ञान का प्रतीक है। आदि कवि वाल्मीकि भी रावण के गुण,तेज और शौर्य की उच्चता को स्वीकार करते है। https://www.indiamoods.com/those-characters-of-ramayana-know-where-ram-sita-is-what-ravana-is-doing/

रूप, सौन्दर्य, धैर्य, कान्ति का स्वामी रावण

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वे रामायण में हनुमान के लंका प्रवेश के बाद  रावण के दरबार में प्रवेश का वृतांत को इन शब्दों में वर्णित करते है “रावण को देखते ही हनुमान मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि रूप, सौन्दर्य, धैर्य, कान्ति तथा सर्वलक्षणयुक्त होने पर भी यदि इस रावण में अधर्म बलवान न होता तो यह देवलोक का भी स्वामी बन जाता।“रावण ने तीनों लोकों को अपनी गति से चलाने वाले नौ ग्रहों को अपने अधीन कर लिया था,यह उसके  वीरता प्रेम और शूरता का परिचायक था।

दशहरा स्पेशल – रावण महान ज्ञानी था

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रावण ने अपने जीवन काल में खूब कीर्ति अर्जित की लेकिन धीरे- धीरे वह सफलताओं के मद में डूबता हुआ अपने मार्ग से विचलित हो गया। रावण महान ज्ञानी था लेकिन उस पर काम और भोग की अत्यधिक लालसा और तृष्णा थी। भोग से प्रेम ही उसे रसातल की ओर ले गया। श्रीमदभागवत गीता में काम को सर्व अनर्थों के मूल में बताया गया है जो अधोगति की और ले जाता है।

रामायण में रावण के वध होने पर मंदोदरी  विलाप करते हुये कहती है,”अनेक यज्ञों का विलोप करने वाले, धर्म व्यवस्थाओं को तोड़ने वाले, देव-असुर और मनुष्यों की कन्याओं का जहाँ-तहाँ से हरण करने वाले! आज तू अपने इन पाप कर्मों के कारण ही वध को प्राप्त हुआ है।“

बहन का अपमान बर्दाश्त न कर सका

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अपनी बहन शूर्पणखां के अपमान पर क्रोधित होकर रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया जो उसके अंत का कारण बना। इस समूचे घटनाक्रम में क्रोधित रावण राज नीति और अनीति का भेद नहीं कर सका और धर्म के मार्ग से विचलित होकर पथ भ्रष्ट हो गया।

लोभ का प्रेमी था रावण

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रावण लोभ के प्रेम में डूबा था। उसकी आसक्ति इतनी कि कैलाश पर्वत को उठाकर लंका ले जाना चाहा,जिससे माँ सती नाराज हो गई और उसे राक्षस होने का श्राप दे दिया।इसके बाद महाज्ञानी रावण जग में राक्षस के नाम से ही पहचाना गया। माता सती के अभिशाप से रावण युगों युगों से मुक्त होने को कराह रहा है,लेकिन काल के कपाल पर वह राक्षस राज के नाम से ही अंकित है।रावण अहंकार में यह भूल गया कि काम,क्रोध तथा लोभ “नरक के द्वार” माने जाते है जो मृत्यु की ओर ले जाते है। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

मायावी शक्ति से प्रेम भी था और अभिमान भी

Ravana-Meditation
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रावण को अपनी मायावी शक्ति से प्रेम भी था और अभिमान भी। उसने इसी अभिमान में राजा बाली को युद्द के लिए ललकारा था।बाली के सामने उसकी अपमानजनक पराजय से फिर वह कभी मुक्त नहीं हो पाया।  

रावण के अंत के पर्व विजयादशमी के असंख्य सन्देश है,यह दस इन्द्रियों पर विजय का पर्व है तो असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है। यह बहिर्मुखता पर अंतर्मुखता की विजय का पर्व है तो अन्याय पर न्याय की विजय का पर्व है। यह दुराचार पर सदाचार की विजय का पर्व है तो तमोगुण पर दैवीगुण की विजय का पर्व है। यह  भोग पर योग की विजय का पर्व है तो जीवत्व पर शिवत्व की विजय का पर्व है। लेकिन रावण की मृत्यु यदि एक स्थिति थी तो दुःख उसका वर्तमान है।

इसलिये जलता है रावण

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रावण दुखी है कि उसने अपने जीवन  काल में यदि अपने जप, तप और कर्म में प्रेम की पवित्रता का पालन किया होता तो उसमें सम्पूर्णता होती,वह संत,योद्धा, योगिराज और देवराज कहलाता। रावण मुक्ति के लिए कराह रहा है। उसे बार बार जलाकर यह एहसास कराया जाता है कि उसने प्रेम की पवित्रता और उसके उच्च आदर्शों का पालन क्यों नहीं किया।

मानवीय प्रेम की उच्चता उसे ईश्वर बना देती लेकिन दानवी प्रवृत्ति से वह राक्षस राज बन गया। रावण का शरीर मृत्यु को प्राप्त हो गया है और यही नियति उसे पापों से मुक्त होने का अवसर नहीं देती।