भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के मृत शरीर का क्या हुआ..

डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

5 मार्च 1931 को ग़ांधी इरविन समझौते पर हस्ताक्षर हुए ( Gandhi Irwin pact signed) और 23 मार्च 1931 को भगत सिंह ( Bhagat Singh), सुखदेव ( Sukhdev) और राजगुरु (Rajguru) को फांसी दे दी गयी। फांसी का समय एक दिन बाद 24  मार्च 1931 निर्धारित हुआ था,पर ब्रितानी सरकार (british government) ने देश में अशांति और  विद्रोह भड़कने की आशंका से एक दिन पहले ही अर्थात्  23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर,मौत की सजा के नियमों को दरकिनार कर सुबह के स्थान पर शाम को फांसी दे दी।

फांसी देने की तारीख नजदीक आने तक देश भर के नौजवानों की भीड़ बड़ी संख्या में जेल के बाहर जुट चुकी थी।जिससे अंग्रेज बूरी तरह से डरे हुए थे।पहले अंग्रेज अधिकारियों की योजना यह थी इन सबका अंतिम संस्कार जेल के अंदर ही किया जाएगा,लेकिन फिर ये विचार त्यागना पड़ा जब अधिकारियों को आभास हुआ कि जेल से धुआँ उठते देख बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है । इसलिए जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई,उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अंदर लाया गया और सामान के नीचे शवों को छुपा दिया गया । इन शहीदों के शरीर के टुकड़े कर उन्हें बोरों में भरा गया,जिससे किसी को पता न चले । इसके बाद अंग्रेजों ने रात दस बजे चुपचाप फिरोजपुर के पास सतलुज किनारे मिट्टी का तेल छिड़ककर इन शवों में आग लगा (fired by sprinkling kerosene oil ) दी।

लोगों का गुस्सा न भड़के इस डर से अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाकों में नोटिस चिपकाए गए जिसमें बताया गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी देकर उनका सतलज के किनारे हिंदू और सिख रीति से अंतिम संस्कार कर दिया गया है।

 

हालांकि जैसे जैसे इस घटना की सच्चाई सामने आने लगी, देशभर में इसकी गहरी प्रतिक्रिया हुई । हड़तालों और नवयुवकों के विरोध प्रदर्शन का सिलसिला लंबे समय तक समूचे देश में चला । कानून व्यवस्था की स्थिति नियंत्रित करने के लिए सरकार को देश के कई इलाकों में सेना का भी सहारा लेना पड़ा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here