देवभूमि हिमाचल में दैवीय मान्यता से जुड़ी इस हकीकत को जानते हैं आप?

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कौश (देवता की मूर्ति को धोकर इकठ्ठा किया पानी) के बंधन को नहीं लांघ पाते ग्रामीण, अभी भी कई दुर्गम क्षेत्रों में इस तरह के हथकंड़ों का प्रचलन

रिपोर्ट- महेंद्र सिंह

चुनाव में अपने पक्ष में वोट डालने के लिए कई प्रकार के हथकंड़े अपनाए जाते हैं। जिसमें ऊपरी शिमला में कौश का प्रचलन कम नहीं हुआ है। कई दुर्गम क्षेत्र अभी भी ऐसे हैं जहां पर चुनाव चाहे कोई भी हो लेकिन ग्रामीणों को एक पार्टी के पक्ष में वोट देने के लिए कौश रूपी बंधन का सहारा लिया जाता है। इस बंधन को इसलिए भी काफी सार्थक माना जाता है क्योंकि इससे ग्रामीणों की देवआस्था जुड़ी हुई है। बताते चलें कि कौश देवताओं की मूर्तियों को धोकर इकठ्ठा किया गया पानी है। इसी पानी को उपरी शिमला में कौश कहा जाता है।

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ज़रूरी नहीं कि इसे केवल चुनाव में ही प्रयोग किया जाता है। बल्कि इसका प्रयोग किसी भी व्यक्ति को बंधन में बांधने का रहता है। लेकिन विशेष तौर से इसका प्रचलन किसी भी चुनाव चाहे वह पंचायत स्तर का हो या फिर विधानसभा का या फिर लोकसभा चुनाव। सभी में इस तरह के हथकंड़े अपनाए जाते हैं। कौश पिलाने में विशेष तौर से एक बात शामिल है कि जिस ग्रामीण को कौश पिलाया जाता है कि उससे कहा जाता है कि अमुख पार्टी व अमुख उम्मीदवार को अपना वोट देना। जब एक बार ग्रामीण इस कौश को पी लेते हैं तो वह चाह कर भी अपना वोट किसी दूसरे उम्मीदवार को नहीं दे सकते। भले ही मतदान पूरी तरह से गुप्त होता है लेकिन इस प्रक्रिया में देव आस्था जुड़ी है।

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दैवीय बंधन में बंधा महसूस करता है ग्रामीण

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ऐसे में कोई भी व्यक्ति देवता की आस्था को दरकिनार करते हुए अपना वोट दूसरी जगह नहीं डाल सकता। इस प्रक्रिया को ज्यादातर उन क्षेत्रों में अपनाया जाता है जहां पर एक पार्टी का वर्चस्व होता है। दूसरी पार्टी के कार्यकर्ता इस तरह का हथकंड़ा अपनाकर वहां से दूसरी पार्टी का वर्चस्व समाप्त करने के लिए इस तरह का कदम उठाने से पीछे नहीं हटते। जानकारी के मुताबिक चुनाव हो जाने के बाद इस तरह की बात काफी सुनने में आती है कि अमुख गांव के लोग कौश पीकर उस पार्टी के हो गए। इस बात पर भले ही आधुनिकता के समय में कोई विश्वास करें या न करें। लेकिन दूर दराज के क्षेत्रों में इस तरह का प्रचलन नई बात नहीं है।

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विशेष तौर से जब चुनाव नजदीक आते हैं तो इस तरह के हथकंड़े काफी ज़ोर पकड़ने लग जाते हैं। जहां पर भी इस तरह के हथकंड़ों का प्रचलन है वहां पर दोनों ही पाटियों के लोग काफी सचेत रहते हैं। यहां तक कि दोनों पार्टियों के लोगों ने ऐसे गांव में अपने लोगों को रात भर मुस्तैद रखा होता है। ताकि कोई ग्रामीणों को इस आस्था रूपी बंधन में न बांध सके।

कौश पीना मतलब पत्थर पर लकीर

मतदाताओं को लुभावने वायदे कर या फिर पैसा देकर वोट ऐंठने से जरूरी नही कि मतदाता उसी को वोट देगें। लेकिन जिस भी ग्रामीण ने कौश पी लिया। वह कभी भी दूसरी पार्टी को अपना वोट नही दे सकता। ये मान्यता है कि कौश की उल्लघंना करने वाले को देव दोष लगता है। इस डर से कोई ये लकीर मिटाने की कोशिश भी नहीं करता। वहीं जिस व्यक्ति ने कौश पीकर उल्लघंना की उसे देवता के मंदिर में जाकर बकरे की बलि देनी पड़ती है। उसके बाद ही वह इस आस्था के बंधन से आजाद हो सकता है।