शानदार कॉमेडी ड्रामा थी 1962 की रिलीज़ फिल्म ‘दिल तेरा दीवाना’

dil tera
'दिल तेरा दीवाना' समेत कई पुरानी फिल्मों की यह समीक्षा एक ऐसी कलम से निकली हुई है, जिसने न केवल असल ज़िंदगी में बल्कि कल्पनाओं में भी कई शख्सियतों को बखूबी तराशा। इन्हें देखकर किसी के लिये भी अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल था कि इस दिल में इतनी कोमलता, इतनी गहरी भावनाएं और संवेदनाएं, मुहब्बत और नेकदिली छिपी हो सकती है। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनकी हर रचना कहती हैं कि एक बेहतरीन लेखक या कवि की कल्पनाओं का कोई आकाश नहीं होता। जब कलम चलती है तो सारी भावनाएं कोरे कागज़ पर खुद ब खुद उतरती चली जाती हैं। अगर आपने भी 1960 के दशक की कुछ ब्लैक एंड व्हाइट या रंगीन फिल्में अब तक नहीं देखी तो पहले पढ़ें यह रिव्यू और तुरंत देख डालें । इनके गीत ही सुन लेंगे तो मेलॉडी आपके दिलों में उतरती चली जाएगी।  

1962 में बनी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म ‘दिल तेरा दीवाना’ एक कॉमेडी ड्रामा थी, जो उस दौर की सुपरहिट फिल्मों में शुमार है। बीआर पंथुलू की इस फिल्म में शशि कपूर और माला सिन्हा की जोड़ी ने पर्दे पर कमाल की अदाकारी से दर्शकों के दिल जीत लिये थे। महमूद के शानदार अभिनय ने उन्हें फिल्मफेयर दिलवाया। इस फिल्म की अधिकांश शूटिंग दक्षिण में हुई थी। इसमें संगीत था शंकर जयकिशन का और गीतों के बोल लिखे थे शैलेन्द्र ने। इन गीतों को अपनी मधुर आवाज़ से लता और मुहम्मद रफी ने सजाया था।

dil tera diwana

फिल्म निर्माण टीम

प्रोड्यूसर व निर्देशक : बीआर पंथूलू,,पटकथा : दादा मिरासी, संवाद : हसरत जयपुरी, शैलेन्द्र, संगीत : शंकर जयकिशन

सितारे : शम्मी कपूर, महमूद, माला सिन्हा, प्राण, ओम प्रकाश, मनमोहन कृष्ण, मुमताज बेगम, शुभा खोटे आदि

दिल दीवाना हो ही गया इस मूवी को देखने के बाद। ट्विस्ट के स्टैप्स को जिस्म की जुंबिश से मनमाफिक फ्यूज़न में बदलने वाले शम्मी कपूर की यह फिल्म चंदेक लोकप्रिय फिल्मों में से एक है जो न केवल बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही बल्कि फिल्म समालोचकों ने भी इसे सौ बटा सौ अंक देने में कंजूसी नहीं बरती। फिर महमूद की उपस्थिति ने इसमें सोने पर सुहागे का काम किया। इसमें कोई हीरोइन न भी होती तो भी शम्मी व महमूद की जोड़ी इसे कामयाब बना देती। लेकिन कथानक के कारण हीरोइन की उपस्थिति लाजि़मी हो गयी।

मुझे कितना प्यार है तुमसे : लता मंगेशकर, मुहम्मद रफी

अगर हीरोइन (माला सिन्हा) न होती तो शम्मी कपूर ‘दिल तेरा दीवाना है सनम’ सरीखे गीते किसकी शान में गाते? क्योंकि शुभा खोटे पर तो महमूद का दिल आ गया था। बहरहाल, 1962 में रिलीज यह फिल्म तमिल फिल्म ‘साबाश मीना’ की रीमेक थी। इस नाम पर 1996 में एक और फिल्म भी बनी, जिसे पहलाज निहलानी ने प्रोड्यूस किया था और इसमें सैफ अली खान व ट्विंकल खन्ना मुख्य भूमिकाओं में थे। हालांकि, साठ के दशक के बाद रंगीन फिल्में बननी शुरू हो गयी थीं लेकिन यह ब्लैक एंड व्हाइट थी। यह एक कॉमेडी फिल्म थी, जिसमें कथानक भी था, अभिनय था, उस वक्त के मशहूर नायिका व नायकों के चेहरों के साथ था शंकर जयकिशन का सुरीला संगीत। यह वह वक्त था जब इस जोड़ी द्वारा प्रोफेसर, असली नकली, एक हसीना एक दीवाना अनपढ़ और आरती आदि फिल्मों में संगीत का तहलका मचाया जा रहा था।

दिल तेरा दीवाना है सनम : लता मंगेशकर, मुहम्मद रफी

हालांकि, फिल्म में शम्मी और महमूद के किरदार को बराबर ही तरजीह दी गयी थी तथापि सभी गीत माला सिन्हा व शम्मी कपूर पर ही फिल्माए गए थे। महमूद का रोल उस ज़माने की फिल्मों में हीरो की टक्कर का होता था क्योंकि वह फिल्मों की कामयाबी की गारंटी होते थे। इस फिल्म में भी ऐसा ही हुआ। अपनी बेहतरीन अदाकारी के लिए उन्हें स्पोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग दक्षिण में हुई। फिल्म की कहानी तो आम है लेकिन इसकी प्रेजेंटेशन कमाल की है। अप्रत्याशित हालात में हीरो हीरोइन को मिलता है तथा प्यार में पड़ जाता है लेकिन यहां भी सामाजिक मजबूरी है। हीरो अमीर है और हीरोइन गरीब, लेकिन फिर क्या हुआ? दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं लेकिन बीच में विलेन भी है लेकिन कोई बात नहीं, उसका भी हल है ना। सब कुछ दर्शकों की कसौटी पर खरा।

नज़र बचाकर चले गये वो : मुहम्मद रफी

मोहन (शम्मी कपूर) तथा अनोखे लाल (महमूद) फिल्म के दो मुख्य किरदार हैं। मोहन अमीर है लेकिन वह आम लोगों की तरह जीना चाहता है, जबकि अनोखेलाल अपनी गरीबी से निजात पाना चाहता है। परिस्थितियां उन्हें एक-दूसरे के स्थान पर रहने को विवश कर देती हैं। मोहन जब अनोखे लाल के यहां जाता है तो उसकी मुलाकात मालती (माला सिन्हा) से होती है जो वहां अपने अंधे बाप के साथ रहती है। जबकि अनोखे लाल मोहन बनकर कैप्टन दयाराम के यहां आ जाता है, जिसे मोहन के पिता ने तहजीब सीखने के लिए भेजा है। क्रमिक सीन के कारण फिल्म आगे बढ़ती है। प्राण की एंट्री भी होती है बतौर विलेन जो मालती (माला सिन्हा) पर फिदा है जबकि माला सिन्हा शम्मी कपूर से इश्क करती हैं।

अब विलेन को दोनों कैसे डील करते हैं यह सस्पेंस फ्लैश बैक के पाठकों के लिये बना रहे तभी अच्छा है। यह फिल्म दर्शकों को हंसते-हंसते सिनेमा हॉल से वापस भेजती है। हसरत जयपुरी व शैलेंद्र के लिखे गीतों को गुनगुनाते हुए वे हॉल से बाहर निकलते हैं।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।)