बेटी नहीं पराया धन, नये साल में बदले नज़रिया, ऐसे दें लाडली को पंख…

girl teen
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बेटी नहीं पराया धन, वह ज़िम्मेदारी भी नहीं बल्कि जिगर का टुकड़ा है। वैसे सदियों से हमारे समाज में बहुसंख्य महिलाओं की अपनी कोई पहचान ही नहीं रही। उनकी पहचान उनके पिता, पति या पुत्र से ही रही है। वहीं बेटों को तरजीह देने के पीछे कई धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं हैं। ये मान्यताएं हमारे समाज के अवचेतन मन में गहराई तक पैठ बना चुकी हैं।

बता दें कि हमारे समाज में सदियों से बेटों को वंश चलाने वाला, बुढ़ापे में सहारा देने वाला, मुखाग्नि देने वाला माना गया है। जबकि दूसरी ओर बेटियों को जिम्मेदारी और पराया धन। हमारी सामाजिक परंपरा और सोच में यह बात गहराई तक बैठी हुई है कि बेटियां पराया धन होती हैं। शुरू से ही बेटियों के प्रति यही दृष्टिकोण अपनाया जाता है । यदा-कदा उन्हें इस बात का अहसास भी करवा दिया जाता है।

किसी से कम कहां हैं बेटियां

girl child
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देखा जाये तो पढ़े लिखे लोग भी संतुलित परिवार के लिए एक लड़का और एक लड़की होने की बात करते हैं। जबकि हकीकत यह है कि बेटियों को पर्याप्त मौका दिया जाए। उनकी पढ़ाई की सही व्यवस्था की जाए। उन्हें प्रोत्साहन, खेलकूद प्रशिक्षण दिया जाए तो वह बेटों से कतई कम नहीं।

बीते कुछ सालों में ऐसे बहुत से उदाहरण सामने आए हैं। गौर करें तो बेटियों ने अपने माता-पिता को कंधा दिया है, मुखाग्नि दी है। नालायक बेटों द्वारा माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार की स्थिति में बुढ़ापे में उनका सहारा बनी हैं। खेलकूद, अंतरिक्ष अभियान, चिकित्सा, कुश्ती, शिक्षा, सैन्यशक्ति, वकालत या कोई भी दूसरा फील्ड हो, बेटियों ने परचम लहराया है।

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बेटी नहीं पराया धन, उसे पढ़ाएं, आगे बढ़ाएं

इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड के एक शोध के अनुसार हमारे देश में श्रम शक्ति में लैंगिक भेदभाव को खत्म किया जा चाहिए। ऐसा करने से भारत की अर्थव्यवस्था 27 फ़ीसदी तक बढ़ सकती है। रिसर्च के अनुसार लड़कियों की प्राइमरी एवं हायर सेकेंडरी शिक्षा की दर बढ़ रही है। जबकि यह श्रम शक्ति यानी वर्क फोर्स में तबदील होती नजर नहीं आ रही।

लड़कों को भी सोच बदलने की ज़रूरत

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जाहिर है लड़कियां पढ़-लिख रही हैं लेकिन काम नहीं कर रही। इसके पीछे माता-पिता की यह सोच भी है कि अच्छी पढ़-लिख लेगी तो अच्छा घर और वर मिल जाएगा। ज्यादातर लड़कों को भी होममेकर पत्नी ही चाहिए होती है। पत्नी की कमाई खाने में वे अपनी हेठी समझते हैं। पत्नी ज्यादा कमाए तो भी उन्हें इन्फीरियरिटी कॉम्प्लेक्स हो जाता है। इसी वजह से भारत में महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी महज 33 फीसद के आसपास है। जबकि वैश्विक अनुपात 50 फ़ीसदी का है और पूर्वी एशिया में यह 63 फीसदी है।

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इसलिए अपनी बेटी को सिर्फ बढ़ाएं ही नहीं बल्कि उसे अपनी प्रतिभा और पढ़ाई लिखाई का समुचित फायदा भी मिलने दें। वह अगर किसी फील्ड में करियर बनाना चाहती है और सीए, सीएस, इंजीनियर, वकील, सैनिक, खिलाड़ी, मार्केटिंग या सेल्फ एंप्लॉयमेंट का फील्ड चुनती है तो उसे पूरा सहयोग दें। आर्थिक रूप से स्वावलंबी होगी तो बेटी अपनी जरूरतों के लिए किसी की ओर नहीं देखना पड़ेगा।

बबेटी नहीं पराया धन, उसे कम न आंके

  • ध्यान रहे, जिस कोख से बेटे ने जन्म लिया है, उसी कोख से बेटी भी आई है। उसकी रगों में भी आपका ही खून दौड़ता है।
  • बेटी को घर में दोयम दर्जे का सदस्य ना मानें। उसे वही सुख-सुविधाएं दें जो आप अपने बेटे को देती हैं।
  • उसका खानपान पौष्टिक हो। फल-सब्जियां आदि समुचित मात्रा में खाए। खेलकूद या अन्य फिजिकल एक्टिविटीज में हिस्सा ले, इन बातों का ध्यान रखें।

महत्वपूर्ण निर्णय में शामिल करें

माता-पिता को सुनिश्चित करना चाहिए कि बेटी को किसी भी तरह से भेदभाव न झेलना पड़े। ऐसा महसूस ना हो कि वह अपने ही घर में एक पराए घर के सदस्य की तरह है। उसका विवाह करके मुक्ति पानी है। ऐसे में कई बार माता-पिता और बेटी के बीच भावनात्मक संबंध बिल्कुल खत्म हो जाते हैं।

मौजूदा युग की इस सच्चाई को भी समझें कि बड़ी संख्या में बेटे शादी होते ही पराए होने लगे हैं। लोगों के अनुभव बताते हैं कि उन्हें मां-बाप की उतनी फिक्र नहीं रहती जितनी बेटियों को रहती है।