सितारों के सम्मोहन में सियासत

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बरसों से सितारों के सम्मोहन में है सियासत। हॉलीवुड सितारे तथा पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने एक बार एक प्रश्न उछाला, ‘एक अभिनेता क्या जानता है?’ और रिपब्लिकन उम्मीदवार के रूप में दो बार राष्ट्रपति चुनाव जीतकर अपने इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने स्वयं ही दे दिया. भारत में किंवदंती बन चुके एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) एवं एनटी रामाराव (एनटीआर) की ही भांति अमेरिकी काउबॉय रीगन ने भी शीतयुद्ध के शिखर काल में ‘शैतानी साम्राज्य’ से संघर्ष करने हेतु अमेरिका द्वारा महसूस की जा रही एक नायक की जरूरत का लाभ उठाकर दिखा दिया कि अभिनेता चुनाव जीतने की कला जानते हैं. सिनेमा अफसाने को हकीकत के रूप में पेश करने का नाम है और रीगन ने ग्लैमर का मिथक रचते हुए उसे सियासी संभावनाओं का रूप दे दिया.

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भारत में आज मुख्यधारा की सभी सियासी पार्टियां सिनेमा के अतीत अथवा वर्तमान से नायकों को लेकर अपनी चुनावी संभावनाएं सशक्त करने में लग गयी हैं. इन सितारों का प्रभामंडल एक ऐसे सियासी मायाजाल का सृजन कर रहा है, जो स्वयं नेताओं की हैसियत को खतरे में डाल रहा है. लगभग दो दर्जन से भी ज्यादा नामचीन से लेकर गुमनाम अथवा गुमशुदा नायकों, महानायकों या अतीत नायकों का एक पूरा कुनबा वर्तमान चुनावी अखाड़े में उतर आया है, जिनकी सबसे ज्यादा तादाद भाजपा के पाले में पड़ी प्रतीत होती है.

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बासठ वर्षीय सनी देओल ने अपने पिता धर्मेंद्र की सियासी विरासत थामी है. इन सिनेमाई शख्सियतों को उनके कद से भी बड़ी अहमियत देते हुए उनके ये सियासी आका कहीं मतदाताओं से अपना जुड़ाव सशक्त करने हेतु ही ग्लैमर के शरणागत तो नहीं हो रहे?

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सामान्यतः, चुनावों को विचारों तथा विश्वासाें के टकराव के तौर पर लिया जाता है. चूंकि अभिनेता अपने विश्वासों का सामंजस्य पटकथा से बिठा लेने में निष्णात होते हैं, सो वे इन सियासी संगठनों के लिए भी आदर्श समझे जाते हैं. उनके समर्थक नहीं होते, पर उनके प्रशंसकों की एक बड़ी तादाद उनसे अपना जुड़ाव महसूस करती है. उनके सियासी स्वामी उन्हें अपने सामान्य कार्यकर्ताओं पर तरजीह देते हुए नायक की भूमिकाएं दे रहे हैं, ताकि उनके ब्रांड मूल्य एवं जन सम्मोहन का दोहन किया जा सके. शत्रुघ्न सिन्हा, मनोज तिवारी, नुसरत जहां, उर्मिला मातोंडकर, किरण खेर, प्रकाश राज, कमल हासन तथा जयाप्रदा जैसों में आखिर एक जैसा क्या है? कुछ भी तो नहीं. पर इन पार्टियों ने उन सबमें जो कुछ एक जैसा पाया, वह यह कि अभिनेता किसी जाति, समुदाय अथवा संप्रदाय का प्रतिनिधि न होने की वजह से सभी किस्म के मतदाताओं को गोलबंद करने का माद्दा रखता है.

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 भाजपा को यह यकीन है कि कल की तारिका जयाप्रदा अपने प्रतिपक्षी आजम खान के मुकाबले मुसलिमों, पिछड़ों तथा अगड़ों को अपने ग्लैमर के जादू से, न कि अपनी वैचारिक पहचान से, बांध देने में ज्यादा सक्षम होंगी. दूसरी ओर, समाजवादी मुखिया अखिलेश यादव ने शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को गृह मंत्री राजनाथ सिंह से लोहा लेने की जिम्मेदारी भी सिर्फ इसलिए सौंपी कि वे एक नामचीन बॉलीवुड हस्ती की जीवनसाथी हैं. इसमें कोई शुबहा नहीं कि हेमा मालिनी अथवा मुनमुन सेन सियासी हैसियत के किसी भी एक सामान्य उम्मीदवार के मुकाबले अनायास ही ज्यादा बड़ी भीड़ जुटा सकती हैं. या फिर यह भी संभव है कि मतों के कटुतापूर्ण एवं गाली-गलौज भरे संघर्ष में ग्लैमर का पुट कुछ मनोरंजन, कुछ सुकून दे जाता हो.  

पुराना है फिल्मी मोहपाश

भारतीय राजनीति में फिल्मी मोहपाश कोई नयी बात नहीं. देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पृथ्वीराज कपूर को राज्यसभा के लिए नामित किया था. तब से सभी प्रधानमंत्रियों ने इस परिपाटी का अनुसरण किया. मनोरंजन की रंगीन दुनिया से निकल सियासत के संगीन संसार में सफर की शुरुआत दक्षिण के सिनेमाई पटकथाकारों, निर्देशकों, नायकों तथा नायिकाओं द्वारा हुई, जिन्होंने वर्ग एवं धर्म के आधार पर अपनी सियासी पार्टियां खड़ी कर लीं.

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तमिलनाडु में अन्नादुरै द्वारा स्थापित इस परंपरा को आगे एमजीआर, करुणानिधि और जयललिता ने परवान चढ़ाया. एनटीआर ने आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को धूल चटाने को 1980 के दशक में तेलुगु देशम पार्टी की स्थापना की. दक्षिण के इन फिल्मी नायकों के लिए मुख्य खलनायक की भूमिका में कांग्रेस थी, जो इन उभरते क्षेत्रीय एवं सामुदायिक पहचानों का अंध-अवमूल्यन किये जा रही थी. इसी सिनेमाई शक्ति ने कांग्रेस को उसके दक्षिण भारतीय व्यासपीठ से पदच्युत कर इस हाल में पहुंचा दिया कि आज वह इन पांच राज्यों में से किसी में भी अपनी पहचान के बूते सत्तारूढ़ नहीं है. इसके ठीक विपरीत, इन बॉलीवुड सितारों ने राष्ट्रीय दलों को अपनी जादुई पहचान का फायदा बतौर सामान्य सदस्य अथवा समर्थक की हैसियत से ही उठाने दिया. 

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राजीव गांधी के कांग्रेस अध्यक्षीय या प्रधानमंत्रित्व काल में उत्तर भारतीय राजनीति में बॉलीवुड का वर्चस्व विशेष रूप से बढ़ा. वर्ष 1984 में उन्होंने अपने व्यक्तिगत मित्र अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद के चुनावी समर में उतारा, जहां उन्होंने दुर्दमनीय एचएन बहुगुणा के विरुद्ध 69 प्रतिशत मत प्राप्त कर उन्हें रिकॉर्ड अंतर से पराजित किया. इसके बाद वर्ष 1991 में, राजेश खन्ना ने नयी दिल्ली सीट पर एलके आडवाणी जैसे महारथी को लगभग हरा ही डाला और वे बमुश्किल केवल पंद्रह सौ मतों के अंतर से जीत सके. तब से ही चुनावों में फिल्मी शख्सियतों का बोलबाला बढ़ता चला आ रहा है. कांग्रेस ने जहां सुनील दत्त और राज बब्बर जैसे लोगों को लोकसभा टिकट दिये, वहीं भाजपा ने विनोद खन्ना, धर्मेंद्र एवं शत्रुघ्न सिन्हा को चुना.

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फिल्मी सितारों की सबसे बड़ी तादाद (19) वर्ष 2014 के आम चुनाव में प्रतिभागी बनी, जिनमें से नौ को भाजपा ने खड़ा किया और उनमें से सात सफल हुए. हेमा मालिनी जहां 3.50 लाख के विशाल बहुमत से जीतीं, वहीं राज बब्बर, नगमा, जावेद जाफरी और गुल पनाग धराशायी हो गये. भगवा कैंप में स्मृति ईरानी तथा बप्पी लाहिड़ी भी हार गये.  ऐसा पहली बार ही हुआ है कि फिल्मी दुनिया मोदी समर्थक और मोदी विरोधियों के दो धड़े में बंट चुकी है, जिनमें पहले का पलड़ा बहुत भारी है. यह दूसरी बात है कि इन सितारों की भीड़ जुटानेवाली छवि सार्थक सियासत की हैसियत बौनी किये दे रही है. ग्लैमर का स्फीतिकरण एक जन्मजात नेता का भी न्यूनीकरण कर सकता है. 

साभार: प्रभु चावला एडिटोरियल डायरेक्टरन्यू इंडियन एक्सप्रेस prabhuchawla@newindianexpress.com