चुनावी गदर

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सुरिन्द्र कौर

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चुनावी गदर का फिर से दौर आने वाला है,

रात-दिन रैलियों का शोर आने वाला है।

लगने को हैं दाव पर गरीब की मजबूरियां,

नापते हैं नेता कुर्सी की नज़दीकी और दूरियां।

सरेआम गरीबों का यह हक लुटा रहे हैं,

उनके ही हक पर अपने नसीब आजमा रहे हैं।

रात और दिन शराबों के दौर चलने वाले हैं,

उपहारों के चारों तरफ जोर चलने वाले हैं।

नादान जनता धोखों की चक्की में पिसती रहती हैं,

अपनी ही गलतियों की सोच में घिसती रहती हैं।

बेईमानी की चाल नेता चलने वाले हैं,

उनकी इसी चाल में नादान फंसने वाले हैं।

बिन सोचे-समझे उनके झांसे में आ जाएंगे,

सच पूछो तो खुद ही हक अपने यह गंवाएंगे।

पैसे की लालच में ईमान बिकता रहता है,

ईमान की तो छोड़ो, इंसान बिकता रहता हैं।

‘मत’ से न मतदान कर, गलती दोहराएंगे,

अपनी उसी गलती पर साला फिर पछताएंगे।

अरबों कमा लेंगे नेता, गरीब वहीं खड़ा रह जाएगा,

गाथा अपनी गलती की किसे फिर सुनाएगा।

न जाने कब सुधरेगी जनता खुद को कब पहचानेगी,

झूठ के इस ‘चलन’ को न जाने कब जानेगी।

झूठी कसमें झूठे वादे कहां नेता निभाएंगे,

अगले कुछ सालों बाद फिर वोट मांगने आएंगे।

चुनाव के नाम पर पहले यह गदर करते हैं,

काले शीशों वाली कार में फिर छुपकर सफर करते हैं।

काश! कभी समझते नेता जो फर्ज अपना,

होता सच साकार भारत का हर सपना।