बच्चों को पॉकेट मनी, कितनी ज़रूरत कितनी मनमानी

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बच्चों को पॉकेट मनी, कितनी जरूरत, कितनी मनमानी है ? ये सवाल आजकल कई पेरेंटस के दिमाग में घूमता है। खैर मेरी बेटी 11 साल की है और पॉकेट मनी के नाम पर उसे कभी एक पैसे की भी जरूरत नहीं पड़ी। न उसने कभी कैंटीन से कुछ खाने के लिये अपना मनी बॉक्स तोड़ा। ऐसा शायद इसलिये क्योंकि इस उम्र में बच्चों को पेरेंटस की, खासकर मां की नसीहतों पर अमल करना आ जाता है। बाकी छोटे बच्चे भी इससे सीखते हैं। यह आम धारणा है।

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खैर यह एक तर्क है दूसरी तर्क यह है कि बहुत से अभिभावक अपने बच्चों को पाकेट मनी यानी जेब खर्च देने में कंजूसी नहीं करते। मेरी सहेली बताती हैं कि उनके बेटे के कई क्लासमेट एक दिन में 100 से 50 रुपये खर्च कर डालते हैं। खुद भी स्कूल कैंटीन से जंक फूड खाते हैं, दोस्तों को भी पार्टी कराते हैं। वहीं कुछ पेरेंटस तो पॉकेट मनी का नाम तक नहीं सुनते, वे इसे ज़रूरी ही नहीं समझते । इसे वे फिजूलखर्ची और बच्चों की आदत बिगाड़ने का तर्क देकर नकार देते हैं ।

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 कब ज़रूरी है पॉकेट मनी

माना जाता है कि जब बच्चा दस साल का हो जाए, तब उसमें इतनी समझ तो आ ही जाती है कि अपनी पॉकिटमनी को खर्च कर सके । जब वह किशोरावस्था में आता है तो उसे जेब खर्च की नितांत आवश्यकता होती है, क्योंकि पहले की तुलना में उसकी ज़रूरतें भी बढ़ जाती हैं और वह अपनी हर छोटी बड़ी ज़रूरतों को अभिभावकों के समक्ष व्यक्त करना नहीं चाहता । ऐसे में वह अपनी पॉकिटमनी का इस्तेमाल कर सकता है । अगर आपको डर है कि बच्चे बिगड़ जाएंगे तो उन पर नज़र रखें और सख्त हिदायत दें।

अगर नहीं मिले पॉकेट मनी

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कभी-कभी जेब खर्च न मिलने से भी बच्चे बिगड़ जाते हैं। चोरी करना सीख जाते हैं। अपनी पसंद की वस्तु खरीदने के लिए घर से पैसे चुराने की कोशिश करते हैं ।  कारण यह है कि बच्चे दोस्तों की तरह पसंदीदा चीज़ें खरीदना चाहते हैं। बहुत मुमकिन है कि अगर उनके पास जेब खर्च की राशि न हो तो उनके मन में हीन भावना आ सकती है। बच्चों पर भरोसा करना भी सीखना होगा। हो सकता है बच्चे को कभी-कभी पैसे कीक ज़रूरत पड़े, हर रोज़ न दें लेकिन कभी-कभार पॉकेटमनी देना गलत नहीं है।

कितनी हो पॉकेटमनी

 बच्चों को कितना जेब खर्च दिया जाए, यह कई बातों पर निर्भर करता है, मसलन परिवार में संतानों की संख्या, संतान की उम्र व कक्षा, परिवार की आमदनी और स्थान । गांव, कस्बों और छोटे शहरों की तुलना में बड़े शहरों या महानगरों में रहने और पढ़ाने वाले बच्चों को अधिक पॉकिटमनी की जरूरत होती है।

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बच्चों को पॉकिटमनी में से कुछ बचत करने को प्रोत्साहित कीजिए । इस बचत से उनकी कोई पसंदीदा चीज खरीद कर दी जा सकती है । वे अपनी इस बचत का इस्तेमाल अपने भाई, बहन या माता-पिता के जन्मदिन के अवसर पर तोहफा देने के लिए भी कर सकते हैं ।

बच्चों को जेब खर्च देने से उनमें जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है, उन्हें लगता है कि आपने उन पर विश्वास किया है । वे आपके विश्वास को कभी नहीं तोड़ेंगे । ऐसा देखा गया है कि जिन बच्चों को जेब खर्च मिलता है, बड़े होकर वे एक अच्छे वित्त प्रबंधक बनते हैं ।