छठ है प्रकृति को करीब से जानने का महापर्व, स्वच्छ पर्यावरण का संदेश

भारतीय संस्कृति में समाहित यह पर्व प्रकृति और मानव के बीच तल्लीनता को स्थापित करता है। घर से घाट तक लोक सरोकार और मेल-मिलाप का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। पूजन में इस्तेमाल की जानेवाली सामग्री प्रकृति के अनुकूल व समाज को जोड़नेवाली होती है। भगवान भाष्कर की आराधना और लोक आस्था का महापर्व छठ अनुष्ठान नहीं बल्कि स्वच्छ पर्यावरण का संदेश देता है।

लोक सरोकार और मेल मिलाप का अद्भुत नजारा

घर से लेकर घाट तक लोक सरोकार और मेल मिलाप का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। मान्यता है कि इस पर्व में भगवान भाष्कर की पूजा अर्चना से छठ मइया सभी की मन्नतें पूरी करती है। पर्व पर गाए जाने वाले लोकगीतों से नारी सशक्तीकरण, प्रकृति संरक्षण सहित कई संदेश मिलता है। छठ मइया की एक गीत रूनकी-झुनकी बेटी मांगीला.., मांगीला पठत पंडित दामाद.. गीत सुशिक्षित समाज में बेटियों की महत्ता एवं शिक्षा पर बल देता है।

व्रत के दौरान स्वच्छता का ख्याल

मान्यता है कि व्रत के दौरान स्वच्छता का ख्याल नहीं रखने से छठ मइया नाराज हो जाती है। यह अकेला ऐसा लोक पर्व है जिसमें उगते एवं डूबते सूर्य को बगैर किसी आडंबर के आराधना की जाती है। इस पर्व के शुरू होते ही स्वच्छता के प्रति लोगों की मानसिकता व आदतें स्वत: बदल जाती है। मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद तैयार होता है। आम की सूखी लकड़ी बतौर जलावन।

समाज और परम्परा के साझे

इस पर्व में बांस के सुप, डालिया, मिट्टी के चूल्हे, मिट्टी का दीया, ढकना, अगरबत्ती सहित अन्य सामग्री बड़ा महत्व रखता है। छठ के मौके पर बगैर किसी सरकारी सहायता के इन कुटीर उद्योगों को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन मिलता है। समाज और परम्परा के साझे को समझे बिना भारतीय चित्त तथा मानस को समझना मुश्किल है।

जल संरक्षण को लेकर छठ पर्व

जल संरक्षण को लेकर छठ पर्व एक ऐसे ही सांस्कृतिक समाधान का नाम है। भारतीय डायस्पोरा के अखिल विस्तार के साथ यह पर्व देश-दुनिया के तमाम हिस्सों को भारतीय जल चिन्तन के सांस्कृतिक पक्ष से अवगत करा रहा है। दो दशक पहले कई देशों के संस्कृति प्रेमी युवाओं ने बेस्ट फॉर नेक्स्ट नाम से अपने एक अभिनव सांस्कृतिक अभियान के तहत बिहार में गंगा, गंडक, कोसी और पुनपुन नदियों के घाटों पर मनने वाले छठ व्रत पर एक डाक्यूमेंट्री बनाई। जिन नदियों के नाम तक को हमने इतिहास बना दिया है, उनके नाम आज भी छठ गीतों में सुरक्षित हैं।

छठ पर्व और सामयिक सरोकार

छठ एक ऐसा अवसर जिसमें पानी के साथ मनमानी पर रोक, प्रकृति के साथ साहचर्य के साथ जीवन जीने का पथ और शपथ दोनों शामिल हैं। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ रोकने और जलवायु को प्रदूषणमुक्त रखने के लिये किसी भी पहल से पहले संयुक्त घोषणा पत्र की मुँहदेखी करने वाली सरकारें अगर अपने यहाँ परम्परा के गोद में खेलते लोकानुष्ठानों के सामर्थ्य को समझ लें तो मानव कल्याण के एक साथ कई अभिक्रम पूरे हो जाएँ।
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अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में भी छठ

हॉलैंड, सूरीनाम, मॉरिशस, त्रिनिदाद, नेपाल और दक्षिण अफ्रीका से आगे छठ के अर्घ्य के लिये हाथ अब अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में भी उठने लगे हैं। जिस पर्व को ब्रिटिश अधिसूचना पत्रों में पूर्वांचली या बिहारी पर्व कहा गया है, उसे आज बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल,दिल्ली और असम जैसे राज्यों में खासे धूमधाम के साथ मनाया जाता है। छठ पूरी दुनिया में मनाया जाने वाला अकेला ऐसा पर्व है जिसमें उगते के साथ डूबते सूर्य की भी आराधना होती है।

छठ पूजा में सादगी, पवित्रता और लोकपक्ष

बिजली के लट्टुओं की चकाचैंध, पटाखों के धमाके और लाउडस्पीकर के शोर से दूर यह पर्व बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गुड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। छठ पर्व में षष्ठी तिथि एवं सप्तमी तिथि में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। षष्ठी तिथि के दिन शाम के समय डूबते सूर्य की पूजा करके उन्हें फल एवं पकवानों का अर्घ्य दिया जाता है। वेद पुराणों में संध्या कालीन छठ पूर्व को संभवतः इसलिए प्रमुखता दी गई है, ताकि संसार को यह ज्ञात हो सके कि जब तक हम डूबते सूर्य अर्थात बुजुर्गों को आदर सम्मान नहीं देंगे तब तक उगता सूर्य अर्थात नई पीढ़ी उन्नत और खुशहाल नहीं होगी।

इनपुट्स – अनंत अमित, लेखक भाजपा किसान मोर्चा के पदाधिकरी हैं।