केमिकल हमले से निपटने की कितनी है तैयारी ?

  डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

नई प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर भारत में केमिकल हमले से आतंक का खूनी मंजर फ़ैलाने की आशंका अब बढ़ गई है। दरअसल देश में एनआईए,एसटीएफ  और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की सख्त चौकसी से इंडियन मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल-मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन पस्त हैं और वे किसी बड़ी आतंकी घटना को अंजाम देने में लगातार नाकामयाब हो रहे हैं। ऐसे में वे केमिकल हमले का सहारा लेकर अपने आतंकी मिशन को पुख्ता कर सकते हैं।

केमिकल का उत्पादन, पहुंचाने की आसान प्रक्रिया, छुपाने में आसान और रख रखाव में भी सहज होने से आतंकवादी इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर बिना परेशानी के पहुंचा सकते हैं और इससे होने वाला विनाश भयावह हो सकता है। केमिकल माड्यूल का उपयोग, उद्देश्य और इसकी पहचान करना भी आसान नही है।

भारत के कई इलाकों में इंडियन मुजदिदीन की स्लीपर सेल है जिसके केमिकल समेत अन्य अवैध कार्यों में लिप्त तस्करों से गहरा संबंध है। वास्तव में देश में संगठित अपराधियों के साथ आतंकवादियों का मजबूत  गठजोड़ है। 90 के दशक में सामने आया दाऊद इब्राहिम का अवैध साम्राज्य और पाकिस्तान से उसके संबंधों के कारण 1993 का भयावह मुंबई बम ब्लास्ट कभी न भरा जाने वाला जख्म है। मादक पदार्थों की तस्करी, हथियारों की तस्करी, मानव तस्करी, जाली मुद्रा, साइबर अपराध, मनी लांड्रिंग से लेकर दंगे भड़काना, साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाना और सामरिक सूचनाओं को लीक करने जैसे संवेदनशील मामलों में अपराधी आतंकियों के मददगार होते हैं। इस साल इंदौर में डायरेक्टरेट ऑफ़ रेवेन्यू इंटेलिजेंस ने डीआरडीई के वैज्ञानिकों की मदद से एक अवैध फैक्ट्री से 9 किलोग्राम फेंटानिल केमिकल ज़ब्त किया था। इस जानलेवा केमिकल के साथ पकड़ा गया आरोपी एक युवा वैज्ञानिक था। इस  घटना से पूरी दुनिया सकते में आ गई और भारत की खुफियां एजेंसियों के लिए भी चुनौती बढ़ गई है क्योंकि इसे रोकना,पहचान करना या काबू पाना आसान नहीं है। इंदौर सिमी की गतिविधियों के लिए भी जाना जाता है ऐसे में अवैध खतरनाक केमिकल की बरामदगी और उससे लाखों लोगों की जान लेने की क्षमता से यह सवाल सामने है कि कही माफिया के पास और केमिकल तो नहीं,और यदि वह इन्डियन मुजाहिदीन या कश्मीरी आतंकियों के हाथ लग गया तो नतीजे बेहद खतरनाक हो सकते है।

केमिकल गैस के प्रभाव बेहद घातक होते है और यह सामूहिक विनाश का कारण बन सकती है।यह स्नायु तंत्र को प्रभावित करती है और इसकी पहचान करना भी आसान काम नहीं है।इसलिए इससे बचाव भी नहीं किया जा सकता और प्रभावित की मौत महज 15 मिनट के अंदर हो सकती है।आतंकवादी संगठनों द्वारा इन प्रकार के केमिकल या गैसों का प्रयोग हवा की गति व दिशा को ध्यान में रख कर किया जा सकता है।इसी श्रृंखला में मस्टर्ड गैस,मस्टर्ड नाइट्रोजन और लिवि साईट जैसे रासायनिक तत्व भी आते है।इनका प्रभाव दीर्घकालीन और अत्यंत घातक होता है।सायनाइड का प्रयोग तो लिट्टे ने बखूबी किया भी था और वे सुरक्षा एजेंसियों के पकड़ में आने से बचने के लिए इसका उपयोग करते थे।जिस प्रकार फेंटानिल को लेब या उद्योग में आसानी से बनाया जा सकता है उसी प्रकार फासजीन या डाई फासजीन गैस होती है।स्नायु तंत्र पर घातक प्रभाव डालने वाली इस गैस को भी सरल और सस्ते उपाय द्वारा छोटे उद्योगों में आसानी से उत्पादित किया जा सकता है।फॉसजेन को अब तक के सबसे घातक रासायनिक हथियारों में गिना जाता है।प्लास्टिक और कीटनाशक बनाने में इस्तेमाल होने वाली फॉसजेन गैस रंगहीन होती है।फॉसजेन से संपर्क में आते ही इंसान की सांस फूल जाती है, कफ बनने लगता है, नाक बहने लगती है।

फेंटानिल जैसे केमिकल का प्रभाव श्वसन तंत्र, त्वचा तंत्र और शरीर के बेहद संवेदनशील अंगों को एक साथ प्रभावित करते हैं। इनका प्रभाव तात्कालिक तथा दीर्घकालिक भी हो सकता है।आतंकवादी संगठन ऐसे रसायनों का उपयोग करना पसंद करते है जो अत्यधिक विषैले हो और शीघ्र ही सक्रिय हो। साथ ही इसकों सरलता से प्रवाहित किया जा सके। इसमें फेंटानिल के साथ ही ताबुन,सरीन  और सोमन को घातक माना जाता है। इसमें जीबी जिसे सरीन गैस कहा जाता है, का प्रयोग टोक्यो सब वे हमले के दौरान किया जा चुका है। 20 मार्च 1995 को टोक्यो मेट्रो में पांच हमले किए गए।मेट्रो की तीन लाइनों में नर्व एजेंट सारीन से भरे थैले छोड़े गए।इसमें 12 लोगों की जान गई,50 घायल हुए और एक हजार लोगों की देखने की क्षमता चली गई थी। प्रथम विश्व युद्द में भी केमिकल हमलों के कारण ही लाखों लोग मारे गए थे।

साल 2009 में देश के तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के.एंटनी ने  कहा था कि आतंकवादी दुनियाभर में ज्यादा से ज्यादा आक्रामक होते जा रहे हैं और वह अपने अभियानों में नये तरीके और नयी प्रौद्योगिकी अपना रहे हैं। ‘उन्होंने दावा किया था कि रक्षा मंत्रालय आतंकवादियों के इन खतरों से निपटने के लिए खुद को (एनडीएमए के साथ) तैयार करेगा। रक्षा मंत्री का यह बयान राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) द्वारा तैयार रासायनिक (आतंकवाद) आपदा प्रबंध के दिशानिर्देश जारी करने के बाद आया था।132 पृष्ठ के इन दिशानिर्देशों को ‘समग्र’ करार देते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि यह देश में रासायनिक आपदा रोकने और इसके कारगर प्रबंधन में सहायक सिद्ध होंगे। उस समय खुफियां एजेंसियों द्वारा इस पर कड़ी नजर रखने की बात भी कही गई थी।

इस समय देश के कई इलाकों में हजारों मॉल है जहां प्रत्येक मॉल में सैकड़ों लोगों की भीड़ रोज जुटती है। इसी प्रकार स्कूल, कॉलेज और अन्य संस्थान भी बहुतायत में है, जहां केमिकल हमले से बचने के लिए कोई भी साधन मौजूद नहीं है और न ही इस दिशा में कोई प्रयास किए जा रहे है। जबकि साल 2009 में ऐसे संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों को चिन्हित कर सुरक्षा की नीति का दावा किया गया था। इसके बाद लगभग एक दशक हो चला है और आतंकी खतरा भी बड़ा है लेकिन केमिकल हमलों से निपटने की हमारी क्षमता अभी भी जस की तस है।

आज़ादी के सात दशक बाद भी भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की राह में मिलने वाली आंतरिक और बाह्य चुनौतियों का समुचित सामना करना बड़ी चुनौती बना हुआ है। जाहिर है केमिकल माड्यूल आतंक के नये अवतार के रूप में सामूहिक विनाश का सबब बन सकता है। इसको बढ़ने से रोकने के लिए उद्योगों और शोध केंद्र की गतिविधियों के साथ उससे जुड़े कर्मियों पर कड़ी नज़र, नशे से जुडी दवाइयों के दुरूपयोग को रोकने के लिए इसके व्यापार पर सरकारी नियंत्रण और सुरक्षा एजेंसियों में बेहतर समन्वय की जरूरत है।

 

 

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