‘धरती कहे पुकार के’ की कहानी और दुलाल गुहा के निर्देशन का कमाल

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'धरती कहे पुकार के': समेत कई पुरानी फिल्मों की यह समीक्षा एक ऐसी कलम से निकली हुई है, जिसने न केवल असल ज़िंदगी में बल्कि कल्पनाओं में भी कई शख्सियतों को बखूबी तराशा। इन्हें देखकर किसी के लिये भी अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल था कि इस दिल में इतनी कोमलता, इतनी गहरी भावनाएं और संवेदनाएं, मुहब्बत और नेकदिली छिपी हो सकती है।

‘धरती कहे पुकार के’फिल्म निर्माण

प्रोड्यूसर : दीनानाथ शास्त्री, निर्देशन : दुलाल गुहा, गीत : मजरूह सुलतानपुरी, संगीत : लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, सिनेमैटोग्राफी : एम. राजाराय, प्रोडक्शन कंपनी : वैशाली फिल्म्स, सूत्रधार : धर्मेंद्र
सितारे : जीतेन्द्र, नन्दा, संजीव कुमार, दुर्गा खोटे, कन्हैयालाल आदि

BEST SCENES OF ‘धरती कहे पुकार के’

1969 में रिलीज़ ‘धरती कहे पुकार के’ संजीव कुमार, जितेंद्र, नंदा, कन्हैयालाल, दुर्गा खोटे सरीखे कलाकारों के अभिनय से सजी फिल्म है। दीनानाथ शास्त्री द्वारा निर्मित दुलाल गुहा के निर्देशन में बनी इस इस फिल्म को संगीत दिया था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने और गीत लिखे थे मजरूह सुलतानपुरी ने। जहां तक पटकथा का सवाल है सीधी-सादी कहानी बढ़िया निर्देशन से हिट फिल्मों की श्रेणी में शुमार हो गई। फिल्म के सभी गाने आज भी शौक से गुनगुनाये जाते हैं— ‘जो हम-तुम चोरी से, बंधे इक डोरी से’।


‘जो हम-तुम चोरी से, बंधे इक डोरी से’।

सन् 1969 के शुरुआती माह में रिलीज इस फिल्म को देखने के बाद यूं गुमां होता है कि जैसे मुंशी प्रेमचंद का कोई उपन्यास पढ़ लिया। खासकर, गोदान अगर फ्लैश बैक के पाठकों ने पढ़ा हो तो उन्हें यह कहानी लगभग वैसे ही लगेगी। हालांकि, देश तो आज़ाद हो गया लेकिन सामंती जुल्मों की कहानियां बाद के कई दशकों तक फिल्म से जुड़े कहानीकारों की कलम से निकलती रही। वही गिनती के चार-पांच खेत और निजी ज़रूरतों की खातिर वे भी बेईमान मुनीम के यहां गिरवी। किसी तरह घर का लड़का पढ़ने तथा रोजी-रोटी कमाने शहर जाता है लेकिन शहर में जीवन-बसर करने में उसे और कई दिक्कतों से दो-चार होना पड़ता है।

jitnedra and nanda 'धरती कहे पुकार के'

 कुल मिलाकर कहें तो निर्देशन और गीतों के कारण यह फिल्म तब खासी चली थी। बड़ी मजेदार बात है कि इस फिल्म को संजीव कुमार से नहीं बल्कि जीतेंद्र के कारण जाना जाता है उन्होंने अभिनय ही ऐसा किया है। रोल के साथ फुल जस्टिस। वैसे भी जीतेंद्र की यह शुरुआती फिल्मों से एक थी। और शुरुआती फिल्मों में जीतेंद्र रोल में पूरी तरह डूब जाते थे।

‘धरती कहे पुकार के’

दूसरा बड़ा कारण इस फिल्म की कामयाबी के पीछे था फिल्म के गीत। जैसा काल खण्ड वैसे ही गीत। यूं तो मजरूह सुलतानपुरी प्रोग्रेसिव राइटर्स के सदस्य रहे लेकिन उनकी कविता क्रांतिकारी नारे नहीं परोसती। बड़ी से बड़ी बात वह हल्के से कहने में माहिर थे।

जा रे कारे बदरा

फिल्म तीन भाइयों गंगा राम (कन्हैया लाल), शिव (जीतेंद्र) तथा मोती (संजीव कुमार) के इर्द-गिर्द घूमती है। गंगाराम चूंकि दोनों भाइयों की अपने बच्चों की तरह परवरिश करता है। किसी तरह उधार लेकर ज़मीन को गिरवी रखकर अपने भाई मोती को शहर में कानून की पढ़ाई करने भेजता है। घर में उसका हाथ उसका छोटा भाई शिव बंटाता है। शिव की आंख उसकी व्यक्ति की बेटी राधा (नंदा) से लड़ती है, जिससे उसके बड़े भाई ने कर्ज़ लिया है।

गिरवी ज़मीन को छुड़ाने के लिए मोती गांव आना चाहता है लेकिन ज़मीन बचाने की खातिर शिव शहर पहुंच जाता है। उसके पीछे-पीछे राधा भी वहीं पहुंच जाती है क्योंकि उसका बाप गंगाराम का एक शर्त पर कर्जा माफ करना चाहता था कि राधा की शादी पढ़े-लिखे मोती से हो न कि अनपढ़ शिव से। यह बात अलग है कि राधा स्वयं भी क ख ग नहीं जानती। अब शहर में पहुंचकर राधा क्या करती है और मोती कैसे अपनी ज़मीन छुड़ाता है, इसके लिए मूवी देखनी पड़ेगी। वैसे कहानी सिम्पल-सी है लेकिन इसे ट्रीटमेंट उम्दा दिया गया है।

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनकी हर रचना कहती हैं कि एक बेहतरीन लेखक या कवि की कल्पनाओं का कोई आकाश नहीं होता। जब कलम चलती है तो सारी भावनाएं कोरे कागज़ पर खुद ब खुद उतरती चली जाती हैं। अगर आपने भी 1960 के दशक की कुछ ब्लैक एंड व्हाइट या रंगीन फिल्में अब तक नहीं देखी तो पहले पढ़ें यह रिव्यू और तुरंत देख डालें । इनके गीत ही सुन लेंगे तो मेलॉडी आपके दिलों में उतरती चली जाएगी।