बांग्ला फिल्म का रीमेक थी मीना कुमारी की यादगार मूवी ‘बंदिश’

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बांग्ला फिल्म का रीमेक ‘बंदिश’ समेत कई पुरानी फिल्मों की यह समीक्षा एक ऐसी कलम से निकली हुई है, जिसने न केवल असल ज़िंदगी में बल्कि कल्पनाओं में भी कई शख्सियतों को बखूबी तराशा। इन्हें देखकर किसी के लिये भी अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल था कि इस दिल में इतनी कोमलता, इतनी गहरी भावनाएं और संवेदनाएं, मुहब्बत और नेकदिली छिपी हो सकती है। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनकी हर रचना कहती हैं कि एक बेहतरीन लेखक या कवि की कल्पनाओं का कोई आकाश नहीं होता। जब कलम चलती है तो सारी भावनाएं कोरे कागज़ पर खुद ब खुद उतरती चली जाती हैं। अगर आपने भी 1960 के दशक की कुछ ब्लैक एंड व्हाइट या रंगीन फिल्में अब तक नहीं देखी तो पहले पढ़ें यह रिव्यू और तुरंत देख डालें । इनके गीत ही सुन लेंगे तो मेलॉडी आपके दिलों में उतरती चली जाएगी।

बांग्ला फिल्म का रीमेक: एक बांग्ला फिल्म बनी थी छेलेकार। उसी को ही आधार बनाकर बासु चित्रा मंदिर ने सत्येन बोस के निर्देशन में ‘बंदिश’ बना डाली और 1955 में उसे रिलीज भी कर दिया। हालांकि पटकथा में उतना कसाव न होने के कारण तथा निर्देशन में कुछ खामियों के चलते वह  फिल्म बांग्ला फिल्म के मुकाबले में कमतर ही रही लेकिन फिल्म में बड़े सितारों की मौजूदगी तथा गीत व संगीत को तैयार करने में नामी-गिरामी लोगों की भूमिका के कारण यह फिल्म पचासवें दशक के बाद खासी चर्चित रही थी। उस वक्त दादा मुनि अशोक कुमार का जमाना था और इस फिल्म में मीना कुमारी के साथ उनकी मौजूदगी ढीले-ढाले निर्देशन के बावजूद खूब रंग लायी।

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आपको याद होगा कोई एकाध दशक पहले रिलीज हुई सलमान खान और ट्विंकल खन्ना अभिनीत फिल्म ‘जब प्यार किसी से होता है।’ इस फिल्म में भी जैसे एक अकस्मात अज्ञात बच्चे की एंट्री होती है लगभग वैसे ही बंदिश फिल्म की कहानी है। इस फिल्म में बच्चे (टमैटो) का किरदार जिस डेजी ईरानी ने निभाया है, उसी डेजी ईरानी की बहिन हनी ईरानी ने कई दशक बाद ‘जब प्यार किसी से होता है’ फिल्म की कहानी लिख डाली थी। हनी ईरानी वही हैं जिन्होंने कोई मिल गया, कहो न प्यार है, लम्हे, क्या कहना जैसी हिट फिल्में बॉलीवुड को दी हैं। इस फिल्म के गीत रचयिताओं में जां निसार अख्तर भी हैं।

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गीतकार जावेद अख्तर उन्हीं के बेटे हैं, जिन्होंने पहले हनी ईरानी से पहली शादी की थी। दर्शकों को पता होगा कि जोया व फरहान अख्तर उन्हीं की संताने हैं। बहरहाल, बंदिश फिल्म कोई अपने जमाने की हिट फिल्म नहीं रही लेकिन उस जमाने में इसे फ्लाप भी नहीं कहा जा सकता था। पाठकों को शायद याद होगा कि इससे बाद भी दो बार बंदिश फिल्में बन चुकी हैं। वर्ष 1980 और 1996 में। 1980 में बनी बंदिश राजेश खन्ना और हेमामालिनी अभिनीत थी और 1966 की फिल्म में जूही चावला और जैकी श्राफ थे। लेकिन इस बार का फ्लैश बैक दादा मुनि वाली बंदिश के नाम।

फिल्म शुरू होती है महेंद्र (नाजिर हुसैन) की बीमारी से। उसे टीबी है और उसकी जिंदगी बस थोड़े दिनों की ही मेहमान है। वह मरने से नहीं डरता लेकिन उसे फिक्र है तो अनाथ टमैटो (डेजी ईरानी) की, जिसका उसके सिवाय दुनिया में कोई नहीं है। हालांकि, वह उसे अनाथाश्रम भी छोड़ने जाता है लेकिन भारी मन से लौट आता है क्योंकि वह नहीं चाहता कि टमैटो वहां रहे। टमैटो के मां-बाप हैजे से मर गए थे और तभी से महेंद्र ही उसकी देखभाल कर रहा है। टीबी की बढ़ती बीमारी को देखकर महेंद्र टमैटो को जल्द ही कोई और ठिकाना ढूंढ़ कर देना चाहता है।

एक दिन जब वह टमैटो के साथ पार्क में बैठा होता है वह कमल राय (अशोक कुमार) अपने एक दोस्त के साथ आता है। जहां वह दोस्त को बातों बातों में ही बताता है कि उसे रीता नामक लड़की और उसके पिता रीता के साथ उसके अंतरंग क्षणों में खींची गयी तस्वीरों के कारण ब्लैकमेल कर रहे हैं। उसकी रामकहानी सुनकर जब उसका दोस्त चला जाता है तो महेंद्र टमैटो को यह कहकर कमल केपास भेज देता है कि वही उसका पापा है। महेंद्र डबडबाई आंखों से वहां से गायब हो जाता है और टमैटो जाकर कमल के पास बैठ जाता है।

कहानी में मोड़

बांग्ला फिल्म का रीमेक बंदिश की कहानी आगे बढ़ती है। वे दोनों पहले तो दोस्त बन जाते हैं लेकिन बच्चे के पापा कहने पर कमल सकते में आ जाता है और वहां से भागना चाहता है। शोर सुनकर भीड़ इकट्ठी हो जाती है। मजबूरन कमल टमैटो को कार में बिठा लेता है। फिर वह उसे रेस्तरां में छोड़कर भागना चाहता है। लेकिन कामयाब नहीं होता। इसी तरह दिन बीत जाता है। लेकिन टमैटो से पीछा नहीं छुड़ा पात। अपने घर ले जा सकता क्योंकि उसके पिता कुछ तबीयत से सख्त हैं। तभी उसे अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड का ध्यान आता है। गर्लफ्रेंड ऊषा सेन (मीना कुमारी) डांस व म्यूजिक पढ़ाती है जिसे कमल बेहद प्यार करता था लेकिन कमल के पिता को यह रिश्ता पसंद नहीं। इसलिए रोमांस भी खत्म हो जाता है। तभी से वह शराबनोशी करने लगा है और उसे लड़कियों का शौक भी हो गया है। रीता से धोखा उसकी इसी आदत का परिणाम है। उसके बाद कमल के पिता लता नामक अमीरजादी से उसका रिश्ता तय कर देते हैं।

जब टमैटो को लेकर कमल ऊषा के घर जाता है तो गुस्से में वह दोनों को घर से निकाल देती है, फिर दूसरे ही पल अंदर बुला लेती है। टमैटो उसे मम्मी बुलाने लगता है। अगले दिन वह उसे चिल्ड्रन होम ले जाता है और पत्राचार के लिए ऊषा का पता दे देता है क्योंकि खुद को उसने विधुर बताया हुआ है। लेकिन चिल्ड्रन होम में टमैटो इतना हो-हल्ला मचाता है कि वहां के प्रबंधक ऊषा सेन को बुला लेते हैं। अब बच्चे के कारण दोनों की जिंदगी फिर एक-दूसर के करीब होने लगी है। लेकिन क्या दोनों का मिलन होगा? क्या टमैटो को मां-बाप मिल जाएंगे? पता चल जाएगा अगर फिल्म देख ली जाए तो।

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फिल्म में दादा मुनि का अभिनय बेमिसाल है खासकर जो लम्हे उसने टमैटो के साथ बिताएं हैं। बॉलीवुड की सिन्ड्रेला मीना कुमारी की खूबसूरती के बारे में क्या कहें, श्वेत और श्याम फिल्मों में वह खूब निखरती हैं। कुला मिलाकर फिल्म देखने लायक है। बेशक कथानक में खासे झोल हैं।

फिल्म निर्माण टीम: प्रोडक्शन : बासु चित्रा मंदिर, निर्देशन : सत्येन बोस, कथाकार : ज्योतिर्मय रॉय, सिनेमेटोग्राफी : मदन सिन्हा, संगीत : हेमंत मुखर्जी, गीत : जानिंसार अख्तर, प्रेम धवन, एचएस बिहारी

सितारे : मीना कुमारी, अशोक कुमार, डेजी ईरानी, नासिर हुसैन, महमूद, सज्जन, शम्मी