2.0 के लिए अक्षय कुमार ने करवाया थर्ड डिग्री मेकअप

रजनीकांत और अक्षय कुमार की फिल्म 2.0 ने आज लगभग सभी सिनेमाघरों में दस्तक दे दी है. फिल्म में खलनायक की भूमिका निभा रहे अक्षय अपनी इस फिल्म को साइंस फिक्शन के साथ-साथ सोशल मैसेज वाली भी करार देते हैं.  अक्षय कुमार से हुई बातचीत के प्रमुख अंश.

2.0 में आपके मेकअप की चर्चा आम है. इसके बारे में कुछ बताएं.
पूरा प्रोसेस में तकरीबन साढे तीन घंटे लगते थे. मेरे उपर तीन से चार लोग काम करते थे. उस मेकअप को थर्ड डिग्री मेकअप कहते हैं. यह सबसे हार्ड मेकअप है. जो किसी इंसान के उपर किया जा सकता है. इसको थर्ड डिग्री इसलिए कहते हैं कि जो पसीना शूटिंग के वक्त आता था. वो बाहर नहीं निकलता था. उसी कॉस्टयूम में ही रह जाता था. जब मैं कॉस्टयूम को बाहर निकालता था तो मेरी पूरी बॉडी में से पसीने की बदबू आने लगती थी. आप जब तक उस कॉस्टयूम को पहने रहते हैं तब तक आप कुछ खा नहीं सकते हैं क्योंकि आप बॉडी में थोड़ा सा बदलाव नहीं होना चाहिए. मैं पूरी तरह से लिक्विड डाइट पर होता था. एक पिंजडे टाइप का था. जो पूरा एसी का था. उसमे मैं रहता था . कैमरा जब शिफ्ट होता था. मुझे उसी में बिठाकर कैमरे की ओर शिफ्ट किया जाता था. कॉस्टयूम को पहनकर मैं चल नहीं सकता था. मुझे लगता था कि मैं सचमुच पंछी हूं. पिंजडा खोलते थे काम करने को फिर काम करने के बाद मुझे पिंजडे में वापस भेज दिया जाता था. मैं समझता था कि वो जरुरत थी क्योंकि अगर नहीं करता था. पूरा मेकअप निकल जाता था. 7 दिन मैंने उस मेकअप को लेकर काम किया. मैं ही जानता हूं कि कैसे वो मेरे दिन बीते. मैं बहुत ही धैर्य वाला इंसान हूं. इस फिल्म से मैंने और धैर्य सीखा. हमेशा तीन दिन की लगातार शूटिंग के बाद मुझे एक दिन की छुट्टी मिलती थी क्योंकि वह शरीर के लिए जरूरी था. लगातार शरीर वैसा झेल नहीं सकता . मेरे आंख के लेंस बहुत मोटे थे. हमारे आयबॉल से ज्यादा. यही वजह है कि एक आंखों का डॉक्टर सेट पर हमेशा मेरे साथ होता था इसके अलावा सेट पर और दो डॉक्टर होते थे.
क्या ये मेकअप आपकी बॉडी के लिए हानिकारक थी?
बिल्कुल भी नहीं. जो भी प्रोसेस था उससे थोड़ा आप चिड़चिड़े हो सकते थे बस और कुछ नहीं.वैसे मैंने कभी अपने हेल्थ का रिस्क नहीं लिया है.मुझे लगता है कि हेल्थ है तो सबकुछ है.हेल्थ है तो कैरियर भी है.यही वजह है कि मैं कभी भी अपने किरदार के लिए 15 किलो वजन बढ़ा या घटा नहीं सकता हूं. वैसे चेन्नई में मेरा बहुत ध्यान रखा जाता था. स्पॉटब्वॉय से कैमरा मैन तक सबकोई मेरा ख्याल रखता था.

इस फिल्म में आपने रजनीकांत के साथ स्क्रीन शेयर किया ऑफस्क्रीन कैसी बॉन्डिंग थी?
इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मुझे मालूम हुआ कि रजनीकांत महाराष्ट्रीयन हैं. हमने मराठी में बहुत बातें की.वो एक ऐसे एक्टर हैं कि अगर उनको छोटी सी लाइन दे दो. जैसे कि क्या हाल है तो उनके पास एक ऐसा तरीका है कि वो उसमे कुछ ऐसा डाल देते हैं कि वो छोटी सी लाइन में स्वैग लगता है. स्टाइलिश लगता है. वो एक आॅडनरी लाइन को एक्स्ट्रा ओडिनरी तरीके से बोलते हैं.

निर्देशक शंकर के साथ अनुभव कैसा था?
मुझे बहुत मजा आया. बहुत कुछ सीखने को मिला. वो निर्देशक नहीं बल्कि साइंटिस्ट हैं. साइंस के बारे में पूरी फिल्म बनाते हैं. पूरा रिसर्च करते हैं. मैं कहना चाहूंगा कि ये एक सोशल फिल्म है.

आप हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता हैं. क्या आपको लगता है कि लोग आपको खलनायक में स्वीकार करेंगे?
हमारे यहां ही ऐसी सोच है कि हमें निगेटिव स्वीकार करेंगे या नहीं. मैं एक एक्टर हूं किरदार निभाता हूं. अगर मैं एक निगेटिव किरदार निभाता हूं तो मैं निजी जिंदगी में वैसे नहीं बन जाऊंगा. अमरीश पुरी ने कितने सारे निगेटिव किरदार निभाएं थे, लेकिन जब लोग उनसे मिलते थे तो बहुत प्यार से मिलते थे. ये नहीं कहते थे कि अरे आपने निगेटिव किरदार निभाएं हैं. आपसे नहीं बात करुंगा. समय बदल गया है.किरदार को किरदार की तरह लोग लेने लगे हैं.मैं कैरेक्टर रोल करने के लिए भी तैयार हूं.बस अच्छी फिल्म की स्क्रिप्ट मिल जाये. मेरी प्रोड्यूस की गयी फिल्म मंगलयान में एक साथ पांच अभिनेत्रियां काम कर रही हैं. किसी ने नहीं पूछा कि मुझे कितना स्पेस मिलेगा. पांच एक्टर्स साथ में काम नहीं कर सकते हैं बहुत मुश्किल है आज के दौर में. मैं अपनी बात करूं तो मैं बस एक अच्छी कहानी का हिस्सा बनना चाहता हूं.
फिल्म में आपका किरदार मोबाइल फोन के इस्तेमाल के खिलाफ हैं निजी जिंदगी में आप कितना मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हैं?
मैं मोबाइल का इस्तेमाल सिर्फ डायरेक्टर और प्रोडयूसर से बात करने के लिए करता हूं.वो भी बहुत कम अपने अस्सिटेंट को ही बोल देता हूं कि बता दो कि इतने बजे की मीटिंग है.
आप इस किरदार के लिए निर्देशक शंकर की चौथी पसंद थे इस बात को किस तरह लेते है?
चौथी हो या पहली मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता है.मैं पसंद था यही मायने रखता है. इस इंडस्ट्री में काम करना मेरा सपना था.
हिंदी सिनेमा और साउथ फिल्म इंडस्ट्री के काम करने के तरीके में आप क्या फर्क पाते हैं?
उनका जो काम करने का तरीका और स्पेस है. वो सीखना चाहिए हमें. बहुत तेजी से काम करते हैं. वो समय की बर्बादी नहीं करते हैं. दूसरे के समय की कद्र करते हैं.कोई देर से नहीं आता है. हमसे ज्यादा अच्छी वो टेक्नॉलाजी रखते हैं. उनके जो तकनीशियंस हैं. वो खुद को हॉलीवुड के करीब रखते हैं और कोशिश करते हैं कि अपने आपको बढाते रहने की.
यह फिल्म 510 करोड़ के बजट में बनी है हिंदी सिनेमा अभी भी 300 करोड़ के बजट में अटका है ?
हम तो चाहते हैं कि हम एक हजार करोड़ की फिल्म बनाएं , लेकिन हमारे पास थिएटर कहां हैं. मेरी फिल्म पैडमैन ढाई हजार थिएटर में रिलीज हुई थी. अब वो फिल्म चीन में 14 दिसंबर को रिलीज हो रही है चार हजार से ज्यादा. आप फर्क खुद देख लो.हमारे देश में दर्शक जितने हैं.उतने सिनेमा हॉल नहीं है.आज भी लोग सिनेमाघर में जाकर फिल्म देखने को खास मानते हैं. मुझे लगता है कि आनेवाला समय सिनेमा के लिहाज के काफी अच्छा होने वाला है.

curtsy- prabhat khabar

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