कुंभ में अखाड़ों का कितना है महत्व, पढ़ें पूरी रिपोर्ट…

KUMBH 2019

कुम्भ वैसे तो आम जन के लिये आस्था और श्रद्धा का संगम है लेकिन इस मेले में साधु संत ( SANTS AND SADHUS) सबके आकर्षण ( ATTRACTION) और जिज्ञासा का कारण बनते हैं। जनता कुंभ मेले के ज़रिये ही साधु संतों के विभिन्न रूपों स्वरूपों और उनके अखाड़ों से रूबरू होती है। कुम्भ में साधु संतों की विशेष शोभा यात्राएं निकलती हैं। जो लोग कुंभ मेले में इनकी रथ यात्राओं और पेशवाई से रूबरू नहीं हुए हैं उनके लिये खास है यह लेख….दरअसल ‘अखाड़ा’ शब्द ‘अखण्ड’ से बना है। यानी विभाजित न होने वाला या न बंटने वाला। अखाड़े ही हैं जो लाखों साधु-संतों को एक दूसरे के साथ बांधकर जोड़कर रखते हैं।

अखाड़े बनाने के पीछे की यह है कहानी ( STORY OF AKHARAS AND THEIR ORIGIN)

कहते हैं अखाड़े बनाने की शुरूआत आदि गुरु शंकराचार्य ( ADI GURU SHANKARACHARYA) के समय हुई। शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) ने सनातन धर्म ( SANATAN DHARAM) की रक्षा के लिये ( TO PROTECT THE HINDU RELIGION) सभी साधुओं के छोटे-छोटे समूहों( GROUPS OF SANTS)  को मिलाने या एक करने की कोशिशें की । उनके ही प्रयासों की नतीजा था कि अलग-अलग परम्पराओं व विश्वासों का अभ्यास करने वालों को एकजुट करने तथा धार्मिक परम्पराओं को अटूट रखने के लिए इन अखाड़ों की स्थापना की गई। अब आप सोच रहे होंगे कि साधु-संत करते क्या हैं? तो हम आपको बता दें कि अखाड़ों से जुड़े साधु-सन्तों को शास्त्रों के साथ-साथ शस्त्र यानी हथियार चलाने की भी ट्रेनिंग दी जाती है। यानी कठिन जीवन जीने वाले साधु-संत शास्त्र और शस्त्र दोनों में पारंगत होते हैं। अखाड़े हमारी  सामाजिक व्यवस्थाओं, हमारी एकता और संस्कृति तथा नैतिकता के प्रतीक हैं। भारतीय संस्कृति का रक्षक माना जाता है इन अखाड़ों को…अखंड भारत और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रहरी हैं ये अखाड़े…

 अखाड़ों के बारे में महत्वपूर्ण बातें ( Internal aspects of Akhadas)

अखाड़ों के भी इष्ट-देव (Deity of worship) हैं। इसी आधार पर अखाड़े तीन कैटेगरी में बांटे गए हैं। इन्हें आगे 13 श्रेणियों में बांटा गया है। कुंभ 2019 में किन्नर अखाड़ा भी शामिल हुआ है।

लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी किन्नर अखाड़े ( kinnar akhada) की महामंडलेश्वर (Mahamandaleshwar)  हैं।

शैव अखाड़ा ( SHAIV AKHADA)

इस श्रेणी ( category) के इष्ट भगवान शिव ( lord shiva) हैं। भगवान शिवजी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा और आराधना यह अखाडा अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर करता है। शैव सन्यासी संप्रदाय से जुड़े 7 अखाड़े और हैं।

 पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणीदारागंज प्रयाग (उत्तर प्रदेश)

 पंच अटल अखाड़ाचैक हनुमान, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

पंचायती अखाड़ा निरंजनीदारागंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)

 तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायतीत्रंब्यकेश्वर, नासिक (महाराष्ट्र)

 पंचदशनाम जूना अखाड़ाबाबा हनुमान घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

 पंचदशनाम आवाहन अखाड़ादशाश्वमेघ घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ागिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़ (गुजरात)

इन सारे अखाड़ों के नाम के आगे श्री भी आवश्यक रूप से जुड़ा है। इन 7 अखाड़ों के अलावा कुछ और अखाड़ें हैं जो कुंभ में स्नान करते हैं और अन्य अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। उनमें आवाह्न, अटल, आनंद, महानिर्वाणी, निरंजनी, अग्नि, जूना, गुदद अखाड़ा (Atal Akhada, Nirvani Akhada, Kumbh Mela, Anand Akhada ) शामिल हैं।

वैष्णव अखाड़े ( VAISHNAV AKHADA)

वैष्णव संप्रदाय के आराध्य भगवान विष्णु हैं। ये प्रभु विष्णु के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर करते हैं। इस संप्रदाय के अंतर्गत तीन अखाड़े आते हैं….

दिगम्बर अनी अखाड़ाशामलाजी खाकचौक मंदिर, सांभर कांथा (गुजरात)

निर्वाणी आनी अखाड़ाहनुमान गादी, अयोध्या (उत्तर प्रदेश)

पंच निर्मोही अनी अखाड़ाधीर समीर मंदिर बंसीवट, वृंदावन, मथुरा (उत्तर प्रदेश)

इन तीन अखाड़ों के अलावा इस संप्रदाय के कुछ और अखाड़े कुंभ में शिरकत करते हैं। यह हैं निर्मोही, दिगंबर, निर्वाणी अखाड़ा।

उदासीन अखाड़ा ( UDASEEN AKHADA)

उदासीन का अर्थ है ब्रह्रा में आसीन। उदासीन संप्रदाय (Udasin Panchayati Bada Akhada) अखाड़ा सिक्ख सम्प्रदाय के आदि गुरु श्री नानकदेव के पुत्र श्री चंद्रदेव के उदासीन मत का माना जाता है। यह संप्रदाय ऊं यानी एक ओंकार की उपासना मुख्य तौर परप करता है।

इस संप्रदाये के भी तीन अखाड़े हैं..

पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ाकृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)

पंचायती अखाड़ा नया उदासीनकनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड)

निर्मल पंचायती अखाड़ाकनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड)

इस संप्रदाय के बड़ा उदासीन, नया उदासीन, निर्मल संप्रदाय, निर्मल अखाड़ा भी कुंभ में भाग लेते हैं।

#peshwaihai khas ( पेशवाई)

पेशवाई कुंभ मेले का विशेष आकर्षण है। शाही स्नान के समय में निकलने वाले इस जुलूस में अखाड़ों के आचार्य महामण्डलेश्वर और श्री महंत रथों पर विराजमान होकर आते हैं। उनके सचिव हाथी पर, घुड़सवार नागा अपने घोड़ों पर तथा अन्य साधु पैदल आगे-आगे चलते हैं। शाही ठाट-बाट के साथ यह रथ यात्रा कुंभ के श्रद्धालुओं के लिये विशे। आकर्षण होती है।

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