Agriculture expert on monsoon-मॉनसून खराब रहा तो कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए साबित हो सकता है त्रासदी

Agriculture expert on monsoon
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Agriculture expert on monsoon-भीषण गर्मी के प्रकोप से पहले ही त्रस्त भारत खराब मॉनसून की मार नहीं झेल पाएगा और यह कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए त्रासदी साबित हो सकता है। विशेषज्ञों ने यह बात कही। साथ ही उन्होंने आशा व्यक्त की कि मॉनसूनी बारिश के जोर पकड़ने से खाद्य पदार्थों की महंगाई में कमी आएगी और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी। देश में साल भर में जितनी बारिश होती है, उसमें से करीब 70 प्रतिशत मॉनसून के दौरान होती है। इससे 60 प्रतिशत तक बुवाई वाले क्षेत्र में फसल की सिंचाई होती है। लगभग आधी जनसंख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। खराब मॉनसून के चलते फसलों का खराब उत्पादन होता है और महंगाई बढ़ती है। भीषण गर्मी के कारण पहले ही रबी की फसल प्रभावित हो चुकी है, जिसके चलते सरकार को गेहूं के निर्यात पर रोक लगानी पड़ी और उत्पादन पूर्वानुमानों में लगभग 5 प्रतिशत की कटौती करने को मजबूर होना पड़ा। पहले 11.13 करोड़ टन उत्पादन का पूर्वानुमान लगाया गया था, जिसे अब 10.64 करोड़ टन कर दिया गया है। देश की खाद्य सुरक्षा के लिहाज से खराब मॉनसून के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

मॉनसून की धीमी गति के चलते धान जैसी फसलों की बुवाई में देरी की आशंका

मौसम विभाग ने एक ओर जहां लगातार चौथे साल मॉनसून सामान्य रहने का पूर्वानुमान जताया है, वहीं दूसरी ओर जून की पहली छमाही में मॉनसून की धीमी गति के चलते धान जैसी फसलों की बुवाई में देरी के बारे में आशंका पैदा हो गई है। हालांकि, मौसम विभाग का कहना है कि मॉनसून में तेजी आने और किसी भी कमी की भरपाई होने की उम्मीद है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि पूर्वानुमान अच्छा है और बारिश गति पकड़ रही है। देश भर में वर्षा की कमी 11 जून को 43 प्रतिशत से घटकर 17 जून को 18 प्रतिशत रह गई है। उन्होंने कहा, ‘भारत के प्रायद्वीपीय, पूर्वी, मध्य और पूर्वोत्तर हिस्सों में सामान्य वर्षा गतिविधि जारी रहेगी।’ उन्होंने कहा कि 23 जून के बाद उत्तर पश्चिम भारत में वर्षा में वृद्धि होगी। वहीं, ‘स्काईमेट वेदर’ के अध्यक्ष (मौसम विज्ञान) जी. पी. शर्मा ने कहा कि मॉनसून तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर गया है। उन्होंने कहा कि जहां तक कृषि क्षेत्र का संबंध है, तो उस लिहाज से देश में कम बारिश हुई है। लेकिन यह सिलसिला जल्द ही बदलने वाला है। शर्मा ने शुक्रवार को कहा कि तीन से चार दिन में पश्चिम बंगाल, उत्तरी ओडिशा और इससे सटे बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में चक्रवाती हवाओं का क्षेत्र बन जाएगा, जो भारत में गंगा के मैदानी इलाकों में हवा के पैटर्न को बदल देगा।

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उन्होंने कहा, ”यह चक्रवाती परिसंचरण सामान्य पूर्वी प्रवाह की शुरुआत करेगा, जो उत्तर-पश्चिम भारत में मॉनसून के आगे बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण है।” भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के प्रधान वैज्ञानिक और प्रोफेसर विनोद सहगल ने कहा कि जून के अंत तक बारिश की कमी की भरपाई हो जाएगी। उन्होंने कहा, ”आसार अच्छे नजर आ रहे हैं। हमें जुलाई में अच्छी बारिश होने की उम्मीद है। स्थिति इतनी चिंताजनक नहीं है। जुलाई के पहले सप्ताह तक भारी बारिश का न होना खरीफ फसल के लिए विनाशकारी माना जाता है।” वैज्ञानिक ने कहा कि अच्छी बारिश इसलिए और भी जरूरी है क्योंकि लंबे समय तक गर्म हवाओं ने मिट्टी की नमी को सोख लिया है। सहगल ने खाद्य मुद्रास्फीति के लिए भीषण गर्मी और अस्थिर वैश्विक बाजारों को जिम्मेदार ठहराया।

रूस-यूक्रेन युद्ध ने खड़ा किया गेहूं संकट

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रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण विश्व स्तर पर गेहूं की मांग बढ़ी है। दोनों देश मिलकर दुनिया के एक चौथाई गेहूं का निर्यात करते हैं। खाद्य एवं व्यापार नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने कहा कि इस साल भीषण गर्मी ने गेहूं की पैदावार को प्रभावित किया है और देश को पर्याप्त धान उत्पादन के लिए सामान्य मॉनसून की जरूरत है। पंजाब में 98 प्रतिशत फसल क्षेत्र में सिंचाई के लिए पहले ही पर्याप्त व्यवस्था है, लेकिन देश के सभी क्षेत्रों में ऐसा नहीं है।
शर्मा ने कहा कि जून के पहले सप्ताह में मॉनसून सुस्त रहा है। देश के कुछ हिस्सों में 80 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। इससे निश्चित रूप से उत्पादन प्रभावित होगा।


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“रिपोर्ट्स बताती हैं कि मॉनसून का दूसरा भाग अस्थिर होगा। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि अगले दो महीनों में बारिश की कमी जारी रहेगी। अच्छे आसान नहीं हैं।”
उन्होंने कहा, ”अगर जुलाई के दूसरे और तीसरे सप्ताह में बारिश की कमी जारी रहती है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि हम मौसम के पैटर्न में एक और व्यवधान को नहीं झेल सकते।”