जब चुनाव आयोग ने मुर्दा गाड़ी को सजा दी

डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


गुनाह की सजा इंसान को मिलती है और मौत के साथ ही वह सजा भी खत्म हो जाती है।लेकिन जब मुर्दो को अंतिम संस्कार स्थल तक ले जाने वाले वाहन को ही गुनाहगार मानकर सजा दे दी जाये तो सुनने में भी यह बेहद अजीब लगता है।

दरअसल महाकाल के नगर उज्जैन में एक शव वाहन को कई दिनों तक थाने में पुलिस कस्टडी में खड़ा रखा गया।इस वाहन से न तो कोई दुर्घटना हुई थी न ही इसने यातायात के किसी नियम का उल्लंघन किया था।यह सब मध्यप्रदेश के हालिया सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में चुनावी प्रतिद्वंदिता और चुनाव आयोग के कड़े फैसलों के चलते हुआ।


घटना इस प्रकार हुई की जयसिंह दरबार नामक एक शख्स का शहर में बीस साल से मुक्ति वाहन चलता है,जो किसी की भी मृत्यु के बाद उसे अंत्येष्टि के घाट चक्रतीर्थ तक छोड़ने जाता है।यह सेवा बिल्कुल नि:शुल्क होती है और महंगाई के युग में गरीबों के लिए तो इसे वरदान माना जाता है।

इस बार इस शव वाहन के मालिक स्वयं निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान में आये तो विरोधियों की त्योरियां चढ़ गई और उसका निशाना बना वह शव वाहन जिसे लेकर वे लोगों में लोकप्रिय थे।दरबार साहब ने कहा की चुनाव आयोग चाहे तो शव वाहन का खर्च उनके चुनावी खर्च में जोड़ ले।लेकिन उम्मीदवार की एक नहीं चली और शव वाहन को चुनाव संपन्न होने तक जब्त कर थाने में खड़ा रहना पड़ा।

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