Abortion Laws in These Countries -16 देशों में पूरी तरह बैन है एबॉर्शन

Abortion Laws in These Countries
Abortion Laws in These Countries

Abortion Laws in These Countries-अगर जो बनाम वेड का फैसला पलटता है तो अमेरिका उन गिने-चुने देशों में शामिल हो जाएगा जिन्होंने हाल के समय में अबॉर्शन लॉ को बहुत सख्त किया है। 1994 के बाद से सिर्फ तीन देशों पोलैंड, अल सल्वाडोर और निकारगुआ ने ही गर्भपात कानूनों को सख्त किया है। Egypt, Iraq, Philippines, Laos, Senegal, Nicaragua, El Salvador, Honduras, Haiti and Dominican Republic समेत दुनिया में 16 देशों में गर्भपात वर्जित है। 36 देश ऐसे हैं जहां गर्भपात वर्जित तो है लेकिन अगर मां की जान बचाने के लिए अगर अबॉर्शन जरूरी है तो उसकी इजाजत मिली हुई है।

भारत में गर्भपात को लेकर क्या है कानूनी स्थिति?

अब देखते हैं कि भारत में गर्भपात को लेकर क्या कानून हैं। यहां गर्भपात को लेकर बहुत ही प्रोग्रेसिव कानून रहा है। भारत में 51 साल से अलग-अलग परिस्थितियों में महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात का कानूनी अधिकार मिला हुआ है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) ऐक्ट 1971 में पास हुआ। 2021 में इसमें संशोधन किया गया जिसके तहत कुछ विशेष श्रेणी की महिलाओं के मेडिकल गर्भपात के लिए गर्भ की समय सीमा को 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह (पांच महीने से बढ़ाकर छह महीने) कर दिया गया। संशोधित कानून के तहत रेप पीड़ित, कौटुंबिक व्यभिचार (नजदीकी रिश्तेदार द्वारा यौन उत्पीड़न) की शिकार या नाबालिग 24 हफ्ते तक की प्रेग्नेंसी को मेडिकली टर्मिनेट करा सकती हैं। इसके अलावा वे महिलाएं जिनकी वैवाहित स्थिति गर्भावस्था के दौरान बदल गई हो (विधवा हो गई हो या तलाक हो गया हो) और दिव्यांग महिलाओं को भी 24 हफ्ते तक की प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन का अधिकार है। अगर भ्रूण में कोई ऐसी विकृति या गंभीर बीमारी हो जिससे उसकी जान को खतरा हो या फिर उसके जन्म लेने के बाद उसमें मानसिक या शारीरिक विकृति आने, गंभीर विकलांगता का शिकार होने का खतरा हो तब भी महिला को प्रेग्नेंसी के 24 हफ्ते के भीतर गर्भपात का अधिकार है।

Abortion Laws in These Countries-महिला को क्यों होना चाहिए सुरक्षित गर्भपात का अधिकार?

महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात का अधिकार बहुत जरूरी है। इस दौरान महिला की प्राइवेसी का भी सम्मान किया जाना चाहिए। भारत की बात करें तो यहां गर्भपात का कानून भले ही बहुत प्रगतिशील हो लेकिन विवाह पूर्व सेक्स सामाजिक तौर पर वर्जित चीज है। अनचाहे गर्भ का क्या निदान है? अगर लिव इन में रह रही कोई महिला और पार्टनर अलग हो जाएं और उस दौरान महिला प्रेग्नेंट हो तो वह क्या करेगी? रेप की वजह से पीड़ित प्रेग्नेंट हो तो वह क्या करे? उन्हें गर्भपात का अधिकार तो होना ही चाहिए। भारत में महिलाओं को ये अधिकार है तब भी ज्यादातर महिलाओं को पता ही नहीं कि अगर गर्भ 24 हफ्ते तक का हो तो अबॉर्शन कानूनी है। देश में इतना प्रगतिशील कानून होने के बावजूद असुरक्षित गर्भपात की वजह से तमाम महिलाओं की मृत्यु हो जाती है। असुरक्षित गर्भपात भारत में मातृ मृत्यु के लिए जिम्मेदार तीसरा प्रमुख कारण है।

अदालतों में अक्सर आती हैं अबॉर्शन की मांग वाली याचिकाएं

हाई कोर्ट्स से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अक्सर गर्भपात की इजाजत को लेकर मामले आते रहते हैं। 20-24 हफ्ते से भी ज्यादा की प्रेग्नेंसी की वजह से ये मामले काफी जटिल भी होते हैं। कभी कोई रेप पीड़ित अबॉर्शन के लिए अदालत का रुख करती है तो कभी गर्भ में पल रहे बच्चे को गंभीर बीमारी की वजह से कोर्ट से अबॉर्शन की इजाजत मांगी जाती है। महिलाओं के सुरक्षित गर्भपात के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले प्रतिज्ञा कैंपेन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1 मई 2019 से लेकर 15 अगस्त 2020 तक कुल 243 महिलाओं ने अबॉर्शन की मांग के लिए कोर्ट का रुख किया था। इनमें से 138 वयस्क महिलाएं थीं जबकि 105 नाबालिग थीं। ऐसे मामलों में देखा जाता है कि कोर्ट मेडिकल बोर्ड गठित कर देता है जो तय करता है कि अबॉर्शन से कहीं महिला की जान जाने का खतरा तो नहीं है। ऐसे में कोर्ट 24 हफ्ते से ऊपर की प्रेग्नेंसी में भी अबॉर्शन की इजाजत दे देते हैं।

Abortion Laws in These Countries-जब भारत में कोर्ट ने 6 महीने से ज्यादा की प्रेग्नेंसी में भी दी अबॉर्शन की इजाजत

Roe v. Wade overturned
Roe v. Wade overturned

पिछले साल टीएमपी एक्ट में संशोधन से पहले विशेष परिस्थितियों में महिलाओं को 20 हफ्ते तक की प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन का अधिकार था। 2021 में कानून में संशोधन के बाद अबॉर्शन के लिए प्रेग्नेंसी की अधिकतम समय सीमा को 20 हफ्ते से बढ़ाकर 24 हफ्ते कर दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने कई मामलों में 20 हफ्ते से ऊपर, यहां तक कि 24 हफ्ते से भी ज्यादा लंबी प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन की इजाजत दी, कुछ भी मांग खारिज भी कर दी। आइए नजर डालते हैं ऐसे ही कुछ फैसलों पर।

कुमारी डी बनाम कर्नाटक राज्य (2021)


कर्नाटक हाई कोर्ट ने 17 नवंबर 2021 को दिए अपने आदेश में साफ तौर पर कहा कि महिला बच्चे को जन्म देना चाहती है या नहीं, ये तय करने का उसे पूरा अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि महिला का ये अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत मिले स्वतंत्रता के मूल अधिकार का ही एक पहलू है। 16 साल की याचिकाकर्ता ने ये दलील देते हुए कोर्ट का रुख किया था कि उसे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

Abortion Laws in These Countries

  • मुरुगन नायक्कर बनाम भारत सरकार और अन्य (2017)
  • इस मामले में अदालत ने 13 साल की रेप पीड़ित नाबालिग की 32 हफ्ते के प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन की इजाजत दी।
  • सविता सचिन पाटिल बनाम भारत सरकार (2017)
  • इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 27 हफ्ते के गर्भ के अबॉर्शन की इजाजत नहीं दी। मेडिकल बोर्ड ने कहा था कि प्रेग्नेंसी की वजह से मां को कोई खतरा नहीं है। भ्रूण के तमाम अंग भी विकसित हो चुके हैं। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने अबॉर्शन की इजाजत नहीं दी।
  • अलख आलोक श्रीवास्तव बनाम भारत सरकार (2017)
  • इस मामले में याचिकाकर्ता 10 साल की बच्ची थी, जिससे रेप किया गया था। बच्ची 32 हफ्ते की गर्भवती दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अबॉर्शन की इजाजत नहीं दी। दरअसल, मेडिकल बोर्ड ने बताया था कि अगर अबॉर्शन किया गया तो नाबालिग की जान भी जा सकती है।

तपस्या उमेश पिसल बनाम भारत सरकार (2017)

  • इस मामले में 24 साल की महिला के गर्भ में पल रहा भ्रूण गंभीर बीमारियों से पीड़ित था। उसके हृदय में भी समस्या थी। महिला ने अपनी जान को खतरा बताते हुए अबॉर्शन की इजाजत मांगी थी। उस वक्त वह 24 हफ्ते की गर्भवती थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड का गठन किया। बोर्ड ने पाया कि भ्रूण तमाम गंभीर बीमारियों से पीड़ित है। जन्म के समय ही उसके गंभीर रूप से विकलांग होने या उसकी मौत हो जाने की आशंका ज्यादा है।
  • अगर वह बीमारियों के साथ जन्म ले भी लेता/लेती है तो वह ज्यादा वक्त तक जिंदा नहीं रह पाएगा/पाएगी। मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रेग्नेंसी के दौरान महिला की जान को भी खतरा हो सकता है
  • या उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच सकता है। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात की इजाजत दे दी।