‘एक मुसाफिर एक हसीना’ को ओपी नैयर के संगीत ने दिलाया था मुकाम

ek musafir ek haseena


‘एक मुसाफिर एक हसीना’:सस्पेंस ड्रामा, थ्रिलर और रोमांस के अलावा शानदार सिनेमैटोग्राफी का मेल थी राज खोसला की ‘एक मुसाफिर एक हसीना’। प्रेम-गुस्सा, रूठ-मनुहार सरीखे जज्बों को ज़ाहिर करने के जो तौर-तरीके उस दौर के युवाओं ने सीखे, वे इसी फिल्म की देन थी। फिल्म की कहानी साधारण थी लेकिन उसको मकबूलियत का जो फलक हासिल हुआ, वह ओपी नैय्यर द्वारा संगीत में किए गए नये-नये तजुर्बों से ही मिला। जॉय मुखर्जी, साधना, राजेंद्र नाथ की बेहतरीन अदायगी से सजी इस फिल्म के गीतों को मुहम्मद रफी और आशा ने अपनी आवाज़ से सजाया था।

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‘एक मुसाफिर एक हसीना’।

निर्माण टीम

प्रोड्यूसर : शशाधर मुखर्जी, निर्देशक : राज खोसला, संगीत : ओपी नैय्यर, पटकथा लेखक : राज खोसला , गीतकार : एचएस बिहारी, राजा मेहदी अली खान, शेवान रिज़्वी, सिनेमैटोग्राफी : फली मिस्त्री, सितारे : जॉय मुखर्जी, साधना, राजेंद्र नाथ आदि

बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी : मुहम्मद रफी, आशो भोंसले


‘एक मुसाफिर एक हसीना’।

राज खोसला के मंझे निर्देशन से निकली 1962 में रिलीज़ ‘एक मुसाफिर एक हसीना’ में हिट होने के लिए सब कुछ था—गीत, संगीत, पटकथा, हीरो-हीरोइन के सिनेमाघरों में भीड़ खींचने वाले चेहरे। यह फिल्म वर्तमान में भी आज के सीनियर सिटीजन या कहें कि तब के युवा फिल्म दर्शकों को नॉस्टेलजिक कर जाती है। यह फिल्म दर्शकों पर इतनी तारी थी कि उस जमाने में भी इसने बॉक्स ऑफिस पर ढाई करोड़ से ज्यादा की कलेक्शन कर डाली थी।

इसके निर्देशक राज खोसला साधना के अभिनय के इतने दीवाने हुए कि बाद में उनके साथ उन्होंने तीन और सस्पेंस फिल्में–वो कौन थी (1964), मेरा साया (1966), अनीत (1967) बना डाली। ये फिल्में भी खूब हिट थीं। सिर्फ निर्देशन ही नहीं, एक से बढ़कर एक गीतों के संगीत ने भी फिल्म को लोकप्रियता के सौपान तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

आप यूं ही अगर हमसे मिलते रहे : मुहम्मद रफी, आशा भोंसले

जब सभी संगीतकारों पर लता मंगेशकर की मीठी आवाज़ का जादू सिर-चढ़कर बोल रहा था तो उसी वक्त ओपी नैय्यर ने लीक से हटकर आशा भोंसले की गायकी को तरजीह दी और आशा भोंसले ने भी उनके विश्वास को बरकरार रखा—एक नहीं, लगभग सभी फिल्मों में, उनकी वर्सेटाइल गायकी को श्रोताओं तक पहुंचाने का श्रेय शायद ओपी नैय्यर को ही जाता है। इस फिल्म के भी सदाबहार गाने ‘बहुत शुक्रिया’, ‘आप यूं ही’, ‘मैं प्यार का राही हूं’ आदि एक से बढ़कर एक थे। ‘आप यूं ही अगर हमसे मिलते रहे’ गीत केदार राग पर आधारित है। राग कल्याण की रचना करने वाले रागों में से केदार भी एक है जो रात्रि के प्रथम प्रहर में ही गाया जाता है। ऐसे प्रयोग करने में ओपी नैय्यर माहिर थे।

मैं प्यार का राही हूं : मुहम्मद रफी, आशो भोंसले

इस फिल्म को शशाधर मुखर्जी ने अपने बेटे जॉय मुखर्जी के लिए बनाया था। लीडर, जागृति और दिल देके देखो जैसी फिल्में बनाने वाले शशाधर मुखर्जी बाम्बे टॉकीज के संस्थापकों में से एक थे, जिन्होंने बाद में फिल्मिस्तान व फिल्मालय की स्थापना की थी। ‘यह जवानी है दीवानी’ के निर्देशक अयान मुखर्जी उन्हीं के ही पोते हैं।

फिल्म शुरू होती है कश्मीर की वादियों से जहां अजय बने जॉय मुखर्जी किसी गुप्त मिशन पर आये हैं, जहां वह बम धमाके में घायल हो जाते हैं। इसी बम धमाके में आशा बनी साधना का भी घर ध्वस्त हो जाता है। लेकिन बुरी तरह घायल हुए अजय की वह देखभाल करती है।

मुझे देखकर आपका मुस्कुराना : मुहम्मद रफी

अजय की बम धमाके से याददाश्त चली जाती है। वह उसे श्रीनगर अस्पताल में ले जाती है। जहां पर उसे अपनी पुरानी जिंदगी के बारे में शक हो जाता है। वह इसी सिलसिले में मुम्बई चला जाता है, जहां उसका सामना बैंक लुटेरों से हो जाता है। वह उन्हें पकड़ने कोशिश करता है तो वे उसकी कार को टक्कर मारकर भाग जाते हैं लेकिन अजय उन्हें पहचान लेता है। वह फिर अस्पताल में दाखिल होता है, जहां उसका भाई उसे मिलने आता है, जिसके कारण उसकी याद लौट आती है लेकिन वह पिछले छह महीने कहां रहा, उसे यह भूल जाता है।

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उधर वो चाल चलते रहे : आशा भोंसले

उधर, चूंकि बैंक लुटेरे अजय को मारना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अजय की याद्दाश्त चली गई है वह एक स्त्री को उसकी पत्नी बनाकर भेजते हैं। उधर, आशा भी उसकी तलाश में वहां आ जाती है लेकिन वह उसे पहचानने से इनकार कर देता है। लिहाजा पुलिस दोनों महिलाओं पर नज़र रखती है। पुलिस झूठी खबर फैला देती है कि अजय मर चुका है ताकि अजय को मारने वाले हमलावर बेपरवाह हो जाएं। वैसा ही होता है। पुलिस हमलावरों को धर दबोचती है और इसी दौरान मुठभेड़ में अजय बेहोश हो जाता है। (यह फिल्मी फंडा है ताकि याददाश्त वापस आ जाए) और अजय की छह महीनों की यादें भी वापस आ जाती हैं। दोनों बिछुड़े प्रेमी मिल जाते हैं।