तो क्या ‘महिला तूफान’ ‘पुरुष तूफानों’ से ज्यादा खतरनाक होते हैं?/ Why do Female Hurricanes Kill More People Than Male Ones?

तूफानों और चक्रवातों के ज्यादातर नाम महिलाओं के नाम पर ही रखे गए हैं। इस पर कई बार विवाद भी हो चुका है, जिसके बाद तूफानों के नाम पुरुषों के नाम पर भी रखने शुरू किए गए ।

लंबा है विवाद

1960 में दुनिया के तमाम मौसम विभागों ने ऐसे चक्रवातीय तूफानों के नाम के तौर पर केवल महिलाओं के नामों का चयन किया था। इसके बाद नेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर वीमेन सहित कई सारे महिला संगठनों ने इसका काफी विरोध किया था। एक दशक बाद इस तरह से नाम रखे जाने में काफी बदलाव आया और पुरुषों के नाम पर तूफानों के नामकरण होने लगे।

इसे भी जानें—-

‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ हरीकेन, टायफून एंड साइक्लोन’ में लिखा गया है, ‘तूफानों के अप्रत्याशित व्यवहार और चरित्र के कारण उनका नामकरण महिलाओं के नाम पर किया जाता रहा है।’ नारीवादियों का तर्क है कि जो पैनल ऐसे नाम रखते हैं, उनमें मर्दों का वर्चस्व है। यही नहीं, हाल ही में इलिनॉय यूनिवर्सिटी के एक शोध में कहा गया कि महिला तूफान पुरुष तूफानों से तीन गुना खतरनाक होते हैं।

एक बार प्रखर नारीवादी ( Intense feminist) रॉक्सी बोल्टन (roxy bolton) ने मौसम विभाग सेवा को एक आपत्तिनामा भेजकर पूछा था, ‘क्या महिलाएं जीवन और समाज के लिए नाशक हैं? क्या महिलाएं तूफान की तरह ही तबाही लाती हैं?’ उनकी आवाज़ में जब हजारों लोगों की आवाज़ मिली तो 1979 में पुरुषों के नाम से भी तूफानों के नाम रखे जाने लगे। पर अभी भी महिला तूफानों के नाम कहीं ज्यादा हैं । बोल्टन ने ही अमेरिकी संसद के पुरुष सदस्यों और मंत्रियों के नाम पर चक्रवातों के नामकरण की वकालत की।


ईवान आर. तन्नेहिल की किताब ‘हरीकेंस’ में पता चला कि ऑस्ट्रेलियाई मौसम विज्ञानी क्लीमेंट रैगी ने 19वीं सदी के पूर्वाध में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के महिला नाम रखने का सिलसिला शुरू किया था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान तो तूफानों के महिला नामकरण की अवधारणा इतनी तेज हुई कि इसके खिलाफ कई नारीवादियों ने नाराज़गी जाहिर की। 50, 60 और 70 के दशक में इस मसले को घोर लैगिंक पूर्वाग्रह और नारी अपमान से जोड़कर प्रमुखता से उठाया गया।

बदलते रहते हैं तूफानों के नाम

बात तूफानों की हो रही है तो एक दिलचस्प तथ्य भी जान लें कि बहुत ज्यादा तबाही लाने वाले तूफान हमेशा के लिए या तो रिटायर हो जाते हैं या उनके नामों में बदलाव कर दिया जाता है। ऐसा इसलिये होता है ताकी लोग विनाश की उस पीड़ा को दोबारा उसके नाम से महसूस न करें । 1954 में कहर बरपाने वाले हरीकेन ‘कैरोल हेजेल’ से लेकर 1960 में तबाही लाने वाले ‘डोना’, 1970 में विनाश का कारण बने ‘सीलिया’ इन सब तूफानों का यही हश्र हुआ । 2005 में कहर बरपाने वाले ‘कैटरीना’, ‘रीटा’ और ‘विलमा’ भी नामों के इतिहास में दफन हो गए। यही हाल 2015 में आए ‘जुआकिन’ और ‘एरिक’ तूफान का भी हुआ।


विश्व मौसम विभाग ने पूरी दुनिया को यहां के बदलते मौसम के हिसाब से 9 हिस्सों में बांट रखा है। किसी तूफान का नाम क्या होगा, यह इस पर निर्भर करता है कि वह तूफान कहां पर यानी किस हिस्से में आ रहा है ?

हिंद महासागर के उत्तरी हिस्सों में आने वाले इन साइक्लोन का ऐसा नाम रखे जाने का चलन साल 2000 में शुरू हुआ। इस काम के लिए ‘विश्व मौसम विभाग’ ने ‘भारतीय मौसम विभाग’ को चुना गया। ओमान से लेकर थाईलैंड तक आठ देशों को 8-8 नामों की एक लिस्ट भेजने को कहा गया। जिसे इन देशों ने 2004 तक भेज दिया। इसके बाद इन आठों देशों को अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के हिसाब से रखा गया। क्रम ये बना था- बांग्लादेश, भारत, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड. फिर इन देशों के नीचे इनके दिए 8 नामों को लगा दिया गया। कुल 64 नाम हो गए थे। ‘तितली’ इनमें से 54वां है। अभी आगे के 10 तूफानों के नाम और बचे हैं।

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